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वाह! सिगरेट-बीड़ी बिके, ई-सिगरेट पर रोक

 सभी तरह के तंबाकू उत्पाद नुकसानदेह हैं इस तथ्य को जानते हुए भी सिर्फ ई-सिगरेट पर पाबंदी लगाने का फैसला अधूरा लगता है. 

फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे
फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे
अपडेटेड 20 सितंबर , 2019

देश में ई-सिगरेट पर पाबंदी लगाने का केंद्र सरकार का फैसला ठीक है लेकिन बाकी सिगरेट और बीड़ी जैसे उत्पादों को छोड़ देना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है. सिगरेट और तंबाकू उत्पादों के पैकेट में उससे कैंसर होने की चेतावनी बड़े चित्र के साथ बड़ी मुश्किल के साथ छपनी शुरू हुई है. सभी तरह के तंबाकू उत्पाद नुकसानदेह हैं इस तथ्य को जानते हुए भी सिर्फ ई-सिगरेट पर पाबंदी लगाने का फैसला अधूरा लगता है. 

ई सिगरेट पर पाबंदी इतने तगड़े तरीके से आई है कि इसके उत्पादन, इंपोर्ट, एक्सपोर्ट, ट्रांसपोर्ट, बिक्री, वितरण और विज्ञापन को अध्यादेश के जरिये संज्ञेय अपराध बनाया गया है और पहली बार के अपराध के लिए 1 लाख रुपए जुर्माना और एक साल की जेल, इसके बाद के अपराधों के लिए 5 लाख का जुर्माना और तीन साल की कैद का प्रावधान किया गया है. 

सरकार का ये काम तो सराहनीय है लेकिन बाकी तंबाकू उत्पादों को छोड़ देना बताता है कि सरकार किसी खास मकसद से ऐसा कर रही है. शायद उसे ई-सिगरेट से बहुत मामूली राजस्व मिलता है. सिगरेट पर सरकार टैक्स तो भारी-भरकम लगाती है लेकिन सच ये है कि एक चौथाई सिगरेट बिना टैक्स चुकाए बिक रही है. 

देश में बीड़ी पर बहुत मामूली टैक्स है और ये सबसे सस्ता तंबाकू उत्पाद बना हुआ है. 

ई-सिगरेट से मौतों की पुख्ता जानकारी नहीं मिली लेकिन अन्य तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाली मौतों की जानकारी बहुत पहले ही सामने आ चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, देश में 10 लाख लोग हर साल तंबाकू के उपयोग की वजह से मरते हैं. ये संख्या देश में सालाना मरने वाले लोगं का 9.5 फीसदी है. 2018 में देश में तंबाकू का सेवन करने वालों की संख्या 26 करोड़ से ज्यादा की है. देश की कुल आबादी में 42 फीसदी से ज्यादा कमाऊ है यानी उसकी उम्र 30 से 69 वर्ष के बीच है. 

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट इकोनॉमिक बर्डन ऑफ टोबैको रिलेटेड डिजीज इन इंडिया के मुताबिक, 2011 में 35 से 69 साल के लोगों में तंबाकू से होने वाली बीमारियों के फलस्वरूप 1,40, 500 करोड़ रुपए की आर्थिक चपत लगी. इसमें पुरुषों की हिस्सेदारी 91 फीसदी रही. 

जाहिर है, देश में तंबाकू से जानमाल का बहुत बड़ा नुकसान होता है और सरकार को इस पर रोक लगाने पर गंभीरता से सोचना चाहिए, राजस्व की चिंता किए बगैर. केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी अपने क्षेत्र में तंबाकू और गुटखे पर रोक लगा सकती हैं लेकिन ये काम बहुत चालाकी से किया गया है कि पाबंदी का पता न चले. 

देश के करीब दो दर्जन राज्य गुटखे पर पाबंदी लगा चुके हैं लेकिन ये तंबाकूयुक्त गुटखे पर लगी है और अलग से तंबाकू बिक रही है. सिगरेट पर पाबंदी किसी राज्य ने नहीं लगाई है क्योंकि ये भी राजस्व का मामला है. हां, ई-सिगरेट पर केंद्र सरकार के अध्यादेश से पहले ही 16 राज्य पाबंदी लगा चुके हैं. 

स्वास्थ्य महकमा तंबाकू का इस्तेमाल न करने के अभियानों पर खर्च करता है जबकि वित्त मंत्रालय बजट में उन पर टैक्स लगाता है. सिगरेट-बीड़ी पर पाबंदी लगाने की बात कोई नहीं करता. देश की कुल तंबाकू खपत में सिगरेट का योगदान ज्यादा नहीं है. 89 फीसदी खपत बीड़ी, खैनी और अवैध सिगरेट की होती है. कैंसर और फेफड़ों की बीमारी का मुख्य कारण तंबाकू है. सरकार का काम लोगों का कल्याण करना है न कि प्राइवेट कंपनी की तरह मुनाफा कमाना. 

सरकारों को शराबबंदी की तरह तंबाकूबंदी लागू करनी होगी, अन्यथा उसके कदम शक की नजर से देखे जाएंगे. 

(मनीष दीक्षित इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर हैं)

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