अब तक मुंबई पुलिस ने सिर्फ दो बड़े डॉन पकड़े हैं-अबू सलेम उर्फ 'कैप्टन' और अरुण गवली उर्फ 'डैडी'. और इन दोनों को शहर के दूरदराज बाहरी इलाके में बनी एक जेल में रखा गया है. लंबे-चौड़े आपराधिक रिकॉर्ड और कराची स्थित दाऊद इब्राहिम के अपराध सिंडिकेट से नफरत को छोड़कर इन दोनों स्टार कैदियों में एक जैसा और कुछ नहीं है.
शायद इसी कारण विदेश से प्रत्यर्पित सरगना 44 वर्ष का सलेम और यहीं का रहने वाला मुंबई का एकमात्र डॉन 60 वर्ष का गवली तलोजा जेल की 20 फुट ऊंची दीवारों के भीतर खुली जगह में मौका मिलने पर कभी-कभार बात कर लेते हैं. गवली को इस जेल में 2009 में लाया गया था और सलेम को उसके एक साल बाद. शहर के केंद्र से लगभग 50 किमी दूर मुंबई- पुणे एक्सप्रेस-वे पर पथरीली पहाड़ियों के बीच बनी इस जेल का उद्घाटन 2008 में हुआ था.
उसके बाद से, 20 मंजिला अपार्टमेंट ब्लॉकों की निशानी वाले मुंबई की रियल स्टेट के लंबे हाथ लहराते हुए जेल की दीवार तक पहुंचने शुरू हो गए हैं.
शहर के विचाराधीन कैदियों के लिए सबसे नए ठिकाने के तौर पर बनी तलोजा जेल से उम्मीद थी कि भायखला की आर्थर रोड जेल से थोड़ी भीड़ इससे छंट सकेगी, जहां 2,100 से अधिक कैदी भरे पड़े हैं, जो उसकी निर्धारित क्षमता के दोगुने से भी अधिक है. पास के गांव तलोजा के नाम पर पहचानी जानी वाली यह जेल अभी भी निर्माणाधीन है.
इसके दो साल में पूरी हो जाने पर यहां 2,427 कैदियों को रखा जा सकेगा. फिलहाल इसमें 867 कैदी हैं, जिनमें सोमाली समुद्री लुटेरे, बांग्लादेशी घुसपैठिए, इंडियन मुजाहिदीन और स्टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के सदस्य और साथ ही 39 वर्ष के लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित सहित सितंबर, 2007 में हुए मालेगांव विस्फोट मामले के आठ अभियुक्त शामिल हैं.
यहां भरत नेपाली, अश्विन नाइक और सलेम गिरोहों के सदस्य भी हैं. लेकिन यहां के स्टार हैं सलेम और गवली. महाराष्ट्र गृह विभाग के एक अधिकारी कहते हैं कि राज्य सरकार दाऊद गिरोह के प्रतिद्वंद्वियों को हमेशा तलोजा भेजती है, ताकि आर्थर रोड जेल में झ्गड़े-विवाद से बचा जा सके. लेकिन यह बंटवारा वास्तव में गैंगस्टरों के लिए सलाखों के पीछे से अपनी गतिविधियां चलाने में मददगार रहा है.
आर्थर रोड जेल नागपाड़ा में दाऊद के अड्डे के करीब है; यहां से गैंगस्टरों के लिए अपने संदेश किसी के हाथ कैदियों तक पहुंचाना आसान हो जाता है. तलोजा जेल दाऊद के प्रतिद्वंद्वी छोटा राजन के गढ़ नवी मुंबई के करीब है. पत्रकार ज्योतिर्मय डे की 2011 में हुई हत्या के मामले में राजन के भरोसेमंद साथी डी.के. राव की गिरफ्तारी के बाद उसे आर्थर रोड जेल की बजाए यहां भेजा गया था. बहरहाल, इसी मामले में गिरफ्तार बाकी लोगों को, जिनमें राजन गिरोह का शॉर्पशूटर और मुख्य अभियुक्त सतीश कालिया शामिल हैं, आर्थर रोड जेल में रखा गया है.
तलोजा जेल की खासियतों में उच्च सुरक्षा वाली दुमंजिला 'अंडा' सेल हैं, जिन्हें गोलाकार होने के कारण अंडा कहा जाता है. हर मंजिल में 105 फुट की 50 कोठरियां हैं. इनमें से एक कोठरी में सलेम रहता है. तलोजा जेल के पूर्व कैदी, जैसे कि इरफान अली (असली नाम नहीं) बताते हैं कि सलेम और गवली के बीच बैठकों की खबर जेल की गर्मागर्म अफवाह हुआ करती थी.
हाल ही में धोखाधड़ी के एक मामले में छह महीने की जेल काटकर लौटे ठाणे के एक प्रॉपर्टी डीलर के मुताबिक, ''सिर्फ इसलिए कि वहां करने के लिए और कुछ नहीं है, न कोई सेटेलाइट टीवी, न कोई फिल्म, लिहाजा हर कोई हर किसी को देखता रहता है.'' वह कहता है, ''डॉन लोग बाकी से किस तरह अलग होते हैं, इसका आइडिया उनके कपड़े पहनने के अंदाज से ही लग जाता है.''
सलेम अभी भी वैसा ही दिखता है, जैसा वह 2005 में पुर्तगाल से उसे वापस लाने वाले विमान से उतरते समय दिखा था-बेदाग जीन्स, टी शर्ट, सफव्द जूते जो भारी नमी वाली मुंबई में आम नहीं होते, और काले मखमल की जैकेट पहने हुए. जमीनी डॉन गवली, जिसने भारत से बाहर शायद कभी पैर नहीं रखा है, सफव्द कुर्ता-पाजामा और अपनी ट्रेडमार्क गांधी टोपी पहनता है. जेल में दोनों छोटे- छोटे साम्राज्यों के मालिक हैं.
सलेम के साथ उसके गिरोह के दो सदस्य हैं. मार्च, 2008 में शिवसेना पार्षद कमलेश जमसांडिकर की हत्या के चंद दिनों के भीतर ही गिरफ्तार गवली का साथ निभाने के लिए उसके गिरोह के छह सदस्य हैं. उसके गुर्गे उसकी पहरेदारी करते हैं, जिनमें लंबा और हट्टा-कट्टा दिनेश नारकर शामिल है. और उसका ज्यादातर समय हशीश पीने में बीतता है, जो इंसानी कूरियरों के जरिए जेल में तस्करी करके लाई जाती है.
दूसरी तरफ सलेम सिर्फ इम्पोर्टेड मार्लबोरो सिगरेट पीता है. वह अपनी कोठरी में नियमित रूप से कसरत करता है और बैडमिंटन खेलता है जिसकी सुविधा उसे एक अदालत ने दी है. वह जेल में अकड़कर चलता है, और साथी कैदियों के सलाम का जवाब नहीं देता. कोई उसके नजदीक जाने की जुर्रत नहीं कर सकता. एक बार जेल के एक कर्मचारी से, जो उसे बैठक क्षेत्र में अपने वकील से मिलने के लिए जल्दी करने के लिए कह रहा था, उसने गरज कर कहा था, ''गोली यहां खाएगा या बाहर खाएगा?'' हालांकि सलेम एक एल्यूमीनियम चम्मच के कारण तलोजा जेल पहुंचा था.
गैंगस्टर मुस्तफा डोसा ने जुलाई, 2010 में आर्थर रोड जेल में इसी चम्मच को हथियार बनाकर सलेम के चेहरे पर वार कर दिया था. वह शख्स जो खुद की शक्लो-सूरत किसी फिल्म स्टार की तरह होने का गर्व करता है, कुछ समय तक चेहरे पर पट्टी बांधे दिखा था. सलेम पर हुआ हमला अनूठी बात नहीं था. 2006 और 2007 में क्रमशः दो अपराधी, जॉन डिसूजा और अजगर अली मेहंदी जेल में मारे गए थे. सितंबर, 2010 में सलेम के साथी मेहंदी हसन पर, जो प्रदीप जैन हत्याकांड में अभियुक्त था, आर्थर रोड जेल में दो विचाराधीन कैदियों ने हमला किया था. इस साल जनवरी में, हत्या के एक आरोपी अकरम खान को एक और कैदी ने पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया था.
यह तो पता नहीं है कि डोसा और सलेम में हुज्जत किस बात पर हुई थी, मगर दोनों को तुरंत अलग कर दिया गया था-सलेम को तलोजा जेल और 1993 के मुंबई विस्फोटों में अपनी भूमिका के लिए 2003 में दुबई से प्रत्यर्पित डोसा को छोटी-सी ठाणे जेल में भेजा गया. पुलिस अधिकारी इस तर्क पर विश्वास करते हैं कि यह झूमाझ्टकी सोची-समझी चाल थी और इसका उद्देश्य था दो हाइप्रोफाइल गैंगस्टर्स को भारत के सबसे कुख्यात कैदी-अजमल अमीर कसाब की चमक से दूर ले जाना.
दरअसल 26 नवंबर, 2008 के मुंबई हमले के एकमात्र जीवित बचे हमलावर के इस जेल में आने के बाद से अंग्रेजों के जमाने की इस जेल की जांच और सुरक्षा बढ़ गई है, जिसमें गिरोहों के सर्वेसर्वा का दम घुटने लगा था. गवली जेल के भीतर मिलने वाली सेवाओं के लिए भुगतान के लिए जाना जाता है-आखिर उसका गिरोह सेंट्रल मुंबई में अभी भी सक्रिय है-सलेम ने दिन में दो बार बाहर से भोजन सहित कुछ खास सुविधाओं के लिए अनुमानित 1 लाख रु. प्रति माह का भुगतान करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है.
गवली को अच्छी तरह जानने वाले एक वकील ने बताया कि उसके मुखबिर हर जगह हैं, जेल के भीतर भी और बाहर भी. वे कहते हैं, ''चाहे वह पाव बेचने वाला हो या चाय स्टाल का मालिक, हर कोई गवली का वफादार है.''
कई हाइप्रोफाइल अपराधियों से निबट चुके एक जाने-माने फौजदारी वकील के मुताबिक गैंगस्टरों के लिए अपना गिरोह चलाने के लिए जेल सबसे सुरक्षित जगह है. उनका काम करने का ढंग बहुत सरल है-गिरोह का कोई सदस्य जानबूझ्कर अपराध करता है और जमानत पर छूटने से इनकार कर देता है. किसी तरह वह उसी जेल में पहुंच जाता है, जहां उसका आका होता है. वह अपने बॉस से निर्देश और संपर्क सूत्र लेता है, दो या तीन दिन में जमानत करवा कर जेल से बाहर आता है और जो सुपारी उसने ली होती है, उसे अंजाम दे देता है. वे आगे कहते हैं, ''सलेम और गवली ने भी यही रणनीति अपनाई है. यही वजह है कि सलाखों के पीछे से भी उनका अंडरवर्ल्ड का कामकाज पूरे जोरों से चल रहा है.''
सलेम के पूर्व वकील अशोक सरावगी भविष्यवाणी करते हैं, ''सलेम के खिलाफ केवल दो मामले दिल्ली हाइकोर्ट में लंबित हैं. वह जल्द ही, दो या तीन वर्षों में, छूट जाएगा.'' वे कहते हैं, ''वक्त उसके साथ है.'' मतभेद होने के बाद 2008 में सलेम ने सरावगी से सेवाएं लेनी बंद कर दी थीं. सलेम अपनी पार्टी बनाकर 2007 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहता था. उसे शक था कि सरावगी उसके नाम पर अपनी राजनैतिक हसरतें पूरी कर रहे थे. हालांकि सरावगी इस आरोप से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ''सलेम चुनाव नहीं लड़ सकता था, क्योंकि वह राज्य में मतदाता नहीं था. उसके मुंबई भाग जाने के बाद जल्द ही उसके नाम को राज्य की मतदाता सूची से निकाल दिया गया था.''
स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाला सलेम, 1990 के दशक में अंधेरी, मुंबई, में एक डिपार्टमेंटल स्टोर पर इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचता था. उसने दाऊद गिरोह के लिए एक कूरियर के तौर पर काम शुरू किया और दाऊद के एक और गुर्गे-छोटा शकील के साथ कड़े संघर्ष के बाद 1998 में अपनी अलग राह पकड़ी. पिछले कुछ वर्षों में सलेम करीब 40 लाख रु. कानूनी फीस में खर्च कर चुका है. उसने कुछ प्रभावशाली नेताओं के लिए हवाला लेन-देन करके कुछ पैसे कमाए हैं.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया, ''2005 में जब उसका प्रत्यर्पण हुआ था, तब उसने भारत की खुफिया एजेंसियों के साथ यह समझैता किया था कि वह हवाला गोरखधंधे के नेताओं के खिलाफ जाने वाले सबूत नष्ट कर देगा और उसकी एवज में जेल में एजेंसी उसे थर्ड-डिग्री यातना नहीं देगी.'' उसके 'शुभचिंतक' अभी भी उसके कानूनी खर्च उठा रहे हैं.
गवली के बारे में एक पुलिस मुखबिर बिल्लू कहता है, ''गवली जेल में सबसे सुरक्षित है. उसकी मनोदशा समझें कि वह गैंगस्टर है, जिसे मौत से डर लगता है. एक बार पुणे की यरवदा जेल से मुंबई तक 200 किमी के सफर के दौरान उसने पुलिस वैन से बाहर कदम रखने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसे डर था कि उसे मुठभेड़ में गोली मार दी जाएगी.
अक्तूबर, 2004 में जब वह चिंचपोकली से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहा था, तब उसने खुद अपना वोट डालने से इस डर से मना कर दिया था कि उसके घर के बाहर तैनात वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक विजय सालसकर उसे मुठभेड़ में मार डालेंगे.'' गवली तलोजा में भी बेहद सतर्क रहने के लिए जाना जाता है. जब उसकी कोठरी की सफाई की जाती है, तब वह अपनी पीठ दीवार के साथ सटा कर खड़ा रहता है. जेल में दो दशक से अधिक वक्त बिता चुका गवली जानता है कि यह चारदीवारी सुरक्षित नहीं होती.
राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल मार्च में विधान परिषद में यह स्वीकार कर चुके हैं कि राज्य की जेलों में सुरक्षा अपर्याप्त है. उन्होंने कहा था, ''राज्य की जेलों में जरूरत से ज्यादा भीड़ है. कुछ जेलें बहुत पुरानी हैं और जेलों की मरम्मत की जरूरत है.'' उधर पुलिस भर्ती पर अंकुश लगा हुआ है और ऐसे में सुरक्षा बढ़ाने की मांग के अभी जल्द ही पूरा होने की संभावना नहीं है. ऐसे में अपराध जगत के ये बॉस जेलों से तब तक राज करते रहेंगे, जब तक वे आजाद नहीं हो जाते.

