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उज्जैन: काली कमाई से धनकुबेर बना चपरासी

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर से मिली अप्रत्याशित संपत्ति. एक डिप्टी कलेक्टर के पास से ढाई करोड़ रु. की और एक बाबू के पास से 75 लाख रु. की संपत्ति बरामद हो चुकी है.

जांच करते अधिकारी
जांच करते अधिकारी
अपडेटेड 14 दिसंबर , 2011

एक ओर गर्मागर्म बहस चल रही है कि लोकपाल के दायरे में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को लाया जाए या नहीं, इसी बीच लोकायुक्त पुलिस ने उज्‍जैन में चतुर्थ श्रेणी के एक कर्मचारी के पास करोड़ों रु. की अवैध संपत्ति होने का खुलासा किया है.

उज्जैन नगर निगम में चतुर्थ श्रेणी के पद पर नियुक्त लेकिन तीसरी श्रेणी के पद की जिम्मेदारी संभाल रहे नरेंद्र देशमुख के घर 7 दिसंबर को लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक अरुण मिश्र के नेतृत्व में छापा मारा गया. छापे से पता चला कि देशमुख ने गैर-कानूनी तरीके से आलीशान मकान, फार्म हाउस के साथ-साथ महंगी कारें और ढेरों कीमती चीजें जमा कर रखी थीं जिनकी कीमत 10 करोड़ रु. तक होने की संभावना है.

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मिश्र बताते हैं, ''देशमुख ने नगर निगम में 1980 में बतौर चपरासी नौकरी शुरू की, इस लिहाज से 31 साल की नौकरी में 15 लाख रु. कमाए, उसमें से परिवार चलाने के लिए खर्च भी किया. फिर इतना पैसा कहां से आया? उसके खिलाफ आय से अधिक करोड़ों रु. की संपत्ति जमा करने का मामला दर्ज किया गया है.''

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

जब लोकायुक्त पुलिस दल देशमुख के घर पहुंचा तो उसने आधे घंटे तक दरवाजा ही नहीं खोला, उसके बाद पुलिस दल पर अपना पालतू जर्मन शेफर्ड कुत्ता छोड़ दिया. पुलिस को पता चला है कि उज्‍जैन के पास तीन एकड़ जमीन पर फैला फार्म हाउस देशमुख का है. उसके पास महाराष्ट्र के जलगांव में पांच एकड़ जमीन और मुंबई में फ्लैट भी है. यही नहीं, वह वहां के एक होटल और फैक्टरी में भी पार्टनर है.

देशमुख के यहां से लाखों के जेवर, नकदी, चार टू व्हीलर और चार लक्जरी फोर व्हीलर के दस्तावेज भी पुलिस के हाथ लगे हैं. एयरकंडीशनरयुक्त मकान और बड़ा एलसीडी टीवी तो है ही, एक अन्य मकान के दस्तावेज भी मिले हैं. मामले की जांच कर रहे पुलिस उपाधीक्षक ओ.पी. सागोरिया कहते हैं, ''शुरुआती आकलन के मुताबिक संपत्तियों का बाजार मूल्य 10 करोड़ रु. तक हो सकता है.''

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इस कार्रवाई ने सी और डी श्रेणी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने के सरकारी इरादे पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. लोकायुक्त पुलिस की यह चार माह में चौथी बड़ी कार्रवाई है. इसी साल 11 नवंबर को उज्जैन आरटीओ में पदस्थ निरीक्षक सेवाराम खांडेकर के घर से करोड़ों रु. की संपत्ति मिली थी. 15 अक्तूबर को लोकायुक्त पुलिस ने घटिया तहसील में पदस्थ पटवारी वीरेश उपाध्याय के दो घरों पर छापा मारा था.

एक घर में वह अपनी दूसरी पत्नी अलका, जो खुद पटवारी है, के साथ रह रहा था जबकि दूसरे आलीशान घर में उसकी पहली पत्नी लीना अपने दो बच्चों के साथ रह रही थी. खुद उपाध्याय के नाम तो कोई संपत्ति नहीं मिली लेकिन उसकी पहली पत्नी और मां के नाम एक करोड़ रु. से ज्यादा की संपत्ति मिली है. पुलिस को अंदेशा है कि उपाध्याय को छापे की जानकारी लग गई थी. सितंबर में उज्जैन में पदस्थ पटवारी ओ.पी. विश्वप्रेमी के यहां छापे में लोकायुक्त पुलिस को करीब पौने दो करोड़ रु. की संपत्ति मिली थी.

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विश्वप्रेमी 1994 में सेवा में आया था और लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक अरुण मिश्र के मुताबिक, उसकी आधिकारिक आय 10-12 लाख रु. से ज्‍यादा नहीं होनी चाहिए थी. विश्वप्रेमी के घर की शानो-शौकत देख लोकायुक्त पुलिस का दल भी एकबारगी चौंक उठा. यहां करीब 8-9 लाख रु. कीमत की रोलेक्स और राडो जैसी ब्रांडेड घड़ियां मिली थीं, कई जगहों पर जमीन खरीद के सबूत मिले, पत्नी के नाम लाखों रु. की संपत्ति पाई गई, तीन फोर व्हीलर और पांच टू व्हीलर मिले जबकि 22 लाख रु. का इलेक्ट्रॉनिक सामान मिला. विश्वप्रेमी के विभिन्न बैंक खातों में 8 लाख रु. जमा थे जबकि नकद एक लाख रु. बरामद हुए.

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सितंबर में ही लोक निर्माण विभाग के एक बाबू आर.सी. मालवीय के घर से भी करीब 75 लाख रु. की संपत्ति के दस्तावेज जब्त किए गए थे. इससे पहले जुलाई में डिप्टी कलेक्टर हुकुमचंद सोनी के पास ढाई करोड़ रु. से ज्यादा की संपत्ति का खुलासा हुआ था.

लोकायुक्त पुलिस की सक्रियता अच्छा संकेत है लेकिन आरोप-पत्र में देरी और आरोप साबित करने की कम दर का इतिहास भी है. लोकायुक्त पुलिस के एक अधिकारी कहते हैं, ''संपत्ति का आकलन बाजार मूल्य से किया जाता है, जो करोड़ों रु. में जा पहुंचता है. लेकिन आरोप-पत्र में यह आंकड़ा बहुत कम रखा जाता है क्योंकि रजिस्ट्री में संपत्ति खरीदने के वक्त की कीमत या गाइड लाइन के मुताबिक दर्शाई गई कीमत दर्ज होती है. सो, आरोप साबित होने की दर बहुत कम होती है.''

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