लखनऊ में लोकभवन के सी ब्लाक में दूसरे तल पर कमरा संख्या 208 में अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त आलोक टंडन बैठते हैं. कमरे में इनकी कुर्सी के पीछे रखी एक अलमारी पर आर्थिक अखबार और मैंगजीन रखी हुई हैं. समय मिलते ही आलोक इन अखबारों और मैंगजीन के पन्ने पलट कर यूपी में चल रहे उद्योगों से जुड़ी सूचनाओं को ढूंढ़ते हैं.
मेज पर बाईं ओर लगी कंप्यूटर स्क्रीन पर कंट्रोल रूम से भेजी जा रही सूचनाओं का निरंतर “फ्लो” बना हुआ है. यह वही कंट्रोलरूम है जिसे लाकडाउन लागू होते ही शुरू कराया गया था.
आलोक टंडन ने 24 घंटे के भीतर लघु, मध्यम और सूक्ष्म विभाग के प्रमुख सचिव तथा निर्यात कमिश्नर नवनीत सहगल के साथ मिलकर कैसरबाग के निर्यात भवन में कंट्रोल रूम शुरू कराया. इसी परिसर में ज्वाइंट डायरेक्टर इंडस्ट्रीज का भी दफ्तर है. कंट्रोल रूम ने दो नंबर 9415467934 और 0522-2202893 के जरिए सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक काम करना शुरू किया.
इस पर आने वाली शिकायतों को दर्ज करने और उन्हें जरूरी कार्रवाई के लिए फॉरवर्ड करने के लिए चार-चार घंटे की शिफ्ट में छह-छह लोगों की ड्यूटी लगाई गई. कंट्रोल रूम के जरिए आलोक टंडन ने अपने सहयोगी आधिकारियों के साथ उद्योंगों से जुड़ी समस्याओं को निस्तारित करना शुरू किया. उद्योगों के कर्मचारियों के आने-जाने के लिए पास की व्यवस्था, रास्ते में आ रहे कच्चे माल की गाड़ियों को न रोके जाने की व्यवस्था समेत सभी जरूरी काम इस कंट्रोलरूम के जिम्मे आ गया.
कंट्रोल रूम में आने वाली सभी शिकायतों के निस्तारण के लिए जिलों में तैनात महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र को नोडल अधिकारी बनाया गया. कंट्रोल रूम में आने वाली समस्याओं को तुरंत निस्तारण के लिए संबन्धित जिलों के नोडल अधिकारी को भेजा जाने लगा.
लाकडाउन के दौरान जरूरी सेवाओं जैसे फूड इंडस्ट्री, दवाओं और मेडिकल उपकरण बनाने वाले उद्योग, आटा चक्की, दाल मिल, तेल मिल से जुड़े कारखानों को चालू रखने का आदेश सरकार ने दिया था. इसके बावजूद कई जगहों से जरूरी सेवाओं के उद्योग भी बंद हो जाने की सूचनाएं कंट्रोल रूम को मिली.
आलोक ने अपने अधिकारियों के साथ मिलकर इन जरूरी उद्योगों को खोलने के लिए पूरी व्यवस्था कराई. चार दिन के भीतर यूपी में दवाएं और मेडिकल उपकरण बनाने वाली 412 यूनिट, मास्क बनाने वाली 70 यूनिट, 913 आटा चक्की, 431 खाने के तेल की मिल, 271 दाल मिल संचालकों से संपर्क करके इन्हें चलवाया गया.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आदेश मिलते ही शासन ने 20 मार्च को नोटिफिकेशन जारी कर बंदी के दौरान सभी उद्योगों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को अपने कर्मचारियों को वेतन देने आदेश दिया था. इसके बावजूद कई जगहों पर कारखाने अपने कर्मचारियों को वेतन देने में अनाकानी कर रहे थे.
कंट्रोल रूम में ऐसी कई शिकायतें मिलने पर आलोक ने प्रमुख सचिव श्रम के साथ मिलकर सभी जिलों के ‘लेबर इंफोर्समेंट ऑफिसर’, ‘असिस्टेंट लेबर कमिश्नर’ को कारखानों में काम कर रहे कर्मचारियों को वेतन दिलवाने की जिम्मेदारी सौंपी. कारखाना या प्रतिष्ठान मालिकों को विश्वास में लेने के लिए आलोक ने वेतन बांटने के सरकारी आदेश को यूपी में कार्यरत सभी इंडस्ट्री एसोसिएशन के पदाधिकारियों को भेजा और उनसे सहयोग मांगा.
सभी जिलों में एक सघन अभियान चलाया गया. लखनऊ में आलोक टंडन और इसके सहयोगी सभी अधिकारियों ने एक-एक यूनिट में कर्मचारियों को वेतन बांटने की पूरी कवायद की निगरानी की. एक हफ्ते के भीतर 48,500 यूनिट अपने कर्मचारियों को 630 करोड़ रुपए वेतन के रूप में भुगतान कर चुकी थीं.
कंट्रोल रूम में आने वाली शिकायतों और उनके निस्तारण की रिपोर्ट रोज शाम सात बजे तक ‘कंपाइल’ की जाती है और इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा जाता है. कंट्रोल रूम से मिलने वाले फीडबैक से उद्योग विभाग को अपनी पॉलिसी बनाने में काफी मदद मिली. कंट्रोल रूम से मिली सूचनाओं के आधार पर ही यूपी के मुख्य सचिव आर. के. तिवारी ने 5 मई को एक आदेश जारी किया कि ग्रीन और ऑरेंज जोन वाले जिलों में उद्योग मालिक एक ‘सेल्फ डिक्लरेशन’ देकर अपना कारखाना खोल सकते हैं. केवल रेड जोन वाले जिलों में उद्योग संचालन के लिए पास की जरूरत होगी.
हकीकत यह है कि यूपी में संचालित होने वाले करीब साठ फीसदी से ज्यादा उद्योग रेड जोन वाले जिलों में ही हैं. ऑरेंज और ग्रीन जोन वाले जिलों में 30 से 35 फीसदी यूनिट ही संचालित हो रही हैं.
लाकडाउन का तीसरा फेज शुरू होने के बाद मोबाइल यूनिट संचालकों ने बड़े पैमाने पर कंट्रोल रूम में संपर्क करके अपनी यूनिट शुरू करने के लिए सरकार से निवेदन किया था. लाकडाउन में ये मोबाइल फैक्ट्रियां पूरी तरह से बंद हो गई थीं. मोबाइल फैक्ट्रियों को संचालन की अनुमति न मिलने के पीछे सरकारी आदेश में भाषा का स्पष्ट न होना था.
उद्योगों के संचालन के लिए जारी किए गए आदेश में आइटी-हार्डवेयर उद्योगों को भी संचालन की अनुमति मिली थी इसके बावजूद मोबाइल निर्माण फैक्ट्रियों को खोलने की अनुमति स्थानीय प्रशासन ने नहीं दी थी. प्रशासन का तर्क था कि इस आदेश में मोबाइल फैक्ट्रियों को संचालन की अनुमति का कहीं भी जिक्र नहीं है.
कंट्रोल रूम के अलावा आलोक टंडन से भी मोबाइल फैक्ट्रियों के मालिकों ने संपर्क करके सरकारी आदेश में बनी दुविधा को दूर करने की गुहार लगाई थी. इसके बाद 5 मई को एक आदेश जारी कर मोबाइल उद्योगों को आइटी-हार्डवेयर उद्योगों का एक पार्ट माना गया. इसके बाद मोबाइल फैक्ट्रियों के संचालन की राह खुल गई.
कंट्रोल रूम में आने वाली शिकायतें पहले जिलों के नोडल अधिकारियों के जरिए निस्तारित करने की कोशिश की जाती है. इसके बाद भी यदि समस्या दूर नहीं होती है तो आलोक टंडन खुद संबंधित जिलों के डीएम से संपर्क कर उन्हें चिन्हित यूनिट से जुड़ी समस्याओं का निस्तारण करने को कहते हैं.
उद्योगों से जुड़ी हर चीज पर बारीकी से नजर रखे आलोक टंडन मूलत: लखनऊ के रहने वाले हैं. शुरुआती पढ़ाई लखनऊ के “महानगर ब्वाएज इंटर कालेज” से करने के बाद आलोक ने “इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी” (आइआइटी) कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया. वर्ष 1986 में इनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया. ये महाराजगंज, इलाहाबाद अब प्रयागराज और वाराणसी में जिलाधिकारी रहे.
वर्ष 2002 से 2005 तक आलोक केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर रहे. इस दौरान यह मानव संसाधन विकास मंत्री के निजी सचिव और उसके बाद “डिपार्टमेंट आफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग” (डीओपीटी) में रहे. इसके बाद स्टडी लीव पर अमेरिका चले गए. यूपी में डिप्टी मैंनेजिंग डायेक्टर पिकप और चार साल वर्ष 2007 से 2011 तक विद्युत उत्पादन निगम में चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर काम किया. इस पद पर तैनाती के दौरान आलोक ने उत्पादन निगम का वित्तीय पुनर्गठन किया. खर्चे कम हुए. ‘इंटरेस्ट सेविंग’ हुई. ‘प्लांट लोड फैक्टर’ बढ़ाया गया.
इन सारे उपायों के बाद पहली बार उत्पादन निगम फायदे में आया.
दूसरी बार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के दौरान यह वित्त मंत्रालय में रहे और इसके बाद डेढ़ साल केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटेरियट में एडीशनल सेक्रेटरी के पद पर रहे. वर्ष 2007 में आलोक यूपी आ गए. इन्हें चेयरमैन और सीईओ, नोएडा और एमडी नोएडा मेट्रो रेल कार्पोरेशन की जिम्मेदारी मिली. नोएडा में तैनाती के दौरान आलोक ने कई तरह की योजनाएं शुरू कीं. नोएडा में ‘डस्ट फ्री जोन’ बनवाए. नोएडा में कूड़े का डोर-टू-डोर कलेक्शन भी आलोक के समय ही शुरू हुआ.
नोएडा में एक लाख टन कूड़ा डंप पड़ा था. इस कूड़े को हटाकर ‘वेस्ट लैंड’ को ग्रीन लैंड में बदला गया. नोएडा के इस काम को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली थी. बिजली की बचत के लिए नोएडा में लगीं 75 हजार लाइटों को एलईडी लाइट में बदला गया. पिछले साल सितंबर में आलोक को अवस्थापना और औद्योगिक विकास आयुक्त (आइआइडीसी) की जिम्मेदारी भी मिली.
कोरोना संक्रमण के बाद बहुत सारी कंपनियां चीन से हटकर दूसरी जगह अपनी यूनिट लगाने की मन बना रही हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चीन में काम कर रहीं यूएस, साउथ कोरिया और जापान की कंपनियों पर फोकस करने का निर्देश उद्योग विभाग के अधिकारियों को दिया है. इन देशों की कंपनियों को ‘एप्रोच’ करने के लिए आलोक टंडन एक खाका खींचने की तैयारी में लग गए हैं.
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