सत्यानाश हो अंग्रेजों का जिन्होंने हमें इतना भ्रमित कर दिया कि हम अब तक अपने लिए सही आर्थिक नीति भी नहीं तलाश पाए हैं. उन्होंने हमें रानी विक्टोरिया का पाठ पढ़ाया तो कार्ल मार्क्स भी दिया; फिर लॉर्ड कर्जन आए तो लोकतांत्रिक समाजवाद का सबक भी सिखाया गया. इतनी बेरहमी बरती कि खिचड़ी पक गई.
अंग्रेजों की अपनी सोच हालांकि साफ थी. उनके यहां विचारों के बाकायदा अलग-अलग कपड़े थेः अभिजन के लिए ऊंची हैट, मेहनतकश के लिए कैप. लेनिन बड़े समझदार थे, इसीलिए ब्रिटिश प्रतीकवाद को चुनौती देने की बजाए उन्होंने कैप पहन ली. हैट क्रांतिकारी नहीं होती. हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि 53 बरस की उम्र में शायद सिफिलिस की बीमारी से मरे लेनिन यदि 73 की उम्र में क्रेमलिन में जीवित होते, तो क्या पहनते. बहरहाल, '70 के दशक में उनके उत्तराधिकारी लियोनिद ब्रेझनेव एक बार सीना चौड़ा करके अपनी मां को अपने दफ्तर और शहर से दूर दूसरा मकान दिखाने ले गए, जिसमें एक शानदार झाड़फानूस लटका हुआ था. सब देखने के बाद बूढ़ी महिला ने चिंतित होकर पूछा, 'लेकिन लियोनिद, जब बोल्शेविक लौटेंगे तब हम क्या करेंगे?' इस किस्से की विश्वसनीयता पर तो सवाल उठाया जा सकता है, लेकिन उपमा पर नहीं. भ्रष्टाचार केवल हिंदुस्तान की बपौती नहीं है.
अंग्रेजों को मार्क्स पसंद नहीं थे, इसीलिए उन्होंने 19वीं सदी में उन्हें दफना दिया और 20वीं सदी में उनका निर्यात कर दिया. मार्क्स के कई पड़ावों में एक भारत भी था जहां उनकी मुलाकात गांधी से हुई.
कपड़ों को लेकर गांधी बड़े क्रांतिकारी विचार रखते थे. उन्होंने कपड़े त्याग दिए थे, हालांकि नंगे नहीं हुए थे. उनके तन पर हमेशा गरीबी लिपटी रही. मार्क्स के सर्वहारा ने भले ही रूस से रोमानोव शासकों को खदेड़ दिया हो, लेकिन गांधी के भूखे भारतीयों ने तो इतिहास के सबसे ताकतवर साम्राज्य को ही नेस्तनाबूद कर दिया था.
भारतीय वामपंथियों ने गांधी के नाम पर हमेशा अपनी नाक-भौं सिकोड़ी क्योंकि गांधी अर्थशास्त्र को राष्ट्रवाद में ले जाकर घुसा देते थे. गांधी ने घोड़ा पहले जोत दिया, घोड़ा यानी हिंदुस्तान उनकी बग्घी बाद में आई-यानी अर्थव्यवस्था. दक्षिण अफ्रीका के तोलस्तोय फार्म में उन्होंने राज करने का जो मॉडल विकसित किया और 1910 में जो हिंद स्वराज के नाम से छपा, वह विभिन्न अस्मिताओं का एक ऐसा हलुवा था जिसे एक आश्रम के अनुशासन में पकाया गया था. इसके बावजूद गांधी जब 1931 में लंकाशायर पहुंचे और उन्होंने अपनी पोपली मुस्कान छोड़ी, तो उन्हीं ब्रिटिश मजदूरों ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठा लिया जिनके बनाए कपड़े वे 1920 में जला चुके थे.
गांधी और उनके उत्तराधिकारी जब 1945 में स्वशासन की तैयारी में लगे थे, तभी जवाहरलाल नेहरू ने हिंद स्वराज को 'पूर्णतः अवास्तविक' करार देकर खारिज कर दिया था. नेहरू ने तो दिसंबर, 1929 में ही 'स्वीकार' कर लिया था कि 'मैं समाजवादी और गणतंत्रवादी हूं तथा राजों-रजवाड़ों में मेरी कोई आस्था नहीं, न ही उस व्यवस्था में जो औद्योगिक महारथियों को पैदा करती है... जिनके तरीके पुरानी सामंती राजशाही की तरह ही आदिम हैं.' गांधी की राजों-रजवाड़ों से बहुत पटती थी, चाहे वे उनके वक्त के हों या पुराने. दक्षिण अफ्रीका के उनके साहसिक अभियानों के लिए पैसा जमशेदजी टाटा भेजते थे; आजादी के आंदोलन पर कांग्रेस का जो खर्च आता था, इसकी व्यवस्था का जिम्मा जी.डी. बिरला और जमनालाल बजाज पर था. नेहरू के आलोचक इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे कि वे खादी के नीचे विदेशी चड्ढी पहनते हैं. गांधी ने नेहरू को सीधा जवाब दिया, 'उन्हें उड़ना पसंद है, मुझे नहीं. मेरे भारत की कल्पना में राजे-रजवाड़े और जमींदारों के लिए भी जगह है.'
इसके बाद तो समझौता होना तय थाः सह-अस्तित्व का समझौता. यह एक असहज पब्लिक-प्राइवेट संबंध जैसा था जिसमें निजी क्षेत्र वजन कम होने के बावजूद मारक था जबकि सार्वजनिक क्षेत्र का वजन बढ़ता जा रहा था, लेकिन उसके शरीर पर मांस नहीं चढ़ पा रहा था. भारतीय मार्क्सवादी बंगाल में अपनी आरामगाह से दलील देते रहे कि चूंकि बुर्जुआ लोकतंत्र में समाजवाद असंभव है, लिहाजा छद्म समाजवाद ही अपनाना होगा. ऐसा लगातार करके वे दोगलेपन में विशेषज्ञ हो गए. आखिर बहुरुपिए भारतीय राजनीति की विशिष्टता हैं. जिनको यह धोखा समझ में आया, उन्होंने कंधे उचकाकर भ्रम को झाड़ फेंका. एक बार ज्योति बसु से किसी ने पूछा कि वे पहले दर्जे में हवाई यात्रा क्यों करते हैं. उन्होंने पलट कर जवाब दिया-क्योंकि वे पहले दर्जे के कम्युनिस्ट हैं. हाजिरजवाबी और तीक्ष्णबुद्धि बचाव का सबसे अच्छा तरीका है.
ऐसे में संकट तो आना ही था. 1991 में सरकार आखिरकार पीछे हट गई, लेकिन उदारीकरण को यहां लचर समाजवाद से कहीं ज्यादा जहरीले दुश्मन का सामना करना थाः लोकप्रियतावाद. यह एक ऐसा राक्षस है जो वोटों की कभी न बुझने वाली प्यास को पूरा करने के लिए लगातार उस धन को निगलता रहता है जो अदृश्य है. ऐसा होता देख विचारधाराएं कुछ देर के लिए सहमी-कांपी, फिर गायब हो गईं. अब वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों ही एक भ्रम में जीए जा रहे हैं जिनके पास गंभीर तो क्या, मजाकिया विचार भी नहीं हैं. यूपीए सरकार जब कहती है कि उसे रुपए के डूबने का कोई अंदाजा नहीं, तो उसका यह बयान भोलेपन भरा होता है. दूसरी ओर जनता को इस बात का कोई अंदाजा नहीं कि आखिर यूपीए दो साल और सत्ता में क्यों बने रहना चाहती है.
विचारधारा का शून्य राजनीति को व्यक्तिगत बना देता है और फैसले सनक में किए जाते हैं. ठीक उसी बादशाह की तरह, जो एक पुरानी कथा में मान बैठा था कि वह नए कपड़े पहनकर लोगों के सामने आया है. दरबारियों की सराहना पर वह फूले नहीं समाता, लेकिन सिर्फ एक बच्चा है जो चिल्ला उठता है कि इसने तो कुछ पहना ही नहीं. वह बच्चा मतदाता है.

