सामान्य से कम मानसून से यूपीए-2 सरकार के लिए खतरे की घंटी बजने का अंदेशा है. यह आफत उस वक्त आई है जब देश आर्थिक मंदी की आशंका से जूझ रहा है. बरसात में देरी हुई तो खरीफ की बुआई पर तो असर पड़ेगा ही, जिसका असर धान, तिलहन और दलहन की पैदावार पर पड़ना निश्चित है, इसके अलावा यह अर्थव्यवस्था और देश के आर्थिक मूड को प्रभावित कर सकता है.
2011-12 में भारत में धान की कुल पैदावार 10.3 करोड़ टन थी. पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव पी.के. बसु का अनुमान है कि मानसून जुलाई भर अगर इसी तरह आंख-मिचौली करता रहा तो इस साल यह आंकड़ा कम-से-कम 1 करोड़ टन कम हो सकता है. ऐसा नहीं है कि मार सिर्फ भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ रही है.
1 जुलाई तक देश के केवल 16 फीसदी इलाकों में औसत बारिश हुई है. शहरी भारत जबरदस्त गर्मी और बार-बार बिजली कटौती की चपेट में है. मिसाल के तौर पर दिल्ली में 33 साल की सबसे जबरदस्त गर्मी पड़ी है और मई-जून में औसत अधिकतम तापमान 41.57 डिग्री सेंटीग्रेड दर्ज किया गया.
भारत की जल समस्या के लिए हर कोई मानसून को दोषी मानता है, लेकिन वास्तव में बात इतनी सरल नहीं है. जैसा कि जल संरक्षणवादी और मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह इंडिया टुडे से कहते हैं, ''वर्षा के लिहाज से पानी की कमी नहीं है. असल में एक मुल्क के तौर पर हम इसका बेहतर ढंग से उपयोग कर पाने में नाकाम रहे हैं.''
देशभर में भूजल का स्तर लगातार घट रहा है. आंकड़े चौंकाने वाले हैं, देश का 72 फीसदी हिस्सा 'चिंताजनक क्षेत्र' के तहत आता है, जहां भूजल का जरूरत से ज्यादा दोहन किया गया है. और किसी ने भी जल संचयन और जलाशयों को भरने के तरीकों को आजमाने की परवाह नहीं की है.
नीति निर्माण के मोर्चे पर नाकामी और जल प्रबंधन के क्षेत्र में हमारे दिवालिएपन की वजह से तेजी से फैलते भारत को, पानी की कमी से जूझ रहे हताश भारत में तब्दील कर दिया है. भूजल में मौजूद खतरनाक फ्लोराइड के कारण कर्नाटक में आठ वर्षीय पूर्णी के दांतों और अंगों का क्षरण हो रहा है. वह सहजता से हिलडुल तक नहीं पाती.
40 वर्षीय संजय सिंह यादव जैसे रेत ठेकेदार बिहार में पैसा कमा रहे हैं क्योंकि नदियां सूख गई हैं. बोरवेल के इस्तेमाल को लेकर दंगे होते हैं, नतीजा मौत, कैद, वंचना और पूरे परिवार के लिए निराशा के रूप में सामने आता है, जैसा कि छत्तीसगढ़ के 60 वर्षीय रामकुमार यादव के मामले में हुआ. दिल्ली के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक बाड़ा हिंदू राव अस्पताल में 16 जून से 23 जून के बीच एक हफ्ते में 40 ऑपरेशन पानी की कमी की वजह से रद्द करने पड़े.
केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री विलासराव देशमुख जैसे बड़े नेताओं सहित कई नेताओं पर महाराष्ट्र में दुर्लभ पानी की धारा को मोड़कर अपने निर्वाचन क्षेत्रों में ले जाने और बाकी लोगों को उनके अपने हाल पर छोड़ देने के आरोप हैं.
मैक्सिको स्थित थर्ड वर्ल्ड सेंटर फॉर वॉटर मैनेजमेंट के अध्यक्ष असित के. बिस्वास कहते हैं कि देश में जलसंकट से निबटने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति का पूरी तरह अभाव है. उनके शब्दों में, ''नेता जबानी जमाखर्च करते हैं, लेकिन कोई भी कु छ भी करने के बारे में गंभीर नहीं है. जरूरत कड़े फैसलों की है. लोगों को अपने अधिकार के तौर पर स्वच्छ पानी की मांग करनी चाहिए.''
चाहे शहरी भारत हो या ग्रामीण भारत, पानी की आपूर्ति और उसकी गुणवत्ता की हालत बदतर है. लखनऊ में अगर साढ़े 8 लाख लोग पानी के लिए पांच घंटे कतार में खड़े होते हैं और उनमें से ढाई लाख लोग सुबह चार बजे से आकर खड़े होते हैं, तो टैंकरों द्वारा पानी की आपूर्ति के लिए पुणे के उभरते हुए प्रभात रोड क्षेत्र में रहने वाले विश्वंभर चौधरी हर दूसरे दिन 1,100 रु. यानी महीने के 16,500 रु. देते हैं.
बंगलुरू के कुल क्षेत्रफल के एक-तिहाई इलाके में हर दूसरे दिन आठ घंटे पानी की आपूर्ति की जाती है; और बाकी लोग लगातार नीचे जाते भूजल स्तर और स्लम क्षेत्रों से भी पांच रु. प्रति बर्तन की दर से शुल्क वसूलने वाले टैंकरों के बूते अपनी व्यवस्था अपने आप करते हैं.
हैदराबाद की हालत और भी खराब है. हैदराबाद के बीचोबीच येल्लारेड्डीगुड़ा में इंजीनियर्स कॉलोनी में रहने वाले 34 वर्षीय सॉफ्टवेयर उद्योग कर्मचारी श्याम कुमार चपराला को नल से पानी एक दिन छोड़ दूसरे दिन मिलता है, वह भी सुबह 4 बजे से और दो घंटे के लिए. 12-अपार्टमेंट ब्लॉक के सभी निवासी हर हफ्ते पैसे जुटाकर 5,000 लीटर का एक टैंकर पानी 600 रु. में खरीदते हैं. लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले बाकी लोगों को, यहां तक कि तकनीकी विशेषज्ञों के भारी शोर-शराबे वाले और आसमान छूते माधापुर और कोंडापुर के अपार्टमेंट ब्लॉकों तक को वह भी नसीब नहीं है.
मेट्रोपॉलिटन हैदराबाद के नए इलाकों में रहने वाले 3 लाख से अधिक परिवारों को अगर चार या पांच दिन में एक बार पानी की आपूर्ति हो जाती है, तो वे खुद को भाग्यशाली मानते हैं. थक-हारकर वे भारी रकम खर्च करके टैंकर से आपूर्ति करवाते हैं. भूमिगत जल पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से जयपुर के कु छ क्षेत्रों में भूमिगत जल के स्तर में पिछले 15 वर्ष में पांच गुना गिरावट आ गई है, जो 100 फुट था, वह अब 500 फुट पर है. इस बीच राज्य सरकार उन क्षेत्रों में अपार्टमेंट्स और मॉल्स को मंजूरी देती जा रही है जहां पानी की आपूर्ति है ही नहीं.
फिर भी, शहरों में रहने वाले लोगों को कम-से-कम उनकी जरूरत लायक पानी मिल जाता है या वे सत्ता पर दबाव डालने और उसके खिलाफ हंगामा खड़ा करने की स्थिति में होते हैं. जल संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में औसत एक व्यक्ति प्रति दिन 150-200 लीटर पानी का उपयोग करता है, जबकि गांवों में मात्र 20 लीटर. उधर केंद्र सरकार एक दशक से ज्यादा समय से केंद्रीय जल नीति बनाने में नाकाम रही है. बहस मात्र इस बारे में हो रही है कि पानी की आपूर्ति का निजीकरण किया जाना चाहिए या नहीं. जो इसका विरोध करते हैं, वे यह हौवा खड़ा कर रहे हैं कि पानी की अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से पर कॉर्पोरेट जगत कब्जा करना चाहता है.
छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का सिंघनपुरी गांव पिछले महीने पानी के कारण हुई खूनी लड़ाई का गवाह बना. यहां के एक ही परिवार में दो साल पहले हुए बंटवारे के कारण साझे में खुदा बोरवेल एक परिवार के पास चला गया और दूसरा परिवार सरकारी हैंडपंप से काम चलाता रहा. इस साल की भीषण गर्मी में सरकारी हैंडपंप सूख गया और दोनों परिवार बोरवेल के पानी को लेकर भिड़ गए. जिसमें तीन लोग मारे गए और 13 लोग गिरफ्तार हुए.
इस क्षेत्र में अन्य गांवों ने 2006 में पानी की गंभीर कमी का सामना किया है, जिसमें पांच सदस्यों के परिवारों ने 40 लीटर प्रति सप्ताह से कम पानी में गुजारा किया है. उसके बाद से 500 से ज्यादा कुएं और सार्वजनिक नल सूख चुके हैं. अनियोजित खुदाई के कारण सारी झीलें सूख चुकी हैं.
पौनी गांव के 38 वर्षीय राजा ठाकुर कहते हैं, ''मुंगेली में नदी-तालाब के पर्याप्त पानी की कमी हमेशा रही है. ऐसे भी दिन रहे हैं, जब मेरी पत्नी को कीचड़ भरे पानी का प्रयोग खाना बनाने में करना पड़ता था. कई बार हमें गैस की खाली लालटेनों में पानी बचा कर रखना पड़ता था. दो साल पहले तक मेरी आठ वर्षीया बेटी को रोजाना 2 किमी जाकर अपने सिर पर 13 लीटर पानी ढोकर लाना पड़ता था.
नलकूपों (बोरवेल) ने इस हालत को और उनके जीवन को बदल दिया. 20,000 रु. तक सब्सिडी सरकार दे देती थी और उसके बूते ग्रामीण 10,000 रु. लगाकर एक नलकूप स्थापित करवा लेते थे. लेकिन नलकू प संघर्ष का मैदान हो गए हैं. राज्यसभा सांसद और जल संसाधनों पर संसदीय समिति के सदस्य अनिल दवे कहते हैं, ''निकट भविष्य में पानी को लेकर संघर्षों में वृद्धि ही होनी है. जल के वितरण के लिहाज से ग्रामीण और शहरी विभाजन बहुत तीखा है.''
पानी के लिए संघर्षों में संभवतः एक अपवाद आंध्र प्रदेश में मदकशिरा के लोगों का है, जो कहते हैं कि कर्नाटक में अपने पड़ोसी तालुका पावागडा के साथ पीने के पानी की हिस्सेदारी करने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. उन्हें यह पानी 200 किमी लंबी पाइपलाइन से मिलता है. हालांकि दोनों राज्यों के नेता इससे सहमत नजर नहीं आते.
पाइपलाइन से पीने के पानी के नल की सुविधा सबसे पहले प्राप्त करने वाले गांव चित्तनडकू के 35 वर्षीय गुरुमूर्ति बताते हैं कि यहां एक ट्यूबवेल पहले से ही है, जो पास के एक तालाब से पानी की आपूर्ति करता है. वे कहते हैं, ''हमें पाइप से पीने के पानी की जरूरत है, लेकिन हम कम पानी से गुजारा चला सकते हैं. पावागडा के लोगों को भी पानी मिलना चाहिए.''
ऐसा शायद इस कारण है क्योंकि पावागडा की स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी स्थिति का सामना पाइपलाइन आने के पहले तक मदकशिरा किया करता था. पावागडा थार के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े शुष्क क्षेत्र में आता है. पावागडा में भूजल 1,500 फुट की गहराई पर ही मिलता है, और सारी जनता वही पानी पी रही है. पलावल्ली गांव में, जो पावागडा के सबसे ज्यादा प्रभावित नगलमडिके होब्ली का हिस्सा है, सभी बच्चों के दांतों में क्षरण की लकीरें खिंची हुई हैं. उनके बाल गिर रहे हैं, जबकि नारायण नेत्रालय जैसे बंगलुरू के प्रतिष्ठित नेत्र अस्पतालों ने उन स्कू ली बच्चों की कई सूचियां जारी की हैं, जो आंखों की रोशनी खो चुके हैं.
बुजुर्ग लोग झुक सकने में असमर्थ हैं, क्योंकि उनकी कमर, घुटनों और टखनों में बहुत बड़ी मात्रा में फ्लोराइड जमा हो चुका है, जिसके कारण जरा भी हिल-डुल सकना असंभव है. और अधिकांश लोगों को, चाहे उनकी उम्र 25 वर्ष हो या 50 वर्ष, जोड़ों में दर्द की शिकायत है. लेकिन दर्द से कहीं ज्यादा चिंताजनक दैनंदिन जीवन के संघर्ष हैं. जब ग्रामीणों से स्नान करने, कपड़े और बर्तन धोने के लिए पानी के बारे में पूछा जाता है, तो वे हंसते हैं, कंधे उचका देते हैं, या सिर हिला देते हैं. 28 वर्ष की अंजम्मा कहती हैं, ''मैं कई महीनों से स्नान नहीं कर सकी हूं. उन्हें अपने पति, तीन बच्चों और खुद के लिए पीने का पानी जुटा पाना ही मुश्किल लगता है.
उत्तर भारत में भी हालात अच्छे नहीं हैं. बिहार के नवादा जिले के नरहट गांव के जालापुर गांव के संजय सिंह यादव पूरे यकीन से नहीं बता सकते कि बराकर नदी की एक छोटी सहायक नदी तिलैया के सूख जाने से उन्हें खुशी हो रही है या वे उदास हो रहे हैं. यादव कहते हैं, ''यह विडंबना है. मैं खुश हूं, लेकिन मैं भुगत भी रहा हूं.'' यादव उस ठेकेदार के मैनेजर हैं, जो नदी से रेत बेचता है.
नदी सूखने से रेत की बिक्री से उसे अच्छा खासा कमीशन मिला है; लेकिन रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए पानी दूभर हो गया है. वे कहते हैं, ''गांव में कुछ हैंड पंप अभी भी काम करते हैं. कु छ में से एक घंटे तक खींचने के बाद भी एक बाल्टी से ज्यादा पानी नहीं निकलता.'' भूजल स्तर स्पष्ट रूप से नीचे चला गया है.'' कोई नहीं जानता कि जालापुर गांव कहां समाप्त होता है और जरहिया गांव कहां से शुरू होता है. पहले नदी इन दोनों गांवों के बीच सीमा हुआ करती थी.
यदि आप नवादा में आसमान छूती रियल इस्टेट की कीमतों के लिहाज से देखें, तो 28 वर्षीय संतोष कुमार काफी अमीर व्यक्ति होने चाहिए, जिनकी बिसीयत गांव में कई एकड़ जमीन है. लेकिन कुमार अपने पैतृक गांव से 40 किमी दूर, नवादा जिला मुख्यालय में, सिर्फ 3,000 रु. महीने के लिए एक निजी चिकित्सा कंपाउंडर का काम कर रहे हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि बिसीयत में पानी नहीं है. वह नवादा में अपनी पत्नी कौशल्या और अपने तीन बच्चों के साथ अपने मामा के घर में एक कमरे में रहते हैं.
एक 42 वर्षीय ग्रामीण साधु यादव कहते हैं, ''बिसीयत में हम सूखे का सामना कर रहे हैं. हमारी कृषि खत्म हो गई, हमारे शरीर मुरझाए हुए हैं, और प्रशासन हमारी बात नहीं सुनता है.'' 45 वर्षीय बसंत दास ने इस डर से अपनी बेटी की शादी स्थगित कर दी है कि पानी के ऐसे भीषण संकट में उसके लिए शादी में मेहमानों की मेजबानी करना असंभव हो जाएगा.
नवादा जिले में मैसकाउर थाना इस बात की पूरी कहानी कह डालता है कि चल रहे पानी के संकट ने किस तरह बिहार के इस हिस्से में किसी को भी नहीं बख्शा है. पुलिस परिसर में लगाए गए पांचों हैंडपंप सूख चुके हैं. एक स्कूल में लगे पंप से पानी लाने के लिए विशेष सहायक पुलिस सहित दूरदराज की इस चौकी पर तैनात पुलिसकर्मियों को एक ऊबड़-खाबड़ चट्टानी इलाके को पार करना पड़ता है और फिर रोजाना लगभग 1 किमी चलना पड़ता है.
यह चौकी नवादा-गया सीमा पर स्थित है, जो नक्सलवादी गतिविधियों का एक बड़ा अड्डा है, लिहाजा पुलिसवाले समूहों में जाते हैं और साथ में हथियार ले जाते हैं. एक पुलिसकर्मी कहते हैं, ''हमारी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिससे हमारी हैसियत माओवादियों के आगे एक आसान शिकार जैसी रह गई है, लेकिन हमें पानी के लिए जोखिम लेना ही होता है.''
राजस्थान में शहरों की स्थिति भयावह है. सरकारी दावों के अनुसार, कुल 1 करोड़ 70 लाख की शहरी आबादी में से, 70 लाख लोगों को सरकारी पानी की आपूर्ति 24 घंटे में एक बार भी नहीं हो पाती. राजस्थान में 220 कस्बे हैं, जिनमें से बाड़मेर, बालोतरा और सोजत में चार दिनों में एक बार पानी की आपूर्ति की जाती है. राज्य में सत्रह कस्बों और शहरों में पानी की आपूर्ति 72 घंटों में एक बार, 60 कस्बों में दो दिन में एक बार और 136 कस्बों और शहरों में 24 घंटे में एक बार की जाती है. आधी ग्रामीण आबादी हैंडपंपों पर निर्भर है, जो उसके लिए पीने के पानी का एकमात्र स्त्रोत हैं.
1990 के बाद से भूजल स्तर खतरनाक ढंग से हर वर्ष औसतन डेढ़ मीटर नीचे चला गया है और राज्य के 237 में से 199 ब्लॉक उन क्षेत्रों में हैं, जहां भूजल को 'जरूरत से ज्यादा दोहन किया जा चुका' घोषित किया गया है. इसके बावजूद, पंपों से बाहर निकाले गए भूजल का सिर्फ 10 प्रतिशत पीने के लिए प्रयोग किया जाता है. राजस्थान के लोक स्वास्थ्य और इंजीनियरिंग विभाग के प्रधान सचिव पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ''पिछले तीन दशकों से राज्य के किसान पशुपालन और चारे की खेती छोड़कर ड्रिप-सिंचाई के जरिए भारी पैमाने पर पानी का इस्तेमाल करने वाली खेती करने लगे हैं. इसका दुष्परिणाम पीने के पानी पर पड़ा है.''
रांची विश्वविद्यालय के एक भूविज्ञानी रितेश प्रियदर्शी का कहना है कि पानी के सार्वजनिक पाइपों और बोरवेल दोनों के निर्माण में सरकार की योजनाओं के साथ समस्या भूवैज्ञानिक अनुसंधान और अंतर्दृष्टि की कमी की है. वे कहते हैं, ''भूवैज्ञानिक विशेषज्ञों से सलाह क्यों नहीं ली जाती है? आप कार्यालय में बैठकर, एक साइट पर पांच बार जाकर एक योजना का मसौदा तैयार नहीं कर सकते.
आपको क्षेत्र का अध्ययन करना चाहिए. क्या भूजल पीने के लिए फिट है? क्या कुओं और झीलों को पुनर्जीवित किया जा सकता है? ये वे सवाल हैं जिनकी पड़ताल होनी चाहिए और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा उनका उत्तर दिया जाना चाहिए. केवल तभी हम पानी की खपत विवेकपूर्ण तरीके से करने की योजना बना सकते हैं, जिससे क्षेत्र के संसाधनों को बरकरार रखा जा सकता है.''
-साथ में देवेश कुमार, भावना विज-अरोड़ा, रोहित परिहार, अमरनाथ के. मेनन, दिनेश सी. शर्मा, किरण तारे, पीयूष श्रीवास्तव, सोनाली आचार्जी और अमिताभ श्रीवास्तव

