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उत्तर प्रदेश: कहां गए भाजपा के खेवनहार?

भट्ठा-परसौल से शुरू हुई पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी जंग भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों पर लगातार भारी पड़ रही है. राहुल गांधी की सक्रियता इस इलाके में जिस कदर बढ़ी है, उससे कई दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भाजपा को इस मुद्दे पर अपना दम दिखाने में दिक्कत आ रही है.

अपडेटेड 9 जुलाई , 2011

भट्ठा-परसौल से शुरू हुई पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी जंग भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों पर लगातार भारी पड़ रही है. राहुल गांधी की सक्रियता इस इलाके में जिस कदर बढ़ी है, उससे कई दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भाजपा को इस मुद्दे पर अपना दम दिखाने में दिक्कत आ रही है.

मई में भट्ठा-परसौल में गोली चलने के बाद से पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, प्रदेश के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र और प्रदेश की प्रभारी उमा भारती इलाके का दौरा कर चुकी हैं. लेकिन पार्र्टी को राजनैतिक बढ़त मिलती नजर नहीं आ रही.

घटनाक्रम पर नजर डालें तो गिरफ्तारी की राजनीति में जब राहुल की गिरफ्तारी राजनाथ की गिरफ्तारी पर भारी पड़ी तो हाथ से फिसलती बाजी संभालने के लिए 'किसान बचाओ यात्रा' के जरिए मिश्र आगे आए. मिश्र ने 12 जून को इलाके के पीड़ित गांवों के किसानों से मुलाकात की और उन्हें हर तरह की कानूनी सहायता मुहैया कराने का भरोसा दिलाया.

लेकिन भाजपा के इस दांव का भी बहुत असर नहीं हुआ और बमुश्किल चार किसानों ने ही पार्र्टी को अपनी व्यथा सुनाने लायक समझा. शायद किसानों की याद से पिछले साल की वह बात मिटी नहीं है जब टप्पल में अरुण जेटली ने कानूनी सहायता देने का वादा किया था, लेकिन बाद में किसानों को कोर्ई सहायता नहीं मिल सकी.

पार्टी जब तक किसानों से जुड़ने की और कोशिश करती तब तक राहुल गांधी ने 5 जुलाई से भट्ठा परसौल से पदयात्रा शुरू कर एक बार फिर भाजपा को पीछे धकेल दिया. उधर ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में किसानों की 156 हैक्टेयर जमीन वापस करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने किसानों के साथ हो रहे अन्याय को अकाट्य तथ्य बना दिया.

भाजपा क्या वाकई जमीन अधिग्रहण को मुद्दा मानती है या अब यह मुद्दा पार्टी के रडार से गायब है? इस सवाल पर उत्तर प्रदेश के विशेष चुनाव प्रभारी राजनाथ सिंह ने कहा, ''किसानों के मुद्दे को भाजपा लगातार उठाती रही है और अब भी गंभीरता से उठा रही है.

लेकिन यह मीडिया की मानसिकता है कि अगर राहुल गांधी खांस भी दें तो उसे दिनभर टीवी पर दिखाया जाता है, जबकि किसान का बेटा राजनाथ सिंह या (दिवंगत) महेंद्र सिंह टिकैत जमीन पर उतरें तो खबर नहीं बनती. किसानों को लेकर कांग्रेस की नीयत साफ नहीं है और राहुल गांधी जनता की आंखों में धूल झेंकने की कोशिश कर रहे हैं. जब 2007 से भूमि अधिग्रहण बिल तैयार है तो उसे पास क्यों नहीं कराते.''

उन्होंने इस तर्क को खारिज कर दिया कि राहुल गांधी की मौजूदा कवायद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की जमीन खिसकेगी.

हालांकि बार-बार यह पूछने पर कि क्या भाजपा प्रदेश में कोई नया आंदोलन शुरू करेगी, उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया. राजनाथ ने कहा, ''भाजपा सत्ता में आई तो किसान हित की नीतियां लाई जाएंगी.'' अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से संसद में पार्टियों की मौजूदगी पर नजर डालें यहां की 16 लोकसभा सीटों में से भाजपा 5, कांग्रेस 3, बसपा  5, सपा 1 और रालोद की दो सीटें हैं. इस तरह से प्रदेश में भाजपा की मौजूदा संसदीय ताकत का आधा हिस्सा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही आ रहा है.

इसके बावजूद पार्टी को कोई बड़ा नेता अपने दम पर यहां का चुनावी जुआ ढोने को तैयार नहीं दिखता. दरअसल पार्टी में इतने नेताओं को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है कि उससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है. राजनाथ सिंह 2012 के विधानसभा चुनाव के विशेष प्रभारी हैं.

पार्टी अध्यक्ष ने अपने पत्र में कहा कि राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश पर विशेष ध्यान दें, लेकिन पद का जिक्र साफ तौर पर नहीं किया. इससे पहले उमा भारती से भी यूपी के चुनाव प्रचार की कमान संभालने को कहा जा चुका है. मिश्र चुनाव प्रचार कमेटी के मुखिया हैं. इसके अलावा पार्टी महासचिव नरेंद्र सिंह तोमर भी उत्तर प्रदेश के प्रभारी हैं. हालांकि राजनाथ यह नहीं मानते कि ज्यादा नेताओं की मौजूदगी से कोई गफलत पैदा हो रही है.

पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने भी प्रदेश में नया आंदोलन शुरू करने के सवाल को टाल दिया और इतना भर कहा कि राजनाथ सिंह  और उमा भारती जैसे बड़े नेता पहले ही प्रदेश में सक्रिय हैं.

किसानों से कानूनी सहायता का वादा कर चुके मिश्र ने कहा, ''अभी तक चार किसान पार्टी के पास आए हैं. ये रबूपुरा गांव के किसान हैं. इन्हें स्थानीय वकीलों के माध्यम से निःशुल्क कानूनी सहायता मुहैया कराई जाएगी. कई किसानों ने अपने वकील पहले ही कर लिए हैं लेकिन हम वादा निभाएंगे.'' अब राजनैतिक दलों के वादों पर किसानों के भरोसा न करने की असल वजह चाहे जो भी हो, लेकिन किसान इतना जरूर जानते हैं कि हर पार्टी को उनके पेट से हो ना हो, वोट से जरूर प्यार है.

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