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छोटी सी बात पर ब्रजभूमि में फैली हिंसा

वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद जहां पूरा प्रदेश सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था, वहीं मथुरा का कोसीकलां इलाका शांत रहकर प्रेम और सौहार्द का संदेश दे रहा था. लेकिन ब्रजभूमि के इस इलाके में बीते दिनों जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था.

अपडेटेड 12 जून , 2012

वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद जहां पूरा प्रदेश सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था, वहीं मथुरा का कोसीकलां इलाका शांत रहकर प्रेम और सौहार्द का संदेश दे रहा था. लेकिन ब्रजभूमि के इस इलाके में बीते दिनों जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था.

यह इलाका राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-2 पर दिल्ली और आगरा के बीचोबीच है. हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सीमा के मिलान बिंदु पर मौजूद कोसीकलां दिल्ली से नजदीक होने के कारण औद्योगिक क्षेत्र भी है.

1 जून की दोपहर करीब दो बजे कोसीकलां के सराय शाही स्थित धार्मिक स्थल के बाहर रखे पानी से भरे ड्रम में एक युवक ने हाथ डाल दिया. इस मामूली-सी बात ने इतना तूल पकड़ा कि दो संप्रदायों के लोग आमने-सामने आ गए. दोनों पक्षों में पथराव शुरू हो गया. और देखते-देखते इलाका सांप्रदायिक दंगे की चपेट में आ गया. दोनों पक्षों के लोग लामबंद होने लगे और फिर शुरू हुआ आगजनी, तोड़फोड़ का तांडव.

उपद्रवियों ने मकान, गोदाम, दुकानों, गैरेजों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया. घरों में घुसकर महिलाओं से अभद्रता की. करीब छह घंटे चले खूनी संघर्ष में चार लोग मारे गए, 16 घायल हुए, 36 मकानों को जला दिया गया और 15 दोपहिया और चौपहिया वाहन फूंक दिए गए.

कोसीकलां में हुए सांप्रदायिक दंगों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी ऐसी घटनाओं से निपटने में सक्षम नहीं है. दंगों के वक्त पुलिस-प्रशासन के किसी बड़े अधिकारी ने मौके पर पहुंचने की जहमत नहीं उठाई. वहां मौजूद पुलिस बल मूकदर्शक बना रहा. डीएम संजय कुमार और एसएसपी धर्मवीर जब मौके पर पहुंचे, तब तक बलवाई अनियंत्रित हो चुके थे.

इन अधिकारियों को भी उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास करने पर पथराव का सामना करना पड़ा. अफसरों की लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दंगे वाले दिन और रात तक प्रशासन को इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि आखिर कितने लोग मारे गए हैं?

दंगा शुरू होने के चार घंटे बाद प्रशासन हरकत में आया और कर्फ्यू लगाया गया. बाद में सरकार ने डीएम संजय कुमार और एसएसपी धर्मवीर का तबादला कर उनकी जगह आलोक तिवारी और एन.आर. पद्मजा को भेजा. दंगाग्रस्त इलाके का दौरा करने वाले अपर पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) जगमोहन यादव स्वीकार करते हैं कि दंगे के समय पर्याप्त पुलिस बल न होने से स्थिति बिगड़ गई थी.

इन दंगों ने राजनीति को भी गरमा दिया है. सपा के एक स्थानीय नेता इस पूरे प्रकरण के पीछे भाजपा का हाथ होने का आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं कि स्थानीय नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा काबिज है.

सो विधानसभा चुनाव की हार को देखते हुए तय है कि नगरपालिका परिषद अध्यक्ष की कुर्सी भी भाजपा के हाथ से निकल जाएगी. उनके मुताबिक, निकाय चुनाव में पार्टी की होने वाली दुर्गति को देखते हुए भाजपा ने इन दंगों को भड़काया है. पर भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय बहादुर पाठक इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं कि सरकार दंगा रोकने में अपनी नाकामी छिपाने के लिए भाजपा पर आरोप मढ़ रही है.

दंगे के बाद से अब तक दाखिल आधा दर्जन से अधिक मुकदमों में कु ल 1,391 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिसमें 171 लोग नामजद हैं. इनमें बसपा सरकार के पूर्व कृषि मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण व उनके भाई बसपा के एमएलसी लेखराज सिंह और उनके पुत्र नरदेव सहित 54 लोगों को नामजद किया गया है.

पूर्व कृषि मंत्री पर आरोप है कि उन्होंने कोसीकलां राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-2 के पास कब्रिस्तान और ईदगाह की 27 एकड़ जमीन पर कब्जा कर रखा है. सपा सरकार बनने के बाद मुस्लिम समुदाय के लोग जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लक्ष्मीनारायण पर आरोप है कि उन्होंने दंगे की आड़ में भूमि वापस मांगने वालों पर जुल्म ढाए. हालांकि चौधरी लक्ष्मीनारायण इन मामलों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं.

यह इलाका छाता विधानसभा क्षेत्र के तहत आता है. यहां से राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के विधायक तेजपाल सिंह आरोप लगाते हैं कि मांट विधानसभा उपचुनाव में सपा की कमजोर स्थिति के कारण दंगों को समय पर नहीं रोका गया ताकि एक वर्ग के मत सपा के पक्ष में पड़ सकें. तेजपाल कहते हैं, ''जब मैंने दोनों समुदाय के लोगों को समझने की कोशिश की तो प्रशासन ने ऐसा नहीं करने दिया. इससे सरकार की नीयत पर संदेह होता है.''

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