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उत्तर प्रदेश: भाजपा की महासंग्राम की तैयारी

लगभग दशक भर से उत्तर प्रदेश में सत्ता से दूर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में राज्‍य की गद्दी पर काबिज होने की हसरत काफी हावी हो गई लगती है. इसकी कसमसाहट लखनऊ में गोमदी नदी के किनारे भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक (3 और 4 जून) में साफ दिखी.

अपडेटेड 11 जून , 2011

लगभग दशक भर से उत्तर प्रदेश में सत्ता से दूर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में राज्‍य की गद्दी पर काबिज होने की हसरत काफी हावी हो गई लगती है. इसकी कसमसाहट लखनऊ में गोमदी नदी के किनारे भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक (3 और 4 जून) में साफ दिखी.

चिंतन और मंथन के आधा दर्जन सत्रों के बाद भी पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए किसी एक मुद्दे पर भरोसा नहीं जताया. पार्टी ने अपने मुद्दों के तरकश में भ्रष्टाचार, विकास और किसान को जगह दी है तो धीरे से ही सही लेकिन राम पर भी भरोसा जताया है.

कार्यसमिति की बैठक के अंतिम सत्र में उत्तर प्रदेश पर लाए गए प्रस्ताव में पार्टी ने स्पष्ट कर दिया कि वह राम के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए हर स्तर पर प्रयास करेगी. हालांकि यह बात प्रस्ताव के अंत में कव्वल एक लाइन में कही गई है.

इससे साफ है कि पार्टी राम के नाम का फायदा तो लेना चाहती है लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दलों को नाराज नहीं करना चाहती. यही नहीं, जनता के बीच पार्टी का जनाधार बढ़ाने की गरज से महासंग्राम रैलियों की रूपरेखा पर भी राष्ट्रीय कार्यसमिति ने मुहर लगा दी.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अण्णा हजारे और बाबा रामदेव को मिल रहे अपार जनसमर्थन को अपनी ओर खींचने के लिए भाजपा महासंग्राम रैलियों का सहारा लेगी. पार्टी ने प्रदेश की मायावती सरकार, पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के साथ केंद्र सरकार को भी कठघरे में खड़ा करने की योजना बनाई है. ये महासंग्राम रैलियां सितंबर तक होंगी.

कार्यसमिति की बैठक के उद्घाटन भाषण में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा, ''दिल्ली में दोस्ती और लखनऊ में नूरा कुश्ती, यह कांग्रेस, सपा और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का खेल है.'' पार्टी ने जनता को यह संदेश देने की कोशिश भी की कि वह केवल भ्रष्टाचार को लेकर दूसरी पार्टियों के विरोध में बन रहे माहौल को भुनाने की फिराक में नहीं है बल्कि इससे निबटने के लिए भाजपा के पास पांच सूत्री कार्ययोजना भी है.

इसमें लोकपाल की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र तंत्र की स्थापना, राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन, विधानसभाओं से होने वाले विधान परिषद चुनाव में खुले मतदान की व्यवस्था, लोक सेवा गारंटी कानून का निर्माण और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजनीति में आने से रोकने के मुद्दे शामिल हैं.

राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में भाजपा ने भले ही 'यूपी फतह' का शंखनाद कर दिया है पर उसकी नजर 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी है. पार्टी नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हवाला देकर कहते हैं, ''दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है. हमें अटलजी के सपनों को पूरा करने के लिए अगले वर्ष हर हाल में यूपी को जीतना होगा.''

बैठक में पार्टी ने 'मिशन यूपी' को धार देने के लिए 'विजन दस्तावेज' तैयार करने की घोषणा की. यूपीए सरकार पर हल्ला बोलते हुए भाजपा ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को इतिहास की सबसे भ्रष्ट सरकार बताया. वहीं, गठबंधन की राजनीति से जली पार्टी अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है.

यही वजह थी कि राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक की पूर्व संध्या पर गडकरी ने पत्रकारों से हुंकार भरे लहजे में कहा था, ''मैं एक से दस बार कहता हूं कि पार्टी चुनाव से पहले या बाद में, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सपा व बसपा से किसी प्रकार का कोई गठबंधन नहीं करेगी.''

ऐसे ही संकेत पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने भी दिए. उन्होंने कहा, ''दूसरी पार्टियों के संग गठबंधन कर चुनाव लड़ना फायदेमंद नहीं रहा. गठबंधन में चुनाव लड़ने पर सीटें बेशक बढ़ जाएं, लेकिन मत प्रतिशत घटता है.'' पार्टी के बड़े नेताओं को एहसास है कि गठबंधन के घुन ने ही राज्‍य में वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में 33 प्रतिशत वोट हासिल कर 174 सीटें जीतने वाली पार्टी को 2007 के चुनाव में 51 सीटों और 19 प्रतिशत वोट पर सीमित कर दिया.

सबसे ज्‍यादा नुक्सान बीते वर्षों में तीन बार बसपा से हाथ मिलाने पर हुआ. दो दिन तक चली राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में भाजपा का हर कद्दावर नेता मौजूद था. गडकरी के साथ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडु, राजनाथ सिंह और इसके अलावा भाजपा शासित सात राज्‍यों के मुख्यमंत्री, एक उप-मुख्यमंत्री समेत कार्यसमिति के 300 से ज्‍यादा सदस्य मौजूद थे.

बावजूद इसके पार्टी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए एक सर्वमान्य नेता नहीं खोज सकी. उत्तर प्रदेश के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं, ''नेता की जरूरत तब पड़ती है, जब विरोधी पार्टियों के नेताओं के चेहरे उजले हों. मुलायम और मायावती की तुलना में भाजपा के हर कार्यकर्ता का चेहरा उजला है.''

उधर, पार्टी में गुटबाजी और अंतर्विरोधों को स्वीकार करते हुए गडकरी ने कहा, ''भाजपा लोकतांत्रिक पार्टी है. सभी को अपनी बात कहने का हक है. लोकतंत्र में मतभेद होता है, पर मनभेद नहीं होना चाहिए.'' भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति बैठक की अगवानी करने वाले लखनऊ के कन्वेंशन सेंटर ने 2006 में भी राष्ट्रीय कार्यसमिति और राष्ट्रीय परिषद की बैठक की अगवानी की थी.

अंतर सिर्फ इतना है कि तब पार्टी ने मुलायम सरकार की अराजकता और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका था तो इस बार मायावती की सरकार सामने है. तब कार्यसमिति की बैठक के बाद विजय संकल्प रैलियों की शुरुआत हुई थी तो इस बार महासंग्राम रैलियां हैं. पटकथा वही है, किरदार बदल गए हैं. लेकिन चुनाव नतीजों का पिछला इतिहास बदलने के लिए आतुर पार्टी को गुटबाजी से ऊपर उठकर जनता का भरोसा जीतने के प्रयास करने होंगे.

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