आगामी बजट सत्र के शांतिपूर्ण तरीके से निकल जाने की रही-सही उम्मीद खत्म होती दिख रही है. विनाशकारी तरंगें उठ चुकी हैं और इस तूफान के केंद्र में है 2 फरवरी को 2जी स्पेक्ट्रम पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला. जनवरी, 2008 में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा द्वारा विवादास्पद तरीके से में बांटे गए 122 लाइसेंस रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यूपीए कैबिनेट, खासकर उसके आला रहनुमाओं पर एक बड़ा दाग लगा दिया है. विपक्ष ने सरकार पर 2जी घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए उससे इस्तीफा मांगना शुरू कर दिया है. अब तक सरकार ने राजा को ही बलि का बकरा बनाया हुआ है, लेकिन ताजा फैसला अपराध के दायरे को और बड़ा करता है.
8 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
यह फैसला 70 अरब डॉलर के कारोबार और 85 करोड़ उपभोक्ताओं वाले उस दूरसंचार उद्योग के लिए मिलाजुला असर लेकर आया है जिसे इस देश में समावेशी विकास का नेतृत्व करना था, लेकिन बीच में ही खराब सरकारी नीतियों ने अड़ंगा डाल दिया. 2008 में इस कारोबार में उतरने वाली यूनीनॉर और स्वान जैसी कंपनियों पर इस फैसले का असर पड़ेगा. उनके लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं. हो सकता है कि उनकी कीमत पर दूसरे बड़े खिलाड़ियों को फायदा पहुंचे, लेकिन कुल मिलाकर इस समूचे उद्योग को राहत की सांस लेनी चाहिए. अदालत ने जो दिशानिर्देश जारी किए हैं, उनके मुताबिक निकट भविष्य में सरकारी नीति, कामकाजी फैसलों और निजी क्षेत्र के बीच के रिश्तों पर असर पड़ना लाजिमी है.
लाइसेंस रद्द करने का आदेश संविधान और कानून की सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और राजा, दोनों के किए गए उल्लंघन पर आधारित है.
- अदालत ने कहा है कि 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति संविधान में समानता के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि यह उन लोगों को पक्षपातपूर्ण तरीके से फायदा पहुंचाती है जिनकी सरकार तक पहुंच है. चूंकि इस नीति को यूपीए सरकार का ठोस समर्थन हासिल था, लिहाजा अदालत का फैसला पूरी सरकार को ही कठघरे में खड़ा करता है.
1 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
- अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि कैसे राजा ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) की सिफारिशों को अगस्त, 2007 में दूरसंचार आयोग के समक्ष अनदेखा किया जिसमें वित्त सचिव भी शामिल थे. पी. चिदंबरम के नेतृत्व वाला वित्त मंत्रालय शुरू में 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति के खिलाफ था लेकिन जनवरी, 2008 में जब लाइसेंस आवंटित किए गए तब उसने पलटी मार ली.
- सुप्रीम कोर्ट ने राजा को विधि मंत्रालय के उस सुझाव को भी न मानने का दोषी ठहराया है जिसमें स्पेक्ट्रम के मूल्यांकन का मामला मंत्रियों के एक विशेषाधिकार प्राप्त समूह को भेजे जाने की बात कही गई थी. कोर्ट का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री ने 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया था जिसे राजा ने खारिज कर दिया.
- अदालत ने राजा के लाइसेंस आवंटन की तारीख में भी फेरबदल कर उसे छह दिन पहले मुकर्रर किए जाने के मनमौजी फैसले पर भी उन्हें लताड़ा जिससे कुछ कंपनियों को बेजा फायदा पहुंचाया गया.
- कोर्ट के मुताबिक जिन कंपनियों ने 2004 और 2006 में आवेदन किए थे, उन्हें प्राथमिकता सूची में नीचे खिसका दिया गया जबकि 2007 में आवेदन करने वाली कंपनियों को तरजीह दी गई और यह सब राजा के कहने पर हुआ.
25 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इन सारे उल्लंघनों के बारे में सबको जानकारी थी और इन्हें मीडिया में और यहां तक कि संसद में भी 2007 के आखिरी तीन महीनों और 2008 की शुरुआती तिमाही के दौरान उठाया गया था. तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सब कुछ जानते हुए भी आवंटन रोकने की कोई कोशिश नहीं की. इस फैसले के बाद अब उनके पास मुंह छुपाने के लिए जगह नहीं है.
खासकर चिदंबरम तो ट्राइ कानून के तहत राजा को कानून का यह उल्लंघन करने से रोकने के अधिकारी थे. राजकोष के संरक्षक के तौर पर चिदंबरम के पास पर्याप्त अधिकार थे कि वे राजा की नीति से असहमत होते हुए मामले को कैबिनेट के पास भेजे जाने की अनुशंसा कर देते. पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया. ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम को पूरी तरह पाक-साफ घोषित नहीं किया है. इसकी बजाए उसने यह फैसला ट्रायल जज ओ.पी. सैनी के हाथ में छोड़ दिया कि वे तय करें कि 2जी मामले में उन्हें सह-आरोपी बनाया जाए अथवा नहीं. अब सबकी निगाहें सैनी पर हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक दो हफ्ते के भीतर चिदंबरम पर फैसला सुनाना है. हो सकता है कि वे अपना फैसला 4 फरवरी को सुना दें. सियासत में एक हफ्ते का वक्त काफी लंबा होता है. और यह हफ्ता चिदंबरम की जिंदगी का सबसे लंबा हफ्ता हो सकता है.
18 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखिए इंडिया टुडे
रद्द किए गए 122 लाइसेंसों को चार माह की अवधि के भीतर नीलाम किए जाने का सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मौजूदा दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल और विधि मंत्री सलमान खुर्शीद के लिए कड़ी लताड़ से कम नहीं है जिन्होंने यूपीए सरकार के बचाव में लगातार दलील दी है कि 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की नीति यूपीए की नहीं थी. उनके मुताबिक, इकलौता उल्लंघन 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति के क्रियान्वयन में हुआ है और शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में जोर देते हुए इस दलील को खारिज कर दिया है.
अपनी 'जीरो लॉस थियरी' के लिए अब कुख्यात हो चुके सिब्बल ने यह दलील दी थी कि 2001 की कीमतों पर 2008 में स्पेक्ट्रम आवंटन किए जाने पर राजकोष को कोई नुकसान नहीं हुआ था. एक बार 122 लाइसेंसों की नीलामी प्रक्रिया पूरी हो जाने पर इस हवाई दलील की हवा निकल जाएगी. अदालत का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए कि इस फैसले के बाद सरकार अपने नुकसान की भरपाई कर लेगी और उसे जो फायदा होगा, वह भी मामूली नहीं होगा. 3जी की नीलामी से सरकार को 1 लाख करोड़ रु. मिले थे. इसके मुकाबले राजा के स्पेक्ट्रम लुटाने से सरकार की झेली में महज 9,000 करोड़ रु. आए थे.
11 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति और निवेश पर कैबिनेट समिति की बैठक हुई, जिसके बाद सिब्बल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के सारा दोष राजा के सिर मढ़ना चाहा, ‘नीतिगत मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि (पहले आओ, पहले पाओ) नीति भेदभावपूर्ण है. यह नीति तत्कालीन एनडीए सरकार की विरासत है.’ मगर सिब्बल जिस सवाल का जवाब नहीं देते हैं, वह यह है कि यूपीए सरकार एनडीए की विरासत को ढोने के लिए मजबूर क्यों थी. आखिर ऐसा तो नहीं है कि पिछली सरकारों की कैबिनेट के फैसले कोई पत्थर की लकीर होते हैं. उन्हें अनुपयुक्त पाए जाने पर अकसर पलट भी दिया जाता है.
2जी मामले की जांच कर रही सीबीआइ को भी परोक्ष तरीके से ही सही, सुप्रीम कोर्ट ने निशाने पर लिया. भले ही अदालत ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण की ओर से 2जी मामले की जांच की निगरानी विशेष जांच दल (एसआइटी) को सौंपे जाने संबंधी लगाई गई याचिका ठुकरा दी, लेकिन उसने सीबीआइ को निर्देश दिया कि वह नियमित तौर पर अपनी जांच के निष्कर्षों पर केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) को रिपोर्ट करे जो इसे कोर्ट के सामने रखेगा.
04 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इस तरह सीबीआइ की जांच पर एक अतिरिक्त निगरानी रखी जाएगी. ध्यान रहे कि एक अन्य मामले में सीबीआइ की अनियमितता उजागर हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने यूनीटेक, स्वान और टाटा टेलीसर्विसेज पर विलय और अधिग्रहण के मानकों के उल्लंघन के आरोप में 5 करोड़ रु. प्रत्येक पर जुर्माना लगाया था. इन कंपनियों ने लाइसेंस दिए जाने के तुरंत बाद विदेशी निवेशकों को अपनी हिस्सेदारी बेच दी थी और इसके लिए अनिवार्य न्यूनतम अवधि का भी इंतजार नहीं किया था. दिलचस्प बात यह है कि सीबीआइ ने 2जी मामले में टाटा को छोड़कर सिर्फ दो कंपनियों को दोषी ठहराया है. अदालत की नजर में तीनों कंपनियां उल्लंघन की समान रूप से दोषी हैं, लेकिन सीबीआइ की नजर में ऐसा नहीं है.
माननीय अदालत के फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इसका लाभ उठाने के तरीकों पर चर्चा करता दिखा. विपक्ष के लिए फैसले का इससे बेहतर वक्त और नहीं हो सकता था. और लखनऊ में मौजूद राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने चिदंबरम पर हमला करने में कोई देरी नहीं की. उन्होंने कहा, ‘वित्त मंत्री राजकोष का संरक्षक होता है. यह वित्त मंत्री की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि जनता के पैसे की लूट न हो.’ उन्होंने कहा कि भले ही यह सरकार का फैसला था, लेकिन ‘इसमें संचार मंत्री और वित्त मंत्री की विशेष भूमिका थी.’ और उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार कर रहे राहुल गांधी के लिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बुरा कुछ नहीं हो सकता क्योंकि कांग्रेस का भ्रष्टाचार एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गया है. संभव है कि यह फैसला भारत के सबसे बड़े सूबे में चुनाव प्रचार की तस्वीर ही बदल दे.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
कोर्ट के फैसले की सबसे ज्यादा मार उन विदेशी निवेशकों पर पड़ेगी जिन्होंने लाइसेंस आवंटन के बाद भारतीय टेलीकॉम कंपनियों में पैसा लगाया था, क्योंकि अब ये लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं. यूनीटेक की दूरसंचार कंपनी में नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर के निवेश से बने संयुक्त उपक्रम यूनीनॉर ने इस मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया दी. यूनीटेक में 6,000 करोड़ रु. की कीमत पर 67 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने वाली और कोर्ट के आदेश के बाद 22 लाइसेंस गंवाने वाली यूनीनॉर के जारी एक बयान में कहा गया है, ‘हमारे साथ गलत बर्ताव हुआ है, चूंकि हमने तो वही सरकारी प्रक्रिया अपनाई जिसे हमें अपनाने को कहा गया था. हम यह जानकर झटका लगा है कि जिस सरकारी प्रक्रिया को अदालत ने दोषी पाया है, उसकी कीमत यूनीनॉर को चुकानी पड़ रही है.’
पूर्व दूरसंचार उद्यमी और सांसद राजीव चंद्रशेखर कहते हैं, ‘जिन निवेशकों ने भरोसा कर के निवेश किया होगा, वे अब निराश और चिंतित हैं. विदेशी निवेशक तो यह सोचकर आए थे कि सरकार ने एक बार लाइसेंस दे दिया है तो सब ठीक ही होगा.’ हालांकि चंद्रशेखर का मानना है कि एक हद तक दोषी वे भी हैं, ‘उन्हें खुद से पूछना चाहिए कि सौदा करने से पहले क्या उन्होंने पूरी जांच-पड़ताल की थी.’ चंद्रशेखर का मानना है कि यूनीनॉर और अन्य कंपनियां कानूनी राहत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी. वे कहते हैं, ‘कंपनियां सरकार पर मुकदमा ठोक सकती हैं.’ यदि रद्द किए गए 122 लाइसेंसों की धारक कंपनियों ने याचिका लगाई, तो यह प्रक्रिया काफी जटिल होगी और लाइसेंसों की उस नीलामी की प्रक्रिया में देरी हो सकती है जिसे चार महीनों में निबटाया जाना है.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उन कंपनियों पर भारी असर पड़ेगा जो दूरसंचार में पहली बार 2008 में आई थीं-यूनीनॉर (22 लाइसेंस), स्वान-एतिसालात (15 लाइसेंस) और श्याम सिस्टेमा (21 लाइसेंस). यदि आगामी नीलामी में वे कामयाब नहीं रहीं तो वे कारोबार से पूरी तरह बाहर हो जाएंगी. दूरसंचार क्षेत्र की अग्रणी कंपनी भारती एयरटेल को 2008 में कोई लाइसेंस नहीं मिला था, लिहाजा उसकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. दूसरे नंबर की वोडाफोन भी बेअसर रहेगी. सन् 2001 में लाइसेंस हासिल करने वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस भी फैसले से अप्रभावित है. हालांकि तीसरी सबसे बड़ी ऑपरेटर आइडिया के नौ सीमित लाइसेंस रद्द हो गए हैं. आगामी नीलामी में यह कंपनी भारी पैसा खर्च कर सकती है. बड़े खिलाड़ी भी रद्द हुए 122 लाइसेंसों में से कुछ को खुली नीलामी में खरीदने की स्थिति में होंगे और अपना बाजार मजबूत कर सकेंगे.
इसका एक खतरा हालांकि यह होगा कि यदि कुछ कंपनियां दूरसंचार के कारोबार से बाहर निकल जाती हैं तो प्रतिस्पर्धा घटेगी और बची हुई कंपनियां मनमाने तरीके से दाम बढ़ा सकेंगी जिसकी कीमत उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ेगी. चंद्रशेखर कहते हैं, ‘यह एक आशंका है, लेकिन नियामक को इस दिशा में ध्यान देना होगा कि कीमतें न बढ़ने पाएं क्योंकि प्रतिस्पर्धा घट गई है.’ उपभोक्ताओं के लिए हालांकि तत्काल चिंता की कोई बात नहीं है. जिन ऑपरेटरों के लाइसेंस रद्द हुए हैं, उन्हें नीलामी तक अपनी सेवाएं देने की छूट होगी.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
वैसे भी एक ही नंबर रखकर कंपनी बदलने की सुविधा तो है ही जो काम आएगी. ट्राइ के चेयरमैन जे.एस. सरमा कहते हैं, ‘हम एमएनपी (मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी) के दौर में रह रहे हैं और यह देश भर में लागू है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं. ग्राहक बड़ी आसानी से कंपनी बदल सकते हैं.’ जाहिर है, यह उन कंपनियों को नुकसान ही पहुंचाएगा जिनके लाइसेंस रद्द हो गए हैं. हो सकता है, उनके ग्राहकों में अगले चार महीनों के दौरान बड़े पैमाने पर भगदड़ मच जाए. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और बिक्री के लिए भी स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं.
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां नीतिगत भ्रम की स्थिति बनी हुई है और ऐसा सिर्फ स्पेक्ट्रम के मामले में नहीं बल्कि खनन और तेल एवं गैस की खोज के क्षेत्र में भी है. नीलामी प्रक्रिया पर देश की सबसे बड़ी अदालत की ओर से दिया गया जोर सरकार के नीतिगत भ्रम को दूर करने में मददगार ही होगा. यह निजी कंपनियों को खेल के नियमों के मुताबिक खेलने पर बाध्य करेगा और नीतिगत दायरे में प्रभाव और पहुंच से अपना काम करवाने के चलन को रोकेगा. हाल के दौर में जिस तरह भ्रष्टाचार के कैंसर ने देश को अपनी चपेट में ले लिया है, यह फैसला इस रोग को दूर करने में मददगार साबित होगा.-साथ में भावना विज अरोड़ा, प्रिया सहगल और शांतनु गुहा रे

