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बाट संग्रह: गुजरे जमाने के गवाह

बाटों में खोज रहे इतिहास के गुम पन्नों में दर्ज कहानियां, भिन्न रिसायतों के तरह-तरह के बाट, जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए होते थे जारी. जब अंग्रेजी हुकूमत ने सिक्के जारी करने का अधिकार छीना तो रिसायतों ने अपनी बात पहुंचाने के जरिए के रूप में बाटों का इस्तेमाल शुरू किया.

अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2011

इतिहास खंगालने के उनके तरीके को भारी-भरकम ही कहा जाएगा. सिक्कों को संग्रहीत करने के शौक के दौरान नजर भार तौलने वाले बाटों पर पड़ी. ध्यान से देखा तो पता चला कि ये महज बाट नहीं बल्कि इतिहास की अनोखी कहानियों के सबूत हैं.

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एमजीएम मेडिकल कॉलेज से सेवानिवृत्त जाने-माने नेत्र चिकित्सक 71 वर्षीय डॉ. प्रदीप  सेठी पिछले कई सालों से अलग-अलग रियासतों के बाट इकट्ठे कर रहे हैं और उनके जरिए उन तमाम अनछुए पहलुओं को खोज रहे हैं, जो हिंदुस्तान के इतिहास को नया नजरिया दे सकते हैं. उनके पास एडी, संवत्‌, फसली और हिजरी सन्‌ के भी बाट हैं.

इंदौर के एमजी रोड पर महाराजा तुकोजीराव होल्कर के पड़ोसी डॉ. सेठी, जो महाराजा की ही तरह एथनिक शिल्प की कोठी में रहते हैं, के पास मौजूद 500 से ज्यादा बाटों में से हरेक की अपनी कहानी है. प्रचार से दूर एकांत में अपना काम कर रहे डॉ. सेठी बताते हैं कि रियासतकाल में बाट सिर्फ सामान तौलने का जरिया भर नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में रियासतों के लिए  राजनीतिक मकसदों का संदेश देने का औजार भी थे. सन्‌ 1902 में अंग्रेजों ने रियासतों से सिक्के जारी करने का अधिकार छीन लिया तो इसे अपनी अस्मिता पर गहरी चोट मान कई रियासतों ने बाटों के जरिए नाराजगी का इजहार किया था.

बाट ऑफ भोपाल्स सहित अपने कई शोधों में डॉ. सेठी इतिहास की परतें खोलते हुए कई किस्से बताते हैं. भोपाल रियासत के बाटों से जुड़ा ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा है भोपाल की सुलतान जहां बेगम का, जिन्होंने रियासत की बागडोर संभालने के सालभर के भीतर 31,000 से ज्‍यादा आदेश निकाले थे. इसके लिए 1905 में, प्रिंस ऑफ वेल्स जॉर्ज पंचम के राज्‍यारोहण के दौरान, दिल्ली में उन्हें नाइट ग्रेड कमांडर की पदवी से सम्मानित किया गया था. उस समय संचार के साधन नहीं थे और न ही सिक्के ढालने का अधिकार था, सो इस खबर को जनता तक पहुंचाने के लिए बेगम ने हिंद रियासत नाइट ग्रेड कमांडर लिखा बाट निकाला. बेगम ने 1925-26 में भी अंग्रेजों को प्रभावित करने के लिए अंग्रेजी में एक बाट निकाला था. इसी तरह इंदौर के महाराजा तुकोजीराव के दूसरे बेटे शिवाजीराव ने बाटों के जरिए अंग्रेजों से अपनी नाराजगी जताई थी. उस समय इंदौर में अफीम का बड़ा कारोबार और मंडी थी, जिस पर अंग्रेज कई-कई माह तक कर नहीं लगाते थे. इस कर चोरी से नाराज महाराजा ने सियागंज में नई समानांतर मंडी शुरू कर और अपनी भाषा में बाट निकाल कर अपना विरोध जताया था. इसी तरह 1905- 1906 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स ग्वालियर आए थे तब ग्वालियर रियासत के बड़े महाराजा माधवराव सिंधिया ने उनसे अपने आत्मीय संबंधों के प्रतीकस्वरूप एक बाट निकाला था. दतिया स्टेट के एक बाट पर वीर दलप शरणदह यानी हम वीर शरण देने वाले हैं दर्ज है. इतिहास बताता है कि दतिया महाराज ने तीन महिलाओं को अपने यहां शरण देकर वीर गति प्राप्त की थी.

डॉ. सेठी, रिचर्ड होल्कर और शशिकांत भट्ट के  सहलेखन में 1976 में स्टडी इन होल्कर स्टेट नामक  किताब भी लिख चुके हैं. वे बताते हैं कि हर रियासत का बाट का मापदंड अलग होता था. कहीं बाट मिट्टी का, कहीं पत्थर का तो कहीं सोने, चांदी या कांस्य का होता था. वे बताते हैं कि वैसे बाट दो तरह का होता है-कच्चा और पक्का बाट. कच्चा बाट दर्ज वजन से आधा माना जाता है. यह पूछने पर कि सबसे हल्का बाट कौन-सा है? वे कहते हैं कि मनु स्मृति  में लिखा है कि धूप की किरण में दिखाई देने वाला धूल का कण सबसे हल्का वजन है.

लगातार बाट संग्रह में जुटे डॉ. सेठी हर रोज चार घंटे बाट शोध पर देते हैं और इतिहास की एक नई कहानी को जान उसका दस्तावेजीकरण करते हैं. उनके घर का एक कमरा बाटों और उनके शोध संदर्भों से भरा पड़ा है. यह शौक महंगा जरूर है लेकिन इतिहास में डुबकी लगाने की कीमत वे नहीं आंकते.

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