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बेबाकः न्याय-अन्याय की चक्की और आम आदमी

अदालत, फौज और सुरक्षा एजेंसियों की पहचान और प्रतिष्ठा इनके अनुशासन से होती है और इसमें जरा भी कसर दिखे तो तंत्र के गड़बड़ाने का अंदेशा बढ़ जाता है. 

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट
अपडेटेड 17 जनवरी , 2018

अदालत, फौज और सुरक्षा एजेंसियों की पहचान और प्रतिष्ठा इनके अनुशासन से होती है और इसमें जरा भी कसर दिखे तो तंत्र के गड़बड़ाने का अंदेशा बढ़ जाता है. एक उदाहरण को धारणा बनाना जल्दबाजी है लेकिन उससे सचेत होने और इसका उपाय ढूंढने की जरूरत तो बनती है. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का मीडिया के सामने आना निहायत अस्वाभाविक घटना है. 

चारों जजों ने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश पर काम के बंटवारे में वरिष्ठों की उपेक्षा का आरोप लगाया है. न्यायपालिका और लोकतंत्र के जिस स्तर पर ये आरोप लगा है वह काफी गंभीर है और इससे देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर के घटनाक्रम पर आम आदमी कयास लगाने लगा है, उसकी कल्पनाशक्ति, जो हुआ उससे कई गुना खराब चित्र बना रही है. इस धुंध का छंटना जरूरी है. 

जजों के आचार विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई, 1997 को रिस्टेटमेंट ऑफ वैल्यू ऑफ जूडिशियल लाइफ नामक चार्टर स्वीकार किया. बाद में इसे सभी हाईकोर्टों में भी लागू किया गया. इस चार्टर के तमाम कायदों में एक ये भी था कि जज मीडिया के सामने आकर अपनी राय नहीं रखेंगे, वह फैसले के जरिये बोलेगा. साथ ही जज ऐसा कोई काम भी नहीं करेगा जिससे लोगों की न्यायपालिका के प्रति धारणा खराब हो. 

12 जनवरी को चार्टर के इन दोनों प्रावधानों का घोर उल्लंघन हुआ. अगर जज मीडिया के सामने आए हैं तो उन्हें मीडिया के उन सवालों का भी सामना करना पड़ेगा जो शायद कोई पत्रकार अपनी जिंदगी में कभी किसी जज से करने की हिम्मत नहीं उठा पाता. सुप्रीम कोर्ट के जज आला दर्जे के कानूनविद होते हैं. धैर्य और भावनात्मक दृढ़ता हमेशा कायम रखने की उम्मीद की जाती है और अगर परिस्थितियां विपरीत हों तो ये अपेक्षा और बढ़ जाती है. 

लेकिन 12 जनवरी को ऐसा नहीं हुआ. 

मुख्य न्यायाधीश के प्रति असंतोष जाहिर करने से अदालत का सामान्य प्रशासन सवालों से घिरा. सुप्रीम कोर्ट में सभी न्यायधीश बराबर की योग्यता वाले होते हैं. लेकिन वहां भी अगर महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण केसों के बंटवारे की खींचतान होना नकारात्मक इशारा करता है. आरोप लगाने वाले जज अगर ये कहते हैं कि प्रधान न्यायाधीश फर्स्ट अमांग ईक्वल्स, है तो फिर उन्हें मुकदमों के कम और ज्यादा महत्वपूर्ण होने की शिकायत नहीं करनी चाहिए. 

कौन सा केस किस अदालत में चलेगा ये निर्विवाद रूप से सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का एकाधिकार है. वह मास्टर ऑफ रोस्टर होता है. चारों जजों ने इसको चुनौती देते हुए इसमें लोकतंत्र कायम करने की बात कही है. लेकिन लोकतंत्र इतना भी नहीं फैलना चाहिए कि अनुशासन ही तार-तार हो जाए. 

मीडिया में आने वाले जजों ने प्रेस कांफ्रेंस में फैसला जनता पर छोड़ा है. तो अब जनता की बात-सुप्रीम कोर्ट से कोई फैसला होता है तो आम जनता जज का नाम बाद में देखती है पहले वह सबसे बड़ी अदालत पर भरोसा करती है. जनता ये नहीं देखती कि ये फैसला किस न्यायाधीश ने सुनाया है. फलां मुद्दा ज्यादा महत्व का था इसलिए इस पर फैसला दूसरी अदालत को सुनाना चाहिए था. 

प्रधान न्यायाधीश के प्रशासनिक अधिकार सर्वोपरि होते हैं और शक्तियों को लोकतंत्र का रंग दिया जाएगा तो देश के और भी संस्थाएं विवादों में आ जाएंगी. 

सेना और पुलिस में अगर लोकतंत्र की आवाज उठी तो देश मुश्किल में पड़ जाएगा. कोई भी तंत्र एक अनुशासन में काम करता है और इसमें दरार नहीं पड़नी चाहिए. कुछ लोग ये दलील दे रहे हैं कि सरकार में भी ऐसी आवाज उठनी चाहिए तो उनको बता दें कि सरकार के मुखिया के पास ऐसे लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का उपाय होता है और सरकार को हर पांच साल में बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प जनता के पास होता है. लेकिन न्यायपालिका में ऐसे कोई विकल्प नहीं होते, उसकी सबसे बड़ी चीज उसकी प्रतिष्ठा होती है और प्रतिष्ठा जाएगी तो पूरी न्यायपालिका की जाएगी, बड़ा या छोटा कोई बच नहीं पाएगा. 

(मनीष दीक्षित, इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर हैं)

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