अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से तौबा क्या की, उत्तर प्रदेश का पूरा विधानसभा चुनाव सितारों से महरूम हो गया. प्रदेश के चुनावी इतिहास के सबसे चुनौती भरे चुनाव में इस बार न अमिताभ बच्चन की रौनक है, न संजय दत्त का जलवा. अमर सिंह के जमाने में सूबे की बदहाल सड़कों पर सितारों का कैटवाक कराने वाली सपा ही जब खामोश है, तो बाकी दलों में भी बॉलीवुड को लेकर खास उत्साह नहीं है. ऐसे में राजनीति, खेल और फिल्म जगत के इक्का-दुक्का नाम ही बचते हैं जिन्हें सितारा कहने की गुस्ताखी की जा सकती है.
कांग्रेस के राज बब्बर, मोहम्मद अजहरुद्दीन, राहुल गांधी और भाजपा के वरुण गांधी ही किसी तरह इस जमात में फिट बैठ रहे हैं. लेकिन चुनाव सिर पर आने के बावजूद ये दिग्गज अपने इलाके में अब तक ढंग से चुनावी बिसात नहीं बिछा पाए हैं.
अजहरुद्दीन ने 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मुरादाबाद में अपना परचम लहाराया था. '90 के दशक में जादुई कलाई, खड़ा कॉलर और काले ताबीज से करोड़ों प्रशंसकों के दिल में खास जगह बनाने वाले स्टाइलिश बल्लेबाज का करिश्मा अपने लोकसभा क्षेत्र में दो साल में ही उतर गया. अब तक लोगों को लोकसभा क्षेत्र से अजहर की दूरी अखरती थी, लेकिन विधानसभा चुनाव के नजदीक आने के बाद भी उनकी गैरहाजिरी गंभीर मर्ज बनती जा रही है.
दरअसल, लोकसभा चुनाव के बाद मुरादाबाद पश्चिम विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस को बसपा के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी थी. इसके बाद से ही मुरादाबाद से कांग्रेसी सांसद की दूरियां बनने लगी थीं. लोकसभा चुनाव के दौरान अजहर के प्रचार की कमान संभालने वाले एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कहते हैं कि टिकट बंटवारे में जिस तरह से स्थानीय सांसद की उपेक्षा की गई, उससे प्रत्याशियों पर उनका जरा भी प्रभाव नहीं रह गया है.
प्रत्याशियों के साथ अजहर की एक मुलाकात तक नहीं हुई. फिलहाल, अजहर का स्टार चेहरा इलाके में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को खास प्रेरित नहीं कर पा रहा है और पार्टी का चुनावी अभियान बिखरा नजर आ रहा है.
मुरादाबाद जिले की सभी छह सीटों पर जहां सपा और बसपा ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है, वहीं कांग्रेस काफी पीछे छूट चुकी है. कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची में कांठ से डॉ. मोहम्मदुल्ला, कुंदरकी से शौकत अली को उतारा गया है. टिकट वितरण के सवाल पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष देवराज शर्मा यह जरूर कहते हैं, ''संगठन को दरकिनार कर गणेश परिक्रमा करने वाले लोगों को गले लगाने की प्रवृत्ति से पार्टी को बचना होगा.''
उधर, राहुल गांधी का पारंपरिक लोकसभा क्षेत्र अमेठी यानी छत्रपति शाहूजी महाराज नगर भी युवराज के दीदार को तरस रहा है. साल 2009 में राहुल के संसदीय क्षेत्र अमेठी को उस समय नया नाम मिला जब सुल्तानपुर और रायबरेली के कुछ इलाकों को काटकर मायावती सरकार ने एक नया जिला बनाया. नया जिला बनने के बाद अमेठी की जनता पहली बार विधानसभा चुनाव के सियासी उत्सव में शामिल होने जा रही है.
ऐसे में कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले अमेठी संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीटों के दायरे में आने वाले मतदाताओं के सरोकारों में नया जिला बनने से हो रहा नफा-नुक्सान भी शामिल हो गया है. छत्रपति शाहूजी महाराज नगर (अमेठी) में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें से तिलोई, सलोन रायबरेली जिले की हैं तो जगदीशपुर, गौरीगंज और अमेठी विधानसभा क्षेत्रों को सुल्तानपुर जिले से अलग कर अमेठी जिले में शामिल किया गया है.
सलोन विधानसभा क्षेत्र पर कांग्रेस का कब्जा है. सलोन के निवासी छत्रपति शाहूजी महाराज नगर में नहीं जाना चाहते. ऐसे में यह बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. बीते वर्ष की शुरुआत में राहुल गांधी ने भी जनता की नब्ज को टटोलते हुए सलोन को नए जिले में शामिल करने की जोरदार मुखालफत की थी. इस इलाके में कांग्रेस की स्थिति अभी भी अपनी विपक्षी पार्टियों से बेहतर है लेकिन सपा से सीधा मुकाबला है.
अमेठी और जगदीशपुर विधानसभा सीटें बीते चुनाव में कांग्रेस ने जीती थीं लेकिन इस बार यहां पर कुछ नये मुद्दे उभर कर सामने आए हैं. रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है. लगातार बंद हो रहे उद्योग धंधे और रोजगार के नए अवसर न मिलने से इलाके की जनता खिन्न है. विपक्षी पार्टियां जोर-शोर से इस बात को हवा देकर अपने पक्ष में रास्ता तैयार कर रही हैं.
राहुल के चचेरे भाई और भाजपा सांसद वरुण गांधी के पीलीभीत में भी हालात अच्छे नहीं हैं. पीलीभीत विकास से कोसों दूर है, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मंडी शुल्क जमा करने वाला यह जिला अपने विकास को तरस रहा है. क्षेत्र में न तो अच्छी शिक्षा है न ही कोई इंजीनियरिंग कॉलेज, न ही कोई औद्योगिक विकास हुआ है कि यहां के लोग क्षेत्र में रहकर अपना जीवन यापन कर सकें.
आज भी रोजगार और शिक्षा के लिए उन्हें बाहर निकलना पड़ता है. यहां पूरनपुर में बाहर से आए हुए लोगों की एक लाख आबादी है जिसमें सबसे ज्यादा बंगाली हैं, उनके पास रहने के लिए सिर्फ झेपड़ियां ही हैं.
पिछले चुनाव में शहर की विधानसभा सीट के लिए सपा के रियाज अहमद और भाजपा के वी.के. गुप्ता के बीच मुकाबला था जिसमें सपा नेता अहमद ने बाजी मार ली. वहीं पूरनपुर विधानसभा क्षेत्र में बसपा के अरशद खां ने कांग्रेस के वी.एम. सिंह को हरा कर सीट पर अपना कब्जा जमाया. बीसलपुर में अनीस अहमद ने भाजपा के रामचरण वर्मा को भारी मतों से हराया था.
बरखेड़ा विधानसभा सीट पर भाजपा के सुखलाल ने सपा के प्रीतम को हराया था. वरुण के लिए विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों को जिताना खासी चुनौती होगी.
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू डिंपल यादव को हराकर फिरोजाबाद से सांसद बने राज बब्बर के लिए भी डगर कठिन है. संसदीय क्षेत्र की पांचों सीटें जीतना उनके लिए साख का सवाल बन गया है. इस क्षेत्र के मौजूदा हालात के मद्देनजर बसपा और सपा के इस गढ़ में कांग्रेस का खाता खुलना आसान नहीं है.
फिरोजाबाद के स्थानीय कांग्रेसी नेता शहीद पटेल का यह कहना उचित ही लगा कि लोकसभा चुनाव में राज बब्बर की जीत उनकी निजी जीत थी. यहां के मतदाताओं ने कांग्रेस को नहीं, राज बब्बर के आगरा में किए गए काम को नजर में रखकर वोट दिया था. पार्टी आलाकमान ने भी टिकट वितरण में उन्हें खुला हाथ दिया.
कांग्रेस ने फिरोजाबाद जनपद की पांच में से तीन और आगरा की 9 में से भी 4 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं- घोषित उम्मीदवारों को विश्वास है कि राज भाई के सहारे उनकी नैया पार लग जाएगी. लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए लगता नहीं कि कांग्रेस फिरोजाबाद में लोकसभा चुनाव जैसी कामयाबी हासिल कर पाएगी.
राहुल के संसदीय क्षेत्र में उनकी बहन प्रियंका गांधी जल्दी ही कांग्रेस प्रत्याशियों की ओर से प्रचार अभियान शुरू करने वाली हैं. इससे कांग्रेस के युवराज का काम आसान हो जाएगा. लेकिन बाकी तीनों नेताओं के सामने विधानसभा चुनाव कठिन चुनौती बनने वाले हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से इन नेताओं के लिए सही मायने में परीक्षा की घड़ी अब आई है.
इलाके में पार्टी की हार का खामियाजा सबसे ज्यादा अजहर को भुगतना पड़ सकता है क्योंकि वरुण और बब्बर सियासत में अपना दम-खम दिखा चुके हैं. अगले लोकसभा चुनाव में अजहर अपना जिम और दूसरे कारोबार संभालते नजर आ सकते हैं.
-साथ में संजय शर्मा और सिराज कुरैशी

