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उत्तराखंड: एक अदद सीट का सवाल

राज्य की आधा दर्जन सीटों पर चर्चा के बावजूद बहुगुणा एक सीट पर फैसला नहीं ले पा रहे.

अपडेटेड 6 जून , 2012

खड़े हो जाओ, मैं तुम्हारा सीएम हूं.' मुख्यमंत्री मनोनीत होने के फौरन बाद जब विजय बहुगुणा अपनी बहन रीता बहुगुणा-जोशी के साथ बगावती नेता हरीश रावत के घर मिलने पहुंचे थे, तो इसी तीखे अंदाज में वहां मौजूद विधायकों पर गरजे थे. लेकिन रावत गुट से समझैता हुए ढाई महीने बीत जाने के बावजूद बहुगुणा को पसंद की सीट के लिए विधायकों की मनुहार करनी पड़ रही है, फिर भी अपने लिए एक अदद सीट तय नहीं कर पा रहे.

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक बहुगुणा को 13 सितंबर तक, यानी छह महीने के भीतर विधानमंडल के लिए चुना जाना जरूरी है. बहुगुणा के लिए अब तक प्रदेश की आधा दर्जन सीटों पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन कहीं पर बात नहीं बन रही तो कहीं विधायक सीट खाली करने को राजी नहीं. बहुगुणा अपनी टिहरी संसदीय सीट से बाहर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे और यहां की 14 विधानसभा सीटों में से पसंद की एक सीट खाली कराने में उन्हें पसीना छूट रहा है.

ऊधमसिंह नगर जिले की सितारगंज सीट से चुने भाजपा विधायक किरन मंडल को तोड़ने में मिली सफलता के बाद माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस सीट से उपचुनाव लड़ेंगे. लेकिन पार्टी की अंदरूनी चर्चा में बहुगुणा ने अभी तक वहां से लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

इंडिया टुडे से बातचीत में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और वरिष्ठ मंत्री यशपाल आर्य कहते हैं, ''विधायकी छोड़ने वाले मंडल और स्थानीय कांग्रेसजनों की इच्छा है, मुख्यमंत्री यहां से चुनाव लड़ें.''

माकपा राज्‍य सचिव विजय रावत के नेतृत्व में 29 मई की शाम बंगालियों के जमीन संबंधी अधिकार के मुद्दे पर मुख्यमंत्री से मिले प्रतिनिधिमंडल का दावा है कि बहुगुणा सितारगंज से चुनाव लड़ेंगे. लेकिन बहुगुणा की पसंद गंगोत्री और टिहरी विधानसभा सीट बनी हुई है. टिहरी से दिनेश धनै निर्दलीय विधायक हैं, जो मंत्री न बनाए जाने से आहत हैं.

बहुगुणा के लिए सीट का चयन आसान नहीं हैं, क्योंकि कांग्रेस का ही एक धड़ा उन्हें हराने की कोशिश कर सकता है, जैसा भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूड़ी के साथ हुआ. खंडूड़ी के मैदान में उतरने से भी मुकाबला कठिन हो सकता है. हालांकि मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने पर खंडूड़ी कहते हैं, ''अभी कांग्रेस में ही कुछ तय नहीं है. कांग्रेस के एलान और पार्टी में विचार के बाद ही मैं कुछ तय करूंगा.''

हालांकि राजनैतिक उथलपुथल के मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान ने बहुगुणा के उपचुनाव तक नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव और मंत्रिमंडल की खाली एक सीट को भरने की योजना टाल दी है.

राज्य के प्रभारी कांग्रेस महासचिव चौधरी बीरेंद्र सिंह कहते हैं, ''मुख्यमंत्री को खुद ही निर्णय लेना है कि वे कहां से लड़ेंगे. वे भाजपा या अपनी पार्टी के किसी विधायक से सीट खाली कराकर लड़ेंगे, हमने इस बारे में फैसला उन्हीं पर छोड़ दिया है.'' वैसे बहुगुणा की पसंद की गंगोत्री सीट से कांग्रेस के विजयपाल सिंह सजवाण विधायक हैं. लेकिन सजवाण पुनर्वास के भरोसे के बिना सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं.

गंगोत्री पर मुख्यमंत्री के जोर की खास वजह यह है कि सीट उनके लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा तो है ही, यहां राज्य के दूसरे बड़े नेताओं का दखल भी कम है. इस सीट पर मुख्यमंत्री को यूकेडी (पी) के प्रीतम सिंह पंवार के सहयोग की भी आस है, जो बगल की सीट यमुनोत्री से विधायक हैं और सरकार में मंत्री हैं.

सूत्रों के मुताबिक, धनै के सीट छोड़ने से इनकार करने के बाद कांग्रेस ने सहसपुर से भाजपा विधायक सहदेव सिंह पुंडीर पर डोरे डाले, लेकिन बात नहीं बनी. रायपुर सीट पर चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस विधायक उमेश शर्मा की महज 474 वोटों से जीत का अंतर देख बहुगुणा नहीं मानें. फिर पूर्व मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी के खास नवप्रभात की विकासनगर सीट से लड़ने की बात चली लेकिन नवप्रभात ने न सिर्फ इनकार किया बल्कि मंत्री न बनाए जाने के दर्द का भी इजहार किया.

अब कांग्रेस के कई नेता सितारगंज पर जोर दे रहे हैं, जहां से विधायकी छोड़ने वाले मंडल फिलहाल बंगाली वोटरों के लिए 'किरण' बन गए हैं. मंडल की शर्त के मुताबिक, बहुगुणा कैबिनेट ने हाथोंहाथ राजकीय ग्रांट एक्ट के तहत जमीन की मंजूरी भी दे दी. सितारगंज में 3 जून को बहुगुणा की रैली में कुछ अहम घोषणाएं हो सकती हैं, जिसे उनकी उम्मीदवारी से जोड़ा जा रहा है.

इस सीट पर मंडल से पहले दो बार से बसपा के नारायण पाल जीतते आए हैं. इस सीट पर  मंडल की जीत का अंतर भी 12,612 वोटों का था. अगर बसपा उम्मीदवार नहीं उतारे और खंडूड़ी मुकाबले में न उतरें, तो बहुगुणा के लिए समीकरण बेहतर हो सकते हैं. उत्तराखंड प्रभारी भाजपा महासचिव थावरचंद गहलोत कहते हैं, ''भाजपा सशक्त उम्मीदवार उतारेगी. कार्यकर्ताओं की भावना है कि खंडूडूंी लड़ें लेकिन फैसला केंद्रीय चुनाव समिति करेगी.''

जाहिर है कि हरीश रावत, सतपाल महाराज जैसे दिग्गजों पर भारी पड़े बहुगुणा को अब मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए एक अदद सीट की तलाश भारी पड़ती दिख रही है.

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