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पिता पता नहीं, पर चलेगा

बॉलीवुड की हिट फिल्म 'विकी डोनर' ने स्पर्म डोनेशन पर बहसों की झड़ी लगा दी है. इससे कुछ मिथक भी ध्वस्त हुए हैं.

विकी डोनर का दृश्य
विकी डोनर का दृश्य
अपडेटेड 26 मई , 2012

जमकर गुदगुदाने वाली जॉन अब्राहम की हिट फिल्म 'विकी डोनर' ने मल्टीप्लेक्सों को तो खचाखच भर ही दिया है. अब यह जल्द ही देशभर में स्पर्म (शुक्राणु) बैंकों और फर्टिलिटी क्लीनिकों के दरवाजों पर भी 'हाउसफुल' का बोर्ड लगवा सकती है. ताजा रिपोर्ट मिलने तक पांच करोड़ रु. के बजट में बनी यह फिल्म 35.50 करोड़ रु. का कारोबार कर चुकी है. साथ ही इसने स्पर्म डोनेशन के बारे में पूछताछ करने वालों की भारी भीड़ जमा कर दी है. यह सब काल्पनिक किरदार विकी अरोड़ा द्वारा अपने 'लिटिल सेल्स' को बेचने और अंततः उससे दर्जनों निःसंतान जोड़ों को दी गई खुशी की शानदार सफलता से प्रेरित है.

अपने मरीजों के लिए मुख्य रूप से दिल्ली में स्थापित स्पर्म बैंक के वीर्य के नमूनों पर निर्भर रहने वाली चंडीगढ़ की रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी की विशेषज्ञ 50 वर्षीया डॉ. जी.के. बेदी बताती हैं, 'यकीन ही नहीं होता.' बेदी की ही तरह गुजरात के आणंद की डॉ. नैनाबेन पटेल का टेलीफोन भी लगातार बज रहा है. फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. पटेल कहती हैं, 'फिल्म रिलीज होने के बाद से मेरे पास संपन्न परिवारों के युवाओं के एक दर्जन से ज्यादा कॉल आ चुके हैं.' इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) के एक जाने-माने विशेषज्ञ और मुंबई तथा दिल्ली में दो वीर्य बैंक स्थापित करवा चुके अहमदाबाद स्थित बाविशी फर्टिलिटी इंस्टीट्यूट के डॉ. हिमांशु बाविशी कहते हैं, 'फिल्म का सामाजिक संदेश अहम है क्योंकि यह लोगों को स्पर्म डोनेट करने के लिए प्रेरित करती है. जेनेटिक भाषा में कहें तो यह एक महत्वपूर्ण घटना है और इसका नतीजा अच्छी संतानों के रूप में निकलेगा.'

विशेषज्ञों को विकी डोनर फिल्म मील का पत्थर फिल्म लगती है, जिसका प्रभाव वहां तक जाएगा, जिसकी कल्पना भी फिल्म निर्माता जॉन अब्राहम या इसके निदेशक सुजित सरकार ने कभी नहीं की थी. इस फिल्म ने अपने आप स्पर्म डोनेशन जैसे विषय पर जोशीली बहस शुरू करवा दी है. इस पर बमुश्किल ही कभी बात होती थी. यह उस दौर में हो रहा है, जब लाइफस्टाइल जनित बीमारियों और तनावों के कारण कई पुरुषों में प्रजनन आयु में शुक्राणुओं की संख्या और गतिशीलता में कमी आ रही है. बेदी कहती हैं कि उनके क्लीनिक में आने वाले बांझपन के मामलों में कम से कम आधे 'मेल फैक्टर' का नतीजा होते हैं. वे कहती हैं, 'नपुंसक पुरुषों में से 50 फीसदी में शुक्राणु कोशिकाएं बिल्कुल ही नहीं बनती हैं और बाकी आधे शुक्राणु संख्या में कमी और कम गतिशीलता से ग्रस्त होते हैं.'

अहमदाबाद में इंजीनियरिंग के 21 वर्षीय छात्र आशीष लोधानी बताते हैं कि फिल्म के अंतिम दृश्य को देखकर मैं एक स्थानीय प्रजनन क्लीनिक को फोन करने के लिए प्रेरित हुआ. वह दृश्य, जब विकी और उन तमाम जोड़ों, जिन्हें विकी ने माता-पिता बना दिया था, का नाटकीय आमना-सामना होता है. आशीष कहते हैं, 'मैं वह आदमी बनना चाहता हूं, जो निःसंतान जोड़ों के आंसू पोंछ देता है.' इसी तरह, अपने सपनों की दुल्हन की तलाश कर रहे चंडीगढ़ के होटल व्यवसायी 38 वर्षीय ब्रजेश्वर सिंह गुरोन भी स्पर्म दान को रक्तदान जैसा मानते हैं. वे कहते हैं, 'रक्तदान अनमोल जीवन को बचाने में मदद करता है तो स्पर्म दान से नए जीवन का जन्म होता है.'लैब में जन्‍म

होशियारपुर के चौनी गांव के रहने वाले 38 वर्षीय हरकीरत आहलुवालिया याद करते हैं, 'मैं जानता हूं कि जब मैं और मेरी पत्नी एक बच्चे को जन्म देने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, तब हालात कितने खराब थे.' उसके बाद से उनकी पत्नी बिया की गोद में दो स्वस्थ बेटे हैं और आहलुवालिया कहते हैं कि विकी डोनर के बाद से उन्हें स्पर्म डोनेशन के विचार से 'जरा भी आपत्ति' नहीं है. वे गर्व से कहते हैं, 'मेरी रगों में धुर पंजाबी खून है. मेरे लड़के इसका सबूत हैं.'
फिल्म ने उत्साही दाताओं को आकर्षित किया है, फिर भी कोई नियामक तंत्र न होने के कारण गंभीर व्यवसाय के लिए काफी अड़चनें हैं. दिल्ली स्थित मानव निषेचन बैंक इंफरटेक फर्टाइल सॉल्यूशंस के प्रबंध निदेशक 46 वर्षीय आर.के. सहगल कहते हैं, 'शुक्राणु और अंडों का दान या सरोगेट मां का कारोबार वैसा ही है, जैसे बिना गोलपोस्ट के फुटबॉल खेलना.' वीर्य के नमूने जुटाना और उनका भंडारण करना इंफरटेक जैसी कंपनियों के लिए काफी महंगा पड़ता है, जो अमेरिकी फर्टिलिटी सोसाइटी के दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं. इन दिशा-निर्देशों में डोनर की पूरी मेडिकल जांच होती है और वीर्य के नमूने को इस्तेमाल करने से पहले न्यूनतम छह महीने की अवधि के लिए 196 डिग्री सेल्सियस पर तरल नाइट्रोजन टैंक में अनिवार्य तौर पर अलग-अलग रखा जाता है. सहगल कहते हैं, 'इस पर अच्छा-खासा खर्च भी होता है.'

नियामक तंत्र के अभाव के कारण कई बेईमान व्यवसायी भी इस धंधे में आ गए हैं, जो डोनर्स की बुनियादी चिकित्सा जांच भी नहीं कराते या नमूनों को अनिवार्य तौर पर अलग-अलग न रखकर लागत में कटौती करते हैं. डॉ. बेदी कहती हैं, 'आप पूरी तरह सावधान नहीं रह सकते.' वे ऐसे उदाहरण बताती हैं, जहां रोगियों के वीर्य के नमूने ऐसे स्थानीय डायग्नॉस्टिक प्रयोगशालाओं से मिले थे, जहां स्पर्म कोशिकाओं को धोने या उन्हें फ्रीज अवस्था में सुरक्षित रखने की कोई सुविधा नहीं थी. सहगल कहते हैं कि मानव निषेचन दान कोई हंसी-खेल नहीं है. वे कहते हैं, 'बिना जांच या अधूरी जांच के आधार पर डोनर्स से नमूने लेने पर खतरनाक और आनुवांशिक असामान्यताओं वाले रोग हो सकते हैं.' इसके अलावा विशेषज्ञों का कहना है कि एक खास क्षेत्र और खास सामाजिक समूह में बड़ी संख्या में महिलाओं को गर्भधारण कराने के लिए एक ही डोनर के वीर्य का बार-बार प्रयोग जीन पूल में गड़बड़ी पैदा कर सकता है. सहगल कहते हैं कि 53 प्रसन्न माताओं के बूते सुपर मर्द नायक के तौर पर विकी डोनर का चित्रण अगर वास्तविक जीवन में हो तो 'किसी और देश में इस पर गंभीर दंड, यहां तक कि जेल भी हो सकती है.'

चंडीगढ़ स्थित फर्टिलिटी क्लीनिकों को फोन करने वाले नए लोगों में से अधिकांश शहर के कॉलेज और पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र हैं. डॉ. बेदी कहती हैं, 'वे सबसे पहले यह जानना चाहते हैं कि कितना पैसा मिलेगा.' डोनर्स की फेहरिस्त में वे छात्रों को शामिल करने को लेकर चिंतित हैं. वे कहती हैं, 'मैं स्पर्म डोनर के तौर पर ऐसे युवा शादीशुदा पुरुषों को वरीयता देती हूं, जिनका कम से कम एक बच्चा हो.' दिल्ली में भी सहगल का निषेचन बैंक छात्रों द्वारा किए जा रहे प्रश्नों की बाढ़ झेल रहा है. वे हंसते हुए कहते हैं, 'ये ज्‍यादातर युवा हैं, जो विकी की तरह 32 इंच का टीवी हथियाना चाहते हैं.' हालांकि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि पुरुष डोनर की आयु 21 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए, लेकिन सहगल कहते हैं, 'ऐसे 35 पार के लोग मिलना बहुत मुश्किल है, जो स्पर्म डोनेट करना चाहते हों. शादी के बाद लोगों के लिए यह कुछ वर्जित-सी बात हो जाती है.' यह भी एक बड़ी अड़चन है कि ज्‍यादातर आइवीएफ क्लीनिक जीवनसाथी की सहमति पर जोर देते हैं. सहगल ज्‍यादातर स्पर्म छात्रों से जुटाते हैं. बॉलीवुड फिल्म के उलट, जहां नायक अपने स्पर्म बेचने को ही करियर बना लेता है, असल दुनिया में यह उतना कमाऊ नहीं है. बेदी के क्लीनिक में डोनर्स को हर बार नमूना देने के लिए बुलाने पर 400 रु. दिए जाते हैं. सहगल इसके अलावा और कुछ भी भुगतान करने से मना कर देते हैं. वे कहते हैं, 'कोई भी यह नहीं समझता है कि शुक्राणु देना दान का मामला है.'

फिल्म की पटकथा में कई गलत सूचनाएं होने के बावजूद देश के जाने-माने सेक्स स्पेशलिस्ट डॉ. प्रकाश कोठारी विकी डोनर के प्रशंसक हैं. मुंबई में अपनी बेटी के साथ फिल्म देखने वाले डॉ. कोठारी इस बात पर हैरान थे कि फिल्म ने कितनी सरलता से उन मिथकों को तोड़ दिया, जो लंबे समय से चली आ रही थी. डॉ. कोठारी ने बताया, 'यह अच्छी बात है. इससे सेक्स के बारे में सामाजिक बेचैनी कम करने में मदद मिलेगी.'

-साथ में राजेश शर्मा

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