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रवाना हुआ एकता का रथ

भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवाणी की रथयात्रा से नीतीश कुमार को भरपूर राजनैतिक लाभ मिल रहा है. 83 वर्ष की उम्र में वरिष्ठ भाजपा नेता आडवाणी प्रधानमंत्री पद की दौड़ से भले ही बाहर हों, लेकिन इस पद के लिए राजग के अगले उम्मीदवार के चयन में उनकी भूमिका निर्णायक होगी.

नीतीश कुमार और आडवाणी
नीतीश कुमार और आडवाणी
अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2011

अक्तूबर माह की 11 तारीख को सिताबदियारा में मंच पर लालकृष्ण आडवाणी की बगल में बैठने के मिनट भर के भीतर ही नीतीश कुमार ने अपने श्रम मंत्री जनार्दन सिगरीवाल से कहा कि वे कैमरे और उनके बीच बाधा बन रहे पीले फूलों को किनारे खिसका दें. संदेश स्पष्ट था. बिहार के मुख्यमंत्री और भाजपा के पुरोधा न सिर्फ मंच पर साथ बैठे थे, अब वे एक ही नाव पर सवार भी हैं.

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आडवाणी और नीतीश ने इस अवसर पर एक-दूसरे की भरपूर तारीफ की. आडवाणी ने कहा, ''नीतीश केंद्रीय कैबिनेट में मेरे साथ रहे हैं. मुझे पता था, उनकी अगुआई में बिहार में बड़ा बदलाव होगा.'' नीतीश जवाब में बोले, ''बिहार में आपकी ही सरकार है'' बिहार के मुख्यमंत्री के लिए अवांछित गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इस अवसर पर गैरहाजिर थे.

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28 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे अंक

21 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे अंक

 

 

यह जनसभा जून 2010 की स्थिति के ऐन उलट थी, जब पटना में भाजपा की सद्भावना रैली को संबोधित करते हुए आडवाणी ने नीतीश को सार्वजनिक तौर पर याद दिलाया था कि ''बिहार में उनकी उपलब्धियों का श्रेय भाजपा को भी समान रूप से जाता है.'' उस रैली में नीतीश कुमार नहीं आए थे. आडवाणी को नीतीश का वह फैसला भी स्पष्ट रूप से नागवार गुजरा था जब उन्होंने अखबारों में छपे एक विज्ञापन में उन्हें मोदी के साथ दिखाए जाने के विरोध में 12 जून, 2010 को भाजपा नेताओं के सम्मान में आयोजित रात्रिभोज को रद्द कर दिया था. तब आडवाणी ने चतुराई से कड़ा जवाब देते हुए नीतीश को याद दिलाया था कि वे छह साल बतौर केंद्रीय मंत्री भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की राजग सरकार की वजह से रहे थे.

उधर, अपना विरोध दर्ज कराते हुए नीतीश ने अक्तूबर-नवंबर, 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में आडवाणी के साथ संयुक्त चुनाव प्रचार से भी कन्नी काट ली. नीतीश के पटना का नाम बदलकर पाटलिपुत्र रखने से मना करने पर दोनों नेताओं के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई थी. यह मांग आडवाणी ने सद्भावना रैली में रखी थी.

सारण जिले में स्थित जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा, जहां से आडवाणी ने अपनी 38 दिन की जनचेतना यात्रा शुरू की है, राजग के इन दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी की नई प्रतीक बनी है. यह वह काल है जब आडवाणी का राजनैतिक जीवन उतार पर और नीतीश का अपने शिखर पर है. भाजपा मोदी को जब बिहार से दूर रख रही है, ऐसे में नीतीश को आडवाणी के साथ बैठने से कोई परहेज नहीं है. उनका रथ नीतीश को केंद्र तक पहुंचा सकता है. 83 वर्ष की उम्र में वरिष्ठ भाजपा नेता भले ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हों, पर इस पद के लिए राजग के अगले उम्मीदवार के चयन में उनकी भूमिका निर्णायक होगी.

11 अक्तूबर को आडवाणी के साथ दो जनसभाओं के दौरान नीतीश ने अपनी सरकार की उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त पेश की और इस तथ्य पर जोर दिया कि कई दूसरी राज्‍य सरकारों ने उनकी सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों और नीतियों की नकल की है. इसके पीछे संदेश यही था कि बिहार से बाहर भी उनकी साख है और वहां वे अपनी भूमिका निभा सकते हैं.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी यात्रा जेपी की जन्मस्थली से शुरू करने के पीछे आडवाणी की मंशा यही थी कि वे समाजवादी नेता की संपूर्ण क्रांति को फिर से जिंदा कर सकें, जिसके चलते कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था और 1977 में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी. आडवाणी ने कहा, ''भ्रष्टाचार और काले धन की वजह से ऐसी स्थिति बन गई है कि मध्यावधि चुनाव कराने पड़ सकते हैं.''

और आडवाणी के दिमाग से बदले की भावना भी गई नहीं थी. अक्तूबर, 1990 में उन्हें अपनी मशहूर रथयात्रा इस राज्‍य में इसलिए रोकनी पड़ी थी, क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. आडवाणी ने कहा, ''देखो, 20 वर्ष में जमाना कैसे बदल गया है. एक मुख्यमंत्री ने बिहार में रथयात्रा के दौरान मुझे गिरफ्तार करवाया था. लेकिन इस समय राज्‍य में एक ऐसा मुख्यमंत्री है, जो मेरी यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना कर रहा है. जमाना बदल गया है.'' 

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