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चिट्ठी लिखने वाले कांग्रेस नेताओं की आगे की राह क्या है?

सोनिया गांधी को 7 अगस्त को पत्र लिखकर अगले कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव की मांग करने वाले वाले 23 कांग्रेसी नेताओं ने ऐसा करके क्या पाने की उम्मीद की है? क्या वे किसी गांधी को चुनाव में चुनौती दे पाएंगे?

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, ए.के. एंटनी और कपिल सिब्बल (एएनआइ/राहुल सिंह)
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, ए.के. एंटनी और कपिल सिब्बल (एएनआइ/राहुल सिंह)
अपडेटेड 22 सितंबर , 2020

संगठन के पुनर्गठन, वैचारिक नयापन, उपलब्ध और दिखाई देने वाला सशक्त नेतृत्व जैसे सुधारों की मांग उठाते हुए कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक गोपनीय पत्र लिखा था. यह पत्र 24 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक से ठीक एक दिन पहले एक अखबार को लीक किया गया. सीडब्ल्यूसी की बैठक में पत्र लिखने वाले नेताओं जैसे गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, भूपेंदर सिंह हुड्डा, कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक, शशि थरूर औऱ मनीष तिवारी की गांधी परिवार के वफादार नेताओं ने तीखी आलोचना की. कई नेताओं ने तो यहां तक आरोप लगाया कि यह पत्र 23 नेताओं ने दबाव की राजनीति के तहत लिखा है ताकि उन्हें असरदार नियुक्ति संगठन में मिल सके. पत्र लेखक इस बात पर कायम हैं कि वे कांग्रेस के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और चाहते हैं कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने के लिए एक मजबूत लोकतांत्रिक और संगठनात्मक ढांचा तैयार हो.

सीडब्ल्यूसी की बैठक के करीब तीन सप्ताह बाद सोनिया गांधी ने बड़ा बदलाव करते हुए सीडब्ल्यूसी का नए सिरे से गठन किया. इसके तहत खुद की मदद के लिए एक विशेष कमेटी बनाने के अलावा नई सेंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी बनाई और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) में कुछ नए महासचिवों की भर्ती कर उन्हें विभिन्न राज्यों का जिम्मा दिया. इस कसरत में कुछ पत्र लेखक नेता अपना पद बरकरार रखने में कामयाब रहे-कुछ पदोन्नत हुए लेकिन ज्यादातर की उपेक्षा हुई और पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण पद नहीं मिला. इस पुनर्गठन का मुख्य मकसद बागियों की हैसियत दिखाकर यह संदेश देना था कि किसी भी तरह की असहमति की कोई गुंजाइश नहीं है.  

तो क्या इसका मतलब ये है कि बागी पीछे हट जाएंगे? 23 पत्र लेखकों के अघोषित मुखिया गुलाम नबी आजाद के इंडिया टुडे  मैगजीन को दिए गए साक्षात्कार को अगर कोई इशारा समझा जाए तो यह अस्थायी युद्धविराम कहा जा सकता है. सोनिया गांधी के इस सीडब्ल्यूसी पुनर्गठन पर टिप्पणी से इनकार करते हुए राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव छह महीनों के भीतर हो जाएगा जैसा कि 24 अगस्त को हुई सीडब्ल्यूसी की बैठक में तय किय गया है. उन्होंने कहा, “जब एक बार नया अध्यक्ष चुन लिया जाएगा तो मौजूदा सीडब्ल्यूसी विघटित हो जाएगी और पार्टी संविधान के मुताबिक, नई सीडबल्यूसी के गठन के साथ एआइसीसी पदाधिकारी तैनात किए जाएंगे.” 

चुनाव पर जोर देना ये संकेत है कि पत्र लेखकों के पास भविष्य की एक योजना है. आजाद ने तो यहां तक स्पष्ट कर दिया है कि अगर राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर वापसी चाहते हैं तो उन्हें भी चुनाव के रास्ते वापस आना होगा. इस बात की कोई संभावना नहीं है कि गांधी परिवार के किसी सदस्य के खिलाफ कोई चुनाव लड़ेगा जैसा कि 2018 में हुआ था जब राहुल गांधी के विरोध में कोई उम्मीदवार नहीं था. इस तथ्य को जानते हुए कि राहुल का शीर्ष पद पर काबिज होना तय है चाहे वे चुनावी रास्ते से आएं अथवा न आएं, अध्यक्ष पद के लिए चुनाव पर जोर देना एक रणनीति का हिस्सा हो सकता है.

2019 के लोकसभा चुनाव में बहुत खराब प्रदर्शन के बाद अध्यक्ष पद छोड़ने वाले राहुल गांधी ने अब तक इस पद को फिर संभालने की कोई इच्छा जाहिर नहीं की है और सोनिया गांधी भी इसके लिए अनिच्छुक हैं. तीसरी सदस्य प्रियंका गांधी वाड्रा ने शीर्ष पद के लिए कोई मंशा भी जाहिर नहीं की है. ऐसे में गैर गांधी कांग्रेस अध्यक्ष की संभावनाएं बनती हैं और पत्र लेखक चाहेंगे कि नए अध्यक्ष के चुनाव में उनकी भी चले. अगर राहुल गांधी चुनाव पर राजी हुए तो उन्हें चुनौती देने वाला एक अप्रत्याशित उम्मीदवार भी हो सकता है. साल 2000 में सोनिया गांधी ने इस पद को पहली बार चुनाव लड़कर हासिल किया था, तब उनके सामने पत्र लेखकों में एक जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद थे, जिन्हें उन्होंने हराया था. इसके बाद से सोनिया गांधी करीब दो दशकों तक निर्विरोध अध्यक्ष बनी रहीं.  

हालांकि आजाद ये कहते हैं कि उन्हें अगर सोनिया गांधी इस अस्थायी फेरबदल से सहूलियत महसूस कर रही हैं तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं है. गांधी परिवार के एक वफादार इस बात का उल्लेख करते हैं कि सीडब्ल्यूसी के संकल्प में सोनिया गांधी को आवश्यक संगठनात्मक बदलावों के लिए अधिकृत किया गया है. आजाद खुद भी इस संकल्प पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक हैं. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, “संगठनात्मक चुनावों की बात करना और छह महीने की डेडलाइन तय करना निजी लाभ के लिए सौदेबाजी का एक मुखौटा है.” 

कांग्रेस के संकट के पीछे भाजपा का हाथ होने की बात भी कही जा रही है. कांग्रेस सांसद ए. चेल्लाकुमार ने 24 अगस्त की सीडब्ल्यूसी बैठक में दिए अपने भाषण में भाजपा की बड़ी साजिश की ओर इशारा किया था. तमिलनाडु के कृष्णागिरि से लोकसभा सांसद ने कहा कि कुछ कांग्रेस कार्यकर्ता हमेशा उनसे पूछते हैं कि पिछले साल अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर के सभी विपक्षी नेताओं में से गुलाम नबी आजाद कभी गिरफ्तार नहीं किए गए. सच ये है कि सभी पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती लंबे समय के लिए हाउस अरेस्ट किए गए लेकिन कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री आजाद को कभी हिरासत में भी नहीं लिया गया. 

सीडब्लूसी के एक अन्य सदस्य ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर आजाद के भाजपा से कथित संपर्क पर खुलकर कहा. उन्होंने कहा, “भाजपा ने आजाद को एनसीपी या वायएसआरसीपी या बीजेडी की मदद से दोबारा राज्यसभा में भेजने का भरोसा दिया है.” एक नेता का कहना है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार यूनाइटेड कांग्रेस का अध्यक्ष होने का अपना सपना पूरा करना चाहते हैं. 1999 में पवार ने तारिक अनवर और पी.ए. संगमा के साथ कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई थी. तब ये लोग सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से गए थे. पवार को वापस लाकर पार्टी में जान फूंकने की कोशिशों की भी खुसफुसाहट चल रही है. आजाद अपने ऊपर लगे आरोपों पर हंसकर कहते हैं कि जो कांग्रेस नेता ये आरोप लगा रहे हैं उन्हें मेरे कांग्रेस से लंबे जुड़ाव की जानकारी नहीं है. वे कहते हैं ये छोटी सोच है और राजनीतिक समझ का दिवालियापन इससे झलकता है.

आरोप-प्रत्यारोप के बीच कहा जा सकता है कि कांग्रेस में दूर-दूर तक गुटबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है. हालांकि पत्र लिखने वालों के विरोधी कहते हैं कि असंतुष्टों को पार्टी जल्द से जल्द छोड़ देनी चाहिए और उनके जाने से पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. आजाद अपने इरादे साफ जाहिर करते हैं, “अध्यक्ष का चुनाव छह महीनों में होगा. हम अगले अध्यक्ष के समक्ष मुद्दे उठाएंगे.”

अनुवादः मनीष दीक्षित

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