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बस्‍तर में आदिवासियों ने हौसले से बनाई राह

आदिवासियों ने पुलिस की मदद से माओवादियों की मांद में घुसकर बेहद दुर्गम इलाके में महज दो माह में बनाई सड़क.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2012

माओवादियों के खौफ के चलते बस्तर में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत जहां 450 से ज्यादा सड़कों पर काम अटका पड़ा है वहीं लोहांडीगुड़ा विकास खंड के दुर्गम इलाके पुसपाल घाट के आदिवासियों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए माओवादियों की मांद में घुसकर और चट्टानों का सीना चीरकर 8 किमी लंबी सड़क बनाई है. उन्होंने एकजुटता और हौसले की नायाब मिसाल पेश की है.

इन आदिवासियों को लामबंद कर इस मुहिम से जोड़ा पुलिस अधीक्षक रतनलाल डांगी ने. संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से महज 62 किमी दूर होने के बावजूद सड़क न होने से यह इलाका विकास से कोसों दूर था. नई बनी सड़क के इर्द-गिर्द बसे 24 गांवों में से एक चंदेला के सरपंच सुभाष नाग कहते हैं, 'सड़क बनने से पहले तक लोगों को इंद्रावती नदी पार करके 10 किमी दूर से राशन लादकर लाना पड़ता था.' और अब सड़क बनने के बाद राशन गाड़ियों से यहां के रहवासियों तक पहुंच रहा है. पुसपाल घाट के परौदा गांव से आखरी गांव ककनार तक 8 किमी लंबी सड़क 20 साल से प्रस्तावित थी लेकिन माओवादियों के खौफ के कारण कोई भी इसका ठेका लेने को तैयार नहीं था.

इलाके के विकास की राह में पहला कदम था 21 अप्रैल, 2011 में ककनार में पुलिस की चौकी का बनना. सड़क तो थी नहीं, इसलिए चौकी के जवानों को साजो-सामान सहित हेलीकॉप्टर से यहां उतारा गया था. गंभीर समस्या उस वक्त आई जब हेलीकॉप्टर न मिलने पर बीमार जवानों को इलाज के लिए ले जाना मुश्किल हो गया. तब डांगी ने सोचा क्यों न ग्रामीणों के सहयोग से सड़क निर्माण के इस मुश्किल काम को अंजाम दिया जाए.

पर समस्या यह थी कि चौकी खुलने से बौखलाए माओवादियों ने ककनार के पोस्टमास्टर और सचिव समेत चार लोगों की पुलिस का सहयोगी बताकर हत्या कर दी थी. इसलिए सड़क निर्माण के लिए आदिवासियों को मनाना आसान न था. फिर भी डांगी ने उम्मीद नहीं छोड़ी. आखिरकार पुसपाल घाट के पांच ग्रामीण सड़क बनाने के लिए तैयार हो गए. इस अभियान की शुरुआत 7 जनवरी से हुई. धीरे-धीरे खौफ की जगह विकास की उम्मीद ने ले ली और 12 जनवरी तक इस काम में योगदान देने 50 लोग पहुंच गए. बाद में ग्रामीणों की तादाद बढ़कर 500 तक पहुंच गई. इनमें भी महिलाओं की संख्या ज्‍यादा थी. सड़क निर्माण के काम में जुटे ग्रामीणों की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस और एसटीएफ के जवानों पर था.

ग्रामीणों के आने और जाने से पहले पुलिस की एक टुकड़ी बम डिस्पोजल और डॉग स्क्वॉयड सहित रास्ते का मुआयना करती थी. काम के दौरान भी करीब 100 जवान ग्रामीणों के चारों ओर घेरा बनाए रखते थे. दो माह की कड़ी मेहनत के बाद आदिवासी अपने फौलादी हौसलों के बूते पहाड़ी और जंगलों से घिरे इलाके में सड़क बनाने में कामयाब रहे. इसकी एवज में उन्हें मनरेगा के तहत 40 लाख रु. का भुगतान भी किया गया. 17 मार्च को सड़क के लोकार्पण के मौके पर छत्तीसगढ़ के आदिवासी विकास मंत्री केदार कश्यप ने कहा, 'लोगों ने भूगोल बदलकर, इतिहास रच दिया.'

इस सड़क के बनने से 8 पंचायतों के 24 गांवों का आपस में सीधा संपर्क हो गया है. यह इलाका अबूझमाड़ समेत दक्षिण बस्तर से भी जुड़ गया है. कभी मरघट की तरह सुनसान और सन्नाटे से घिरा रहने वाला पुसपाल घाट अब लोगों की चहलकदमी बढ़ने से जिंदा लगने लगा है.

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