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आपके रुपए को किसने मारा, जो इस तरह औंधे मुंह गिरा

सरकार और आरबीआइ रुपए में आई गिरावट के दोषी हैं. जब रुपया तेजी से गिरा, तब उन्होंने कुछ नहीं किया. जब वे जागे तब देर हो चुकी थी. भारतीय कंपनियों पर डॉलर में लिया गया करीब 150 अरब डालर का लोन है, रुपए में आई 20 फीसदी कमजोरी ने इन कंपनियों के कर्ज के बोझ को बढ़ा दिया है.

प्रणब मुखर्जी
प्रणब मुखर्जी
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2011

साल 2011 के पहले सात महीनों में तो यही जान पड़ा कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए ने 44 और 45 के स्थिर स्तर को खोज लिया है. अगस्त में रुपए ने 46 के स्तर को तोड़कर डॉलर की वैल्यू के लिहाज से 50 रु. की ओर रुख करना शुरू किया.

अगले 3 महीनों के दौरान इसमें कमजोरी का रुझान बना रहा और नवंबर के पहले हफ्ते तक रुपया अपनी 10 फीसदी वैल्यू गवांकर 49-50 रुपए के लेवल पर आ चुका था. सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को उस समय रुपए की कोई फिक्र नहीं थी.

रुपए का कमजोर होना हमेशा और हर किसी के लिए बुरी बात नहीं है. रुपए की कमजोरी मजबूत निर्यात के जरिए सुस्त पड़ती विकास दर को रफ्तार दे सकती थी.

रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकर्ण ने 8 नवंबर को इस मामले में दखल न देने की वजहों का जिक्र किया. उन्होंने कहा, ''विनिमय दर नीति (एक्सचेंज रेट पॉलिसी) के हिसाब से रुपया लगातार बदलाव वाली मुद्रा है. विनिमय दर बाजार से निर्धारित होती है और किसी खास विनिमय दर के साथ हमारा हस्तक्षेप का कोई इरादा नहीं है.''

गोकर्ण ने विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल से रुपए को सहारा देने की बात भी खारिज की. जाने या अनजाने में उन्होंने कमजोरी का दंश झेल रहे रुपए पर एक और वार कर दिया.

गोकर्ण का यह बयान बेमौके और बेवक्त आया. नवंबर में यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं में संकट और बुरे दौर में पहुंच गया. ग्रीक सरकार और दागदार छवि वाले इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के इस्तीफे के बाद ऐसा लगा कि ये घटनाएं निवेशकों और कर्जदाताओं का भरोसा बढ़ाएंगी.

ऐसे हालात में गंभीर चिंता इस बात को लेकर थी कि क्या इन दोनों देशों में नई सरकारों के पास अपने-अपने मुल्क को कर्ज के संकट से बाहर निकालने वाले सख्त कदम उठाने के लिए मजबूत राजनैतिक आधार है.

मध्य नवंबर के दौरान अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन सदस्यों वाली अमेरिकन कांग्रेस कमेटी के बीच संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए एक स्वीकार्य कर्ज सीमा पर आपसी रजामंदी नहीं बनी. इन सभी घटनाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता बढ़ाने का काम किया और निवेशकों ने भारत जैसे उभरते बाजारों से बाहर निकलना शुरू कर दिया.

निवेशकों ने मजबूत होते डॉलर को खरीदने के लिए रुपए को बेचा, जिससे भारतीय मुद्रा में और कमजोरी आई. बॉम्बे स्टाक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स में आई गिरावट सीधे तौर पर रुपए की कमजोरी के रूप में देखने को मिली.

आरबीई के डिप्टी गवर्नर गोकर्ण के बयान ने रुपए की गिरावट की रफ्तार को बढ़ा दिया. बाहरी कारकों के कारण यह गिरावट और धीमी हो सकती थी. इस बीच, रुपया 50 के स्तर के भी नीचे चला गया और एक महीने से भी कम समय में इसकी वैल्यू में 10 फीसदी की और गिरावट देखने को मिली.

15 दिसंबर को रुपया अपने अब तक के निचले स्तर 54.20 पर पहुंच गया. ऐसे में रिजर्व बैंक पर वित्त मंत्रालय का दबाव पड़ा और आरबीआइ ने 15 दिसंबर की शाम रुपए में सट्टेबाजी के कुछ माध्यमों पर पाबंदी लगा दी.

अगले दिन रुपया कुछ सुधार के साथ 52.70 के स्तर पर पहुंच गया. इस बीच, गोकर्ण के रुख में एकदम से बदलाव देखने को मिला. 3 दिसंबर को उन्होंने कहा कि हम रुपए की कमजोरी को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इससे विनिमय दर के नियंत्रण से बाहर जाने का खतरा है.

दो हफ्ते बाद रुपए के बचाव से जुड़े आरबीआइ के मजबूत रुख को दर्शाते हुए उन्होंने कहा कि ''हमने जो कदम पहले उठाए हैं, उसके अलावा भी हमारे पास कई विकल्प हैं. कई ऐसे कदम हैं, हम जिनका इस्तेमाल कर सकते हैं.'' हालांकि, इस बयान से पहले ही वे रुपए को नुक्सान पहुंचा चुके थे.

सरकार और रिजर्व बैंक डॉलर के मुकाबले रुपए में 10 फीसदी कमजोरी के लिए तैयार थे. लेकिन रुपए में आई 20 फीसदी की कमजोरी ने दोनों को संकट में डाल दिया. अगस्त में ही सरकार ने भांप लिया था कि रुपए में कमजोरी आएगी और यह उसके करीब डेढ़ साल से ज्‍यादा वक्त में महंगाई को नियंत्रित न कर पाने का नतीजा था. सरकार रक्षात्मक स्थिति में थी. लेकिन उसके पास बहाना तैयार था. करेंसी की वैल्यू में 10 फीसदी की गिरावट का दोष आसानी से अमेरिका और यूरोप की बदहाल होती आर्थिक स्थितियों पर मढ़ा जा सकता था.

वाणिज्‍य सचिव राहुल खुल्लर का कहना है, ''भारत और अमेरिका की महंगाई के बीच पिछले 2 सालों से सालाना करीब 8 फीसदी का अंतर है. ब्राजील और तुर्की को छोड़कर दुनिया के किसी मुल्क में पिछले कुछ सालों में इतनी ऊंची महंगाई दर नहीं रही है. यह हमारी प्रतिस्पर्धा में बने रहने की क्षमता को कम करने वाला था, खासकर ऐसे समय में जबकि आधिकारिक विनिमय दर 44 रु. के स्तर पर हो.'' डॉलर के मुकाबले रुपए में आई 10 फीसदी की कमजोरी से समस्या सुधर सकती थी. खुल्लर कहते हैं, ''मेरा मानना है कि प्रति अमेरिकी डॉलर 49-40 रु. सही वैल्यू है.''

वित्त मंत्रालय से जुड़े सूत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि सरकार रुपए में 10 फीसदी की कमजोरी को लेकर बहुत परेशाननहीं थी. निर्यात बढ़ाकर और आयात के मुकाबले घरेलू उद्योग को और प्रतिस्पर्धी बनाकर रुपए में 10 फीसदी कमजोरी से सकारात्मक नतीजे हासिल किए जा सकते थे और सुस्त पड़ती विकास दर को रफ्तार दी जा सकती है. हकीकत यह है कि चीन जैसे दूसरे उभरते देशों की विनिमय दर में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इतनी तेज गिरावट नहीं आई है और इससे भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा के स्तर पर फायदा मिला है.

इन्वेस्टमेंट बैंकर के. वैद्यनाथन का मानना है कि रुपए में आई कमजोरी भारत के पक्ष में काम करती है. उनका कहना है, ''मौजूदा समय में हम जिस समस्या से गुजर रहे हैं, यह स्थिति चीन को काफी पसंद आती. अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक तौर पर इस बात को लेकर गतिरोध रहता है कि युआन को कृत्रिम रूप से कमजोर रखा जाता है. और यही काम बाजार ने हमारे लिए किया है.''

लेकिन कमजोर करेंसी चीन की ताकत है और हमारी कमजोरी.
अगर डॉलर के मुकाबले रुपया 50 के स्तर के नीचे नहीं जाता तो सरकार इसी तर्क से अपना काम चला लेती. लेकिन जब रुपए की वैल्यू में 50 के नीचे गिरावट आई तो वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने यह सफाई दी कि रुपए की कीमत में बदलाव तर्कसंगत स्तर से कहीं आगे निकल गया है.

आइआइएम-अहमदाबाद में फाइनेंस के प्रोफव्सर जयंत वर्मा वित्त मंत्रालय की बात पर अपनी रजामंदी जताते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया कि अब ऐसे विश्वसनीय तर्क दिए जा सकते हैं कि ''रुपए में काफी हद तक सुधार हो चुका है.''

रुपए के 50 के नीचे का स्तर प्राथमिक रूप से महंगाई और राजकोषीय घाटे पर असर डालता है. इससे लाभ का संतुलन गड़बड़ा जाता है, खासकर अतिरिक्त निर्यात के मामले में.

खुल्लर का कहना है कि ''अगर आयात पक्ष की बात करें तो रुपए की कमजोरी का कीमतों पर 100 फीसदी असर देखने को मिल रहा है. कच्चा तेल, खाद्य तेल और दालों जैसे अहम आयात की कीमत में तत्काल 20 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिलेगी.'' महंगाई के खिलाफ सरकार की जंग में इसका गंभीर असर होना तय है.

राजकोषीय घाटे के लिहाज से भी इसके गंभीर नतीजे देखने को मिल रहे हैं, क्योंकि इससे सरकार का फर्टिलाइजर और ऑयल सब्सिडी बिल बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2011-12 के लिए सरकार ने पहले ही अपने 4.6 फीसदी के राजकोषीय घाटा लक्ष्य के 1 फीसदी ऊपर जाने का अनुमान जताया है.

निश्चित रूप से यह विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने वाला नहीं होगा, खास तौर से ऐसे समय में जबकि विदेशी संस्थागत निवेशक साल 2011 के दौरान भारतीय शेयर बाजारों से अपना पैसा निकाल रहे हैं.

महंगाई पर अंकुश लगाने में जुटे सरकार के नीति निर्धारक ही इस बात से चिंतित नहीं हैं कि रुपया लगातार नीचे की ओर लुढ़क रहा है. दिग्गज भारतीय कंपनियों पर डॉलर में लिया गया करीब 150 अरब डॉलर का लोन है, जिसे अगले 6 माह में चुकाया जाना है.

कई कंपनियों ने अपने निवेश की हेजिंग (सुरक्षा के उपाय के तौर पर कोई और निवेश) नहीं की है. डॉलर के मुकाबले रुपए में आई 20 फीसदी कमजोरी ने इन कंपनियों के कर्ज के बोझ को बढ़ा दिया है. ऐसे में रुपए की कमजोरी को थामने के लिए भारतीय उद्योग जगत सरकार और रिजर्व बैंक पर दबाव बढ़ा रहा है.

जयंत वर्मा का कहना है कि यह सरकार की चिंता का विषय नहीं होना चाहिए. उनका कहना है कि ''कॉर्पोरेट्स को खुद ही अपने जोखिम की हेजिंग करनी चाहिए.'' अगर हकीकत में देखा जाए तो इंडिया इंक की चिंताएं दूर करने के लिए सरकार के पास ज्‍यादा विकल्प नहीं हैं. इंडस्ट्री पहले ही ऊंची ब्याज दरों के दबाव को झेल रही है. अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक -5.1 फीसदी के स्तर पर रहा. ऐसे में इंडस्ट्री एक और बड़ा झटका झेलने की स्थिति में नहीं है.

विरोधाभासी स्थिति यह है कि रुपए में कमजोरी का जश्न मनाने वाले निर्यातक भी डॉलर के मुकाबले रुपए में आई इस कमजोरी से खुश नहीं हैं. फव्डरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन के प्रेसिडेंट रामू एस. देवड़ा का कहना है, ''कमोडिटीज को छोड़कर किसी भी दूसरे सेक्टर का निर्यातक 25-75 फीसदी कच्चे माल का आयात करता है.'' ऐसे में रुपए की कमजोरी की वजह से लागत बढ़ गई है. उनका कहना है कि ऐसा जरूरी नहीं है कि अतिरिक्त आमदनी अधिक खर्च के खामियाजे की भरपाई कर ही दें.

खुल्लर का कहना है,''जब विदेशी खरीदार मुद्रा में इतनी ज्‍यादा गिरावट देखते हैं तो लाभ का साझा करने की खातिर वे भारतीय निर्यातकों के साथ मोलभाव करने लगते हैं. ऐसे में भारतीय निर्यातकों को न चाहते हुए भी सहमत होना पड़ता है, क्योंकि आयातकों के पास मोलभाव करने की क्षमता होती है. इसके अलावा आयातकों के पास कहीं और से माल खरीदने का विकल्प भी बना रहता है.''

रिजर्व बैंक और वाणिज्‍य मंत्रालय के साथ होने वाली बैठकों में देवड़ा और दूसरे निर्यातक अपनी बात को असरदार तरीके से रख रहे हैं.

स्थिति ऐसे समय में और बदतर हो जाती है, जबकि छोटी अवधि के दौरान रुपए को 49-50 के स्तर पर बनाए रखने के लिए सरकार के पास पर्याप्त संसाधनों का अभाव हो. आरबीआइ ने 15 दिसंबर को रुपए की कमजोरी दूर करने की खातिर जो कदम उठाए, उनका असर पहले ही देखने को मिल चुका है.

एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ''आप सट्टेबाजी के कुछ माध्यमों पर रोक लगा सकते हैं, लेकिन आप बाजार के खिलाड़ियों की उम्मीदों को बदल नहीं सकते हैं.'' रिजर्व बैंक अपने 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार में से कुछ डॉलर बेचकर (और रुपया खरीदकर) इस मामले में दखल दे सकता है.

वैद्यनाथन का मानना है कि रिजर्व बैंक रुपए के बचाव में इस रिजर्व फंड का इस्तेमाल कर सकता है. हालांकि, कुछ दूसरे जानकारों का मानना है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बाजार की ताकतों को मात देने के लिए काफी नहीं होगा. वैश्विक स्तर पर रोजाना रुपए में होने वाला कारोबार करीब 75 अरब डॉलर का है. ऐसे में बाजार पर नियंत्रण के लिए एक बड़े दखल की जरूरत है.

अर्थशास्त्री अजय शाह अपने ब्लॉग में लिखते हैं, ''अगर रिजर्व बैंक अपने भंडार में से 80 अरब डॉलर बेचता है तो बाजार इसे बहुत हल्के में लेगा. ऐसे में 300 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत छोटा नजर आने लगेगा. उनको पता चल जाएगा कि आगे चलकर रुपए का बचाव करना मुश्किल होगा और दुनिया भर के सट्टेबाज इस बात पर सट्टा लगाने लगेंगे कि रुपए की कमजोरी दूर करने के लिए आरबीआइ द्वारा उठाए गए कदम असफल होंगे.''

जयंत वर्मा इस बात से बिल्कुल सहमत हैं. उनका कहना है कि ''विदेशी मुद्रा का यह भंडार मोटे तौर पर उस स्तर के बराबर होगा, जो कि साल 2008 में कोरियाई देशों के लिए पर्याप्त नहीं था.''

नीतिगत मामलों से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ''कॉर्पोरेट्स, निर्यातकों और मीडिया के द्वारा डर जैसा माहौल बनाने के बाद रिजर्व बैंक ने अपने रुख में बदलाव किया है. हकीकत यह है कि छोटी अवधि के दौरान रुपए की कमजोरी रोकने के लिए आरबीआइ के पास करने को ज्‍यादा कुछ नहीं है.''

उनका कहना है, ''किसी भी मामले में रुपए की सही कीमत क्या होनी चाहिए, इसको तय करने का काम सही मायने में काफी हद तक बाजार की शक्तियों के द्वारा किया जाता है.''

वित्तीय सलाहकार फर्म ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के चेयरमैन और वित्तीय सेक्टर के सुधार मामलों पर बनी उच्च स्तरीय कमेटी के पूर्व चेयरमैन पर्सी एस. मिस्त्री का मानना है कि बाहरी कारकों या महंगाई की बजाए रुपए की वैल्यू में तेज गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी और घरेलू निवेशकों का भारत की ग्रोथ स्टोरी पर मजबूती से भरोसा न जम पाना है.

उनका कहना है, ''घरेलू और विदेशी निवेशकों का समुदाय ही डॉलर बनाम रुपए की मांग आपूर्ति के आपसी संबंध को निर्धारित करता है. विदेशी निवेशकों के बीच भारत की ग्रोथ स्टोरी को लेकर सकारात्मक सोच वाली स्थिति नहीं रह गई है और तेजी के साथ कु छ यही रुझान बड़ी भारतीय कंपनियों में बनता जा रहा है.''

एक साल पहले के मुकाबले स्थितियों में अभूतपूर्व बदलाव आया है. मिस्त्री कहते हैं, ''साल 2000-10 के बीच भारत को निवेश करने के लिहाज से तीन सबसे बेहतरीन उभरते बाजारों में शुमार किया गया. लेकिन जब आज विदेशी संस्थागत निवेशकों या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात आती है तो यह 40 उभरते बाजारों में सबसे बदतर स्थिति में है.''

मिस्त्री का कहना है कि साल 1991 के संकट के बाद से उन्होंने भारत को लेकर ऐसा निराशावादी रवैया कभी नहीं देखा है. भारत की ग्रोथ स्टोरी की मजबूती ही रुपए में जान डालने का एक बेहतरीन जरिया है. उनके पास इस बाबत कई सुझाव हैं.

उनका कहना है, ''हमें पब्लिक और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में तेज सुधार की जरूरत है. सरकार को उन अड़चनों को दूर करना चाहिए, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआइ की राह में बाधक हों. एफडीआइ की सीमाएं हटनी चाहिए, चाहे वह 26 फीसदी हो, 49 फीसदी या फिर 74 फीसदी. साथ ही भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को निबटाने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए.''

एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि ''हमारे सभी अहम आर्थिक संकेतक गलत दिशा में बढ़ रहे हैं.

चालू खाते का घाटा (करंट एकाउंट डेफिसिट) बढ़ रहा है, राजकोषीय घाटा खतरे के स्तर पर है, महंगाई लगातार 9 फीसदी पर है और विकास की दर 7 फीसदी के नीचे है, ऐसी स्थितियों में रुपए में और तेज गिरावट देखने को मिलेगी. अगर रुपया-डॉलर की विनिमय दर 60 रु. या इससे नीचे जाती है तो आरबीआइ से ज्‍यादा इसकी दोषी सरकार है. जिसने गलत ढंग से माइक्रो इकोनॉमी को मैनेज किया और नीतियां बनाने के स्तर पर शून्यता आ गई. ऐसे में रुपए की मौत का सारा दोष सरकार पर है.

-साथ में राजेश शर्मा और श्रव्या जैन

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