गिरीन्द्र नाथ झा/ लॉक डाउन डायरीः आठ
लिखना जारी है, इस दौर में जो आप भोग रहे हैं, उसे लिख देना आसान नहीं है. क्योंकि लिखना और जीना दोनों ही बहुत अलग चीज है. दरसअल जो लिख देते हैं वो सच में बड़ी खूबसूरत दुनिया देखते हैं और जो लिख नहीं पाते वो देखते हैं...भोगते हैं जीवन के उतार-चढाव को...
इन दिनों हम सब अपने-अपने हिस्से का एकांत जी रहे हैं और अपना अपना एकांत हमें भयभीत कर रहा है.
चनका मेरा गांव, जहां खेती-बाड़ी है, वहां गए कुल 14 दिन हो गए. मक्का का फसल खेत में खड़ा होगा, उसे पानी चाहिए था. दुआर पर ढेर सारी घास उग आई होगी, दुआर भी सफाई मांग रही होगी...
इस मौसम की सब्जियां भी उदास पड़ी होगी खेत में. परवल लगाया था, उसकी लत्ती को सहारा चाहिए होगा ताकि वो जमीन से ऊपर उठकर फल सके, अभी तो वो जमीन में ही लेटी होगी. आम - लीची का मंजर सेवा मांग रहा होगा, उसके जड़ को पानी चाहिए लेकिन अभी कुछ भी संभव नहीं...
यह सब सोचते हुए भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता पढ़ने लगता हूं -
"क्या करोगे इस बार
इन सबका दुख गाओगे या नहीं
पिछले बरस कुछ सरस भी था
इस बरस तो सरस कुछ नहीं दीखता
इस बार क्षीणता को
दीनता की मलीनता को ,
भूख को वाणी दो
उलट-पुलट की संभावना को पानी दो.."
इधर, महानगरों में काम करने वाले लोगों के लौटने की ख़बर सुनी है. सोशल मीडिया पर आनंद विहार की तस्वीरें देखकर मन दुखी हो गया. प्रवासियों का दर्द क्या होता है, हम सब यह जानते हैं.
इन सबके बीच लॉक डाउन में पूरी तरह शहर वाले घर में बंद हूं. पूर्णिया जिला प्रशासन ने खाद्य सामग्री और दवाई की होम डिलेवरी की व्यवस्था की है, इसलिए सामान की दिक्कत नहीं होती है. घर में बैठे-बैठे कभी लगता है कि क्या कर रहे हैं ? यह सवाल 24 घंटे में एक बार मन को जरूर तोड़ देता है. फिर किताबों की दुनिया में लौट जाता हूं.
लॉक डाउन से पहले नागार्जुन रचनावली खरीदी थी, सात खंड में है यह रचनावली. उसे पढ़ने बैठ जाता हूं. इसके अलावा पंखुड़ी को स्कूल की तरह पढ़ाने की कोशिश करता हूं. उसे पढ़ाते हुए अपने बचपन का स्कूल जीने लगता हूं. रेडियो खूब सुनता हूं, ऑल इंडिया रेडियो पर समाचार सुनता हूं, टेलीविजन एकदम नहीं देखता हूं. टेलीविजन से मुक्त हुए तीन साल हो गए हैं.
यह सब करते घर की चहारदीवारी में वक़्त गुजर रहा है. सबसे अधिक याद चनका की आती है क्योंकि वहां रोजाना जाना होता था लेकिन बीमारी के संभावित संक्रमण की वजह से घर में लॉक डाउन हूं. ऐसे में आंखों की नींद अक्सर गायब हो जाती है. चनका रेसीडेंसी का क्या होगा? यह सवाल भी मन में उठता है, कि तभी यह भी सवाल मन पूछता है कि इस कठिन दौर में तुमने क्या किया ? 27 मार्च की रात ऐसे ही सवाल मन में उठते रहे, रात भर.
28 मार्च की सुबह अपने लिए एक सवाल खड़ा किया कि हम अपने स्तर से इस कठिन दौर में क्या कर सकते हैं? मन ने जवाब दिया कि चनका रेसीडेंसी अपना आवासीय परिसर और कमरे जिला प्रशासन को इस्तेमाल करने के लिए देना चाहता है. प्रशासन यदि चाहे तो वहां मेडिकल कैंप लगा सकता है, या कुछ और भी कर सकता है.
बस, फिर क्या था हमने यह बात जिला प्रशासन तक पहुंचा दी. दरअसल हम कुछ कर सकते हैं, हम किसी की सहायता कर सकते हैं, मदद पहुंचा सकते हैं, जैसी बात भरम है और हमलोग भरम में अपना जीवन गुज़ार देते हैं. मैं भी कुछ पल के लिए इसी भरम को पाल बैठा और लगा कि शायद मैं भी इस कठिन वक़्त में समाज के लिए कुछ कर पाऊं...
भगवतीचरण वर्मा की एक किताब है, 'सबहिं नचावत राम गोसाईं ' इस किताब से परिचय मित्र - भाई सुशांत झा ने करवाया था, जब भी भरम के फेर में फंसता हूं तो इस किताब को याद कर लेता हूं.
खैर, आभासी दुनिया में कई लोग इस लॉक डाउन में भी सेवा भाव लिए काम कर रहे हैं, वे सब खूब सक्रिय हैं. और हां, फेसबुक लाईव भी खूब हो रहा है. यह सब देख रहा हूं, कुछ कुछ नोट कर लेता हूं ताकि जब यह भी वक्त गुज़र जाएगा तब सबकुछ यादों में बना रहे.
लॉक डाउन के बाद दुनिया कैसी होगी, इस विषय पर जब सोचता हूं तो आसमान देखने लगता हूं, नीला आसमान, एकदम साफ...आसपास की चुप्पी निहारने लगता हूं. गिनती की गाड़ी की आवाज सुनने लगता हूं. हर सुबह चिड़िया चुनमुन की आवाज़ में खोने लगता हूं.
रात में पहर दर पहर उन चिड़ियों की आवाज सुनता हूं जिसे केवल चनका (गाम ) में सुनता था, यह सब लॉक डाउन की अवधि का हासिल है, फिलहाल तो यही सोच रहा हूं.
अनुपम मिश्र को पढ़ता हूं और उनकी इस बात को आज की लॉक डाउन डायरी में अंकित कर अपने हिस्से का एकांत में प्रवेश कर जाता हूं -
" इस दुनिया में हम कितने भी बड़े उद्देश्य को लेकर दीया जलाते हैं, तेज़ हवा उसे टिकने नहीं देती. शायद हमारे जीवन के दीये में पानी ही ज़्यादा होता है, तेल नहीं. स्नेह की कमी होगी इसलिए जीवन बाती चिड़चिड़ तिड़तिड़ ज़्यादा करती है, एक सी संयत होकर जल नहीं पाती. न हम अपना अँधेरा दूर कर पाते हैं , न दूसरों का. हम थोड़ा अपने भीतर झांकें तो हममें से ज़्यादातर का जीवन एक तरह से कोल्हू के बैल जैसा बना दिया गया है. हम गोल गोल घूमते रहते हैं आँखों पर पट्टी बांधे. "
(गिरीन्द्रनाथ झा किसान-साहित्यकार हैं. यह लॉकडाउन डायरी उन्होंने बिहार के शहर पूर्णिया से भेजी है. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं. उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)
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