रूस के संविधान के अनुसार कोई राष्ट्रपति लगातार केवल दो कार्यकाल तक ही सत्ता में बना रह सकता है. व्लादिमीर पुतिन 2000 से 2008 तक रूस के राष्ट्रपति थे. येल्तसिन के दौर के तमाम उलट-पुलट के बाद देश के राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय आत्मसम्मान को बहाल करवाने के चलते अत्यंत लोकप्रिय पुतिन यदि चाहते तो जनता के व्यापक समर्थन से संवैधानिक संशोधन के जरिए एक और कार्यकाल हासिल कर सकते थे.
नए-नवेले रूसी लोकतंत्र के सांस्थानिक आधार को कमजोर होने से बचाने के लिए उन्होंने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया, लेकिन आखिरकार सत्ता के तर्क ने सिद्धांत को मात दे दी और पहले गलत कदम के रूप में पुतिन ने अपने कृपापात्र दिमित्री मेदवेदेव को क्रेमलिन में अपने उत्तराधिकारी के रूप में तैनात करवाने के लिए गोटियां बिछाईं और खुद चार और साल की सत्ता हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री बन बैठे जो शाब्दिक रूप से संविधान के विपरीत भले न रहा हो लेकिन उसकी आत्मा/भावना के विपरीत था.
पुतिन पश्चिम में अलोकप्रिय हो गए जब उन्होंने लोकतंत्र के नाम पर रूस की घरेलू राजनीति में हेर-फेर करने और बाजार अर्थव्यवस्था की आड़ में देश के विशाल प्राकृतिक संसाधनों को नियंत्रित करने के मकसद से बाहरी लोगों के लिए दरवाजे बंद करना शुरू कर दिए.
अमेरिका और ब्रिटेन में उनके प्रति विरोध भाव ज्यादा है क्योंकि वे कथित रूप से अपनी प्रतिगामी नीतियों पर लगातार उनकी कड़वी टिप्पणियों को चुटकी में उड़ाते रहे हैं.
प्रधानमंत्री के रूप में, खुले विचारों वाले खुशमिजाज नेता के उनके छवि-निर्माण को युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को और आगे बढ़ाने वाला समझ गया था, लेकिन नौकरशाही और न्यायिक प्रणाली में वादे के अनुरूप सुधारों को लागू करने, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और सुरक्षा प्रतिष्ठान पर अंकुश लगाने जैसे काम उनकी प्राथमिकताओं में पिछड़ते जा रहे हैं. लिहाजा, समाज का बड़ा तबका खासकर युवा और उद्यमी मौजूदा व्यवस्था में घुटन महसूस कर रहा है.
2009 में नकारात्मक 7.8 फीसदी विकास दर के साथ रूस पर 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट का जबरदस्त प्रभाव पड़ा. बड़े मुद्रा भंडार और तेल की ऊंची कीमतों ने गिरावट के असर को कम जरूर किया मगर धीमी विकास दर (2010 में 4 फीसदी और 2011 में लगभग 4.3 फीसदी) ने कमोडिटी के निर्यात पर अर्थव्यवस्था की असंतुलित निर्भरता, मैन्युफैक्चरिंग में सुस्ती और तकनीकी विकास को प्रेरित करने में असफलता ने पुतिन सरकार के प्रदर्शन पर दाग लगाने का काम किया.
ड्यूमा के 4 दिसंबर को हुए चुनावों ने भी जनता की नकारात्मक मनोदशा को प्रतिबिंबित किया, जिसमें सत्तारूढ़ यूनाइटेड रसिया पार्टी के मतों का हिस्सा 64 फीसदी से गिरकर 50 फीसदी से भी थोड़ा नीचे आ गया.
चुनाव में धांधली के आरोपों ने मॉस्को में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रदर्शनों को प्रेरित किया. पुतिन पर उंगलियां उठीं, जिससे लोकप्रिय नेता की उनकी छवि पर बट्टा लगा. हिलेरी क्लिंटन ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की मांग करते हुए लोकतंत्र का कोड़ा चलाने में देरी नहीं की और बदले में पुतिन ने भी हस्तक्षेप न करने की तीखी चेतावनी दे डाली. लेकिन विरोध प्रदर्शनों को उकसाने के लिए अमेरिका पर आरोप मौजूदा राजनैतिक व्यवस्था से मध्य वर्ग के मतदाताओं के अलगाव को नजरअंदाज करता है.
रूसी सरकार ने अस्वाभाविक लचीलेपन के साथ जनता के विरोध प्रदर्शनों को संभाला है, उसे पता है कि दमन सड़क की चुनौती को और बढ़ा सकता है-ट्यूनीशिया और मिस्त्र के उदाहरण सरकारों के सामने हैं. पुतिन ने सरकार की लोकप्रियता में गिरावट को स्वीकार किया है; मार्च में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को विवाद से बचाने के लिए कुछ तुष्ट करने वाले चुनाव सुधारों को लागू किया जाएगा.
सितंबर में राष्ट्रपति पद की अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के समय, मेदवेदेव के साथ 2008 में हुए उस समझैते को सार्वजनिक करना पुतिन का गलत कदम था कि वे 2012 में अपने पदों की अदला-बदली कर लेंगे. इससे मतदाताओं में यह संदेश गया कि सत्ता के मुख्य पदों पर नियुक्ति के फैसले जनता के हाथों में नहीं हैं. संशोधित संविधान के तहत पुतिन छह वर्षों के लिए अब राष्ट्रपति होंगे और संभवतः उसके बाद छह और वर्षों के लिए भी.
पुतिन थोड़े निराश अवश्य हो सकते हैं लेकिन वे किसी भी तरह मैदान से बाहर नहीं हुए हैं. विभाजित विपक्ष के पास उनके खिलाफ खड़ा करने के लिए कोई कायदे का उम्मीदवार तक नहीं है. यदि पुतिन प्रथम मतदान में 50 फीसदी वोट हासिल करने में नाकाम रहते हैं और उन्हें दूसरे चक्र के मतदान के लिए जाना पड़ता है तो उनके विरोधी उनका कद कम करके संतुष्ट महसूस करेंगे. लेकिन एक बार जब वे राष्ट्रपति हो जाएंगे तो इसका शायद ही कोई मतलब रहे.
खासकर, मतदाताओं की अधीरता को देखते हुए वे और अधिक उद्देश्यपूर्ण ढंग से रूस के पुनरुत्थान का अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दें जिसे पश्चिम रोकना चाहता है.
पुतिन ने भारत के साथ एक मजबूत सामरिक भागीदारी स्थापित की है. हमारे पास उनके प्रति पश्चिम के द्वेष को साझ करने की कोई वजह नहीं है. क्रेमलिन में एक बार फिर व्लादिमीर पुतिन का होना भारत-रूस रिश्तों के लिए फायदेमंद है. रूस में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के उतार-चढ़ाव में हमारा कोई भू-राजनैतिक हित नहीं है और यह मुख्यतः रूसी जनता की चिंता का विषय है.
कंवल सिब्बल भारत के विदेश सचिव रहे हैं.

