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तिहाड़ जेल: दिल्ली में होने का दंश

यह आश्रम है या शरणस्थली? धनी और रसूख वालों से पूछिए यह बात, जिनकी 2011 में यहां लाइन लग गई.

तिहाड़ जेल
तिहाड़ जेल
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2011

कंक्रीट से बना भूरे रंग की चारदीवारी वाला 400 एकड़ में फैला एक विशाल परिसर, जिसके भीतर 12,300 लोग कैद हैं. यह जेल दिल्ली के बीचोबीच है, लेकिन राजधानी के नेताओं और व्यापारिक हस्तियों से इसके रिश्तों को देखते हुए इसे किसी दूसरे ग्रह पर होना चाहिए था.

2011 में एक के बाद एक घोटालों ने तिहाड़ को अतिमहत्वपूर्ण लोगों का निवास बना दिया. आज यह दुनिया की सबसे मशहूर जेल बन गई है.

चिकने-चुपड़े सीईओ को बगल के वार्ड में पिटते कैदियों की चीख सुनकर रातों को जागना पड़ता था. ऊपर से चूहों, मकड़ियों और मच्छरों ने बिजनेस क्लास में उड़ने के आदी इन अधिकारियों की नींद अलग हराम कर रखी थी. उन्हें रंगीन जिंदगी की आदत थी और जो पत्रिकाओं के रंग-बिरंगे पन्नों पर छाए रहते थे. कभी पार्टी के प्रभावशाली नेता रह चुके लोगों को मानसिक तकलीफ होने पर उनका मजाक उड़ाया जाता और जेल अधीक्षक के दफ्तर में एक कप चाय पीने पर उनसे सवाल किया जाता.

तिहाड़ 2011 के भ्रष्टाचार के बीच जवाबदेही का प्रतीक बन गया था. मशहूर हस्तियों के चलते इसमें जगह की कमी की ओर ध्यान गया तो वहीं समाज की दूसरी बुराइयों के लिए भी यह एक प्रतीक बन गया.

ऐसा समाज, जहां गरीबों की न आवाज है, न उम्मीद और न कोई आजादी. तिहाड़ में सत्तर फीसदी कैदी विचाराधीन हैं, जिन्हें अदालत के फैसले का इंतजार है. ज्‍यादातर कैदी गरीबी के शिकार हैं. यहां पहुंचने तक तन पर एक साबुत कमीज तक नहीं थी. वे कुछ परिस्थितियों के शिकार हैं तो कुछ क्षुद्र लालच के.

22 नवंबर, 2010 को पद संभालने वाले जेल के दबंग महानिदेशक नीरज कुमार के अधीन तिहाड़ में तमाम नामी-गिरामी हस्तियां कैदी बनकर आईं. शुरुआत पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के साथ हुई, जिन्हें 2 फरवरी को पटियाला अदालत से सीधे यहां लाया गया था. प्रभावशाली लोगों की परेड जारी है. 2जी घोटाले में सीबीआइ के तीसरे आरोपपत्र में नए आरोपियों को कहां रखा जाएगा? नीरज कुमार हंसते हुए कहते हैं, ''फिक्र मत कीजिए. उनके लिए जगह का इंतजाम कर लेंगे.''

तिहाड़ की अभेद्य दीवारों के भीतर हंसी कम ही सुनाई देती है. इंसान की हैवानियत की मिसालें यहां देखी जा सकती हैं. पति की हत्या करने वाली एक औरत अब भी कहती है, ''वह इसी का हकदार था.''

उसकी आंखों में आंसू का एक कतरा तक नहीं. किशोरों की जेल में बंद कम उम्र का एक लड़का जेल का ककहरा सीख रहा है. वह इसी से खुश है कि जिंदगी में पहली बार उसे साफ कपड़ा पहनने को मिल रहा है. नशीली दवाएं ले जाने के एक अभियुक्त को शिकायत है कि गिरोहों के लोग उसे पूजा-पाठ नहीं करने देते. यहां सच बड़ा कड़वा है और भावनाओं के लिए यहां कोई स्थान नहीं है.

यह मुक्ति की भी जगह है, जिसकी मिसालें भी हैं: कैनवस पर भदेस कृतियां बनाने वाला चित्रकार सूरज, मार्क्सवादी दार्शनिक और संयोग से कुछ करोड़पति व्यापारियों के गुरु कोबाड गांधी. यह ऐसी जगह है, जो लोगों को आजादी की सही कीमत का एहसास कराती है.

जेसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा की ओर बरबस नजर चली जाती है, जो जेल नंबर 2 के कारखाने में एक सज्‍जन मुख्य वित्तीय अधिकारी की भूमिका में दिखाई देता है. पूर्व नगर पार्षद शारदा जैन के भी दर्शन हो जाते हैं, जिन्हें अपने एक सहकर्मी की हत्या के जुर्म में सजा काटनी पड़ रही है.

वे जेल नंबर 6 के कारखाने में थोड़ी लज्‍जा के साथ सिलाई मशीन चलाती हुई दिखाई दे रही हैं. यहां हर रोज सुबह 5 बजे उठने वाले हजारों गुमनाम कैदियों की भावनाओं को समझना कठिन है, जो ब्रेड के दो टुकड़ों के साथ अपने काम में जुटे रहते हैं, और अपने किसी सगे-संबंधी के आने का इंतजार करते रहते हैं, जिन्हें वे जेल के सीखचों के पीछे रहने के कारण छू भी नहीं सकते.

रात 8 बजे बत्ती बुझने तक वे बैरक में दूसरे 40 कैदियों के साथ टीवी पर नजर गड़ाए रहते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है.

एक राजनैतिक आरोप में तिहाड़ में 52 दिन बिता चुके सुधींद्र कुलकर्णी कहते हैं कि कैद लोगों को संवेदनशील बना देती है, लोगों को आपस में जोड़ती है. यह उनका भविष्य अंधकारमय बनाकर उन्हें पशु भी बना सकती है. यह कुछ के लिए आश्रम हो सकती है तो कुछ के लिए शरणस्थल.

अगर यहां कनिमोलि जैसी हस्तियां रही हैं, जिन्हें जमानत मिल जाती है और जेल से रिहा होने पर पिता की ओर से आयोजित समारोह में जिनका स्वागत किसी नायिका की तरह होता है, तो ऐसे भी युवा हैं, जिन्हें यह भी याद नहीं कि तिहाड़ की दीवारों के बाहर कैसा जीवन है. देश भर में उनके जैसे तीन लाख कैदियों की यही दशा है.

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