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नाराज हिंदुस्तानी है देश का असली नायक

यह साल अण्णा का रहा. मगर 'सुर्खियों का सरताज' वह अज्ञात भारतीय है जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत के आंदोलन को ताकत प्रदान की. वह जो भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार का हकदार है.

अपडेटेड 30 दिसंबर , 2011

नौ अप्रैल, 2011. अण्णा हजारे एक प्रतीकात्मक जीत दर्ज कर चुके हैं. सरकार ने उनकी सारी मांगें मान ली हैं. उनके सहयोगियों और सरकार के बराबर-बराबर प्रतिनिधित्व वाली एक संयुक्त कमेटी लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करेगी. जनांदोलन के कुछ प्रतिनिधि, मंत्रियों के साथ 'बराबरी' की हैसियत से एक विधेयक का प्रारूप तैयार करेंगे फिर बाद में जिस पर संसद बहस करेगी. यह अभूतपूर्व है.

निस्संदेह यह ऐतिहासिक दिन है.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

मैं हजारों लोगों की भीड़ का हिस्सा बनाने के लिए जंतर मंतर की तरफ निकल पड़ता हूं. यह भीड़ उस शख्स को बधाई देने के लिए जमा हो रही है जिसने यह संभव कर दिखाया है और रातोरात भ्रष्टाचार को निशाने पर ला खड़ा किया है. चुनौती रहित और स्थायी नजर आने वाला भ्रष्टाचार अब दुबक कर पीछे हट रहा है.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

वहां एकत्रित भीड़ में हर तरह के लोग हैं-नौजवान और तुनकमिजाज, अमीर और खानाबदोश, उच्च पदस्थ और खरी-खरी बोलने वाले. यह भीड़ भावनात्मक रूप से भी आंदोलित है-प्रफुल्लित और जिज्ञासु, आनंदित और अनिश्चित, नारेबाजी करती हुई और खामोशी से विचारमग्न. वहां सुरक्षित पानी की बोतलें थामे हुए एनआरआइ भी हैं और पर्चियां बांट रहे बेघर एनआरए-नो रेजिंडेंस एनीव्हेयर-भी हैं.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

मैंने इतने सारे लोगों को एक साथ एकत्रित मगर फिर भी पूरी तरह अनुशासित कभी नहीं देखा. हालांकि बाहर सड़क पर तो बहुत से सिपाही हैं मगर यहां एक भी सिपाही भीड़ को नियंत्रित नहीं कर रहा है. भीड़ को पंक्तिबद्ध करने और चलते रहने में मदद करने के लिए बिल्ले लगाए हुए स्वयंसेवक ड्यूटी पर हैं. लोगों की भीड़ आगे की तरफ बढ़ती है. सैकड़ों लोग एक लहर बन जाते हैं, एक आवेग. हर कोई उस शख्स को देखना चाहता है, उसका एक अंदाज लगाना चाहता है, उसकी भाव-भंगिमा, उसकी मुस्कराहट, उसकी त्योरी का विश्लेषण करना चाहता है.

जब कोई जत्था अण्णा हजारे के ठीक सामने पहुंच जाता है तो वह थोड़ी देर के लिए ठहरता है, नमस्कार की मुद्रा में अपने हाथ उठाता है, ''भारत माता की''... नारे के जवाब में... 'जय!' का उद्घोष करता है और आगे बढ़ जाता है.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

देशप्रेम एक अभिलाषा है. ईमानदारी एक सपना है. जब अण्णा के रू-ब-रू होने की मेरी बारी आती है, तो मैं खुद-ब-खुद वही करता हूं.

किरण बेदी ऐसी भाव-भंगिमा के साथ भीड़ को संभालने में जुटी हैं जिसमें पुलिस की अधीरता के साथ ही नई तरह की शांति है. स्वामी अग्निवेश माइक थाम लेते हैं. वे शहीद भगत सिंह के पड़पोते का परिचय कराते हैं. भीड़ खुशी से फूट पड़ती है. वहां उपस्थित हर इंसान की तरह मैं भी इतिहास को बनते महसूस करता हूं.

23 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

16 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

वे बताते हैं किअण्णा के प्रस्ताव को सरकार द्वारा कल-8 अप्रैल-को स्वीकार किया जाना अच्छा शकुन है. वे कहते हैं कि 8 अप्रैल, 1929 को ही शहीद भगत सिंह ने 'बहरों को सुनाने के लिए' केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था. उपस्थित जनसमुदाय तालियों की उन्मत्त गड़गड़ाहट में डूब जाता है. ''भारत माता की...'' मंच से इशारा होता है. हजारों कंठ सीधे अपने दिल-पेट-और फव्फड़ों से जवाब देते हैं, 'जय!' मेरा जेहन कौंधता है. 8 अप्रैल, 1929... वह ब्रिटिश राज का दौर था... मगर 8 अप्रैल, 2011... स्वराज के अंतर्गत? मगर जब तक मैं उसे समझ पाता, अण्णा माइक पर आ जाते हैं. ''हिंसा नहीं होनी चाहिए'' वे कहते हैं, ''याद रखिए, कोई हिंसा नहीं होनी चाहिए.'' वे कहते हैं कि 15 अगस्त तक अगर लोकपाल बिल नहीं लाया गया तो मैं लाल किले तक मार्च करूंगा. भीड़ उत्साहित होकर बिखर जाती है. मैं धक्का-मुक्की पर ध्यान नहीं देता. यह धक्का-मुक्की मुझे 'भारतीय जनसमुद्र' का एक एहसास कराती है.

9 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
2 नवंबर 201: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

हर चेहरे पर एक चमक है. हर चेहरे पर एक नई उम्मीद. यकीनन यहां लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के अंतिम दौर के प्रतिभागियों की तरह दिखते हुए तमाम अजीब से लोग भी हैं. और साधु-संन्यासी के वेश में एक संदिग्ध सा मेल-त्रिशूल और तिरंगा लिए हुए कुछ लोग भी. एक शख्स ने मनमोहन सिंह के खिलाफ अवांछनीय नारों वाली एक तख्ती उठा रखी है. जब मैं सड़क पर पहुंचता हूं तो अपनी जेब हल्की महसूस करता हूं. अपने पास मौजूद लगभग 200 रु. से मुझे 'मुक्ति' दिला दी गई है. अवसरवाद अपने मौके गढ़ लेता है. तमाशबीन मुझे देख रहे हैं. उत्साहित होने की बजाए मैं हक्का-बक्का-सा नजर आ रहा हूं. मैं अपनी घबराहट की वजह नहीं बताता.

19 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
12 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

5 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह साल अण्णा का रहा. मगर 'सुर्खियों का सरताज' वह अज्ञात भारतीय है जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत के आंदोलन को ताकत प्रदान की, उसे एक शरीर प्रदान किया और उसकी आत्मा भी. वह जो भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार से भी परे एक बेदाग और ईमानदार भारत का हकदार है.

गोपालकृष्ण गांधी पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्‍यपाल हैं

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