सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस चेलमेश्वर ने एक बार फिर विवाद को जन्म देते हुए इंटरव्यू दे डाला है. जजों के आचरण के लिए जो नियम तय हैं उनमें इंटरव्यू न देना भी एक हिदायत है. लेकिन जस्टिस चेलमेश्वर ने करन थापर को दिए इस इंटरव्यू में एक सवाल के जवाब में कहा कि वो नियम फैसलों पर इंटरव्यू को लेकर है. अन्य मसलों पर इंटरव्यू दिया जा सकता है. जस्टिस चेलमेश्वर का ये कदम एक बड़ी चिंता की वजह बनता है.
सबसे पहले चिंता की बात. जस्टिस ने खुलेआम उन सीमाओं का अतिक्रमण किया है जो न्यायिक अनुशासन के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट ने तय किए हैं. हर फैसला जजों की राय होता है लेकिन निजी नहीं. वह भारत की न्यायपालिका की आवाज होता है और उसमें अगर जज अपनी निजी अवधारणा विकसित करे तो वह चाहे जितनी बेहतर हो लेकिन गलत उदाहरण प्रस्तुत करती है. जजों की अंतरात्मा की आवाज अदालतों का अनुशासन नहीं तोड़ सकती. न्यायपालिका संविधान और कानून का अनुशासन दूसरों से पालन कराती है वह खुद इसे भंग करेगी तो इसका फायदा नेता ही उठाएंगे. सोचिए जज साहब अगर ऐसी ही आवाज सेना या सुरक्षाबलों से उठने लगी तो क्या होगा. देश में लोकतंत्र के नाम पर और लोकतंत्र की आड़ में अराजकता आ जाएगी. नेता और राजनीतिक दल हर सिस्टम को तोड़कर उसमें अपनी टांग अड़ाने की ताक में रहते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पुलिस है जिसकी विश्वसनीयता और कार्यप्रणाली शून्य से भी नीचे चली गई है. आजादी के बाद हम अपना सिस्टम बना सकते थे लेकिन पुलिस नेताओं के स्वार्थ पूरे करने का सबसे आसान माध्यम बन गई. थाने बिकते हैं...जैसी बातें बहुत आम और स्वीकृत हो गई हैं. पुलिस के बाद की अगला निशाना बनी न्यायपालिका. हालांकि अगर न्यायपालिका ने अपने आप को राजनीति से बचाने का प्रयास किया होता तो आज ये दिन नहीं देखने को मिलता. भ्रष्टाचार ऊपर से शुरू होता है. नेता सत्ता के शीर्ष पर होते हैं लिहाजा उनकी जिम्मेदारी ज्यादा बनती थी जो कि उन्होंने नहीं निभाई और नतीजा पूरे तंत्र के भ्रष्ट होने के रूप में सामने आया. जस्टिस चेलमेश्वर ने पिछली बार जब प्रेस कांफ्रेंस की थी तब ही उन्होंने न्यायपालिका के भीतर की खदबदाहट को सामने ला दिया था. लेकिन ठीक उसी दिन उनकी वामदल के एक नेता डी. राजा से अपने घर में मुलाकात की जिससे उनकी अपनी आवाज की निष्पक्षता का स्तर कम हो गया. यही 7 अप्रैल को करन थापर को दिए साक्षात्कार में भी हुआ जब उन्होंने खास केस खास बेंच को अलाट किए जाने के सवाल पर सीधे कुछ नहीं बोला लेकिन जब उन्हें जयललिता के आय से अधिक संपत्ति वाले केस की याद दिलाई गई तो उनकी तरफ से सुर सहमति का निकला. जस्टिस चेलमेश्वर एनजेएसी कानून को रद्द करने के खिलाफ राय देने वालों में शामिल थे. कामकाज के आवंटन को लेकर सीनियर-जूनियर के सवाल अगर लोकतंत्र के दूसरे अंगों में भी उठने लगेंगे तो देश में अराजकता आ जाएगी. जस्टिस चेलमेश्वर की राह पर दूसरे जज चलने लगेंगे तो भी देश में लोकतंत्र की क्या दशा होगी ये सोचा जा सकता है.
अब उम्मीद की चर्चा. जस्टिस चेलमेश्वर के कदम ने न्यायपालिका को एकदम सतर्क कर दिया है और उस पर थोड़ा दबाव भी बना है. उम्मीद ये है कि जस्टिस चेलमेश्वर की तरह कोई और ऐसा कदम न उठाए इसके पर्याप्त इंतजाम किए जाएंगे. न्यायिक अनुशासन का दायरा विस्तृत होगा ताकि जज अपनी असहमति जाहिर कर सकें।
जस्टिस चेलमेश्वर के रिटायरमेंट को बमुश्किल तीन महीने बचे हैं और उन्होंने इस इंटरव्यू में ये भी ऐलान कर दिया कि मैं रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकार का कोई भी पद नहीं ग्रहण करूंगा. ये सबसे सकारात्मक बात उन्होंने कही है. इसी लीक पर अगर दूसरे जज और हाईकोर्ट के जज भी चलेंगे तो निश्चित तौर पर न्यायपालिका की विश्वसनीयता बढ़ेगी. लेकिन अनुशासन का सख्ती से पालन किए बगैर इस देश के संविधान और लोकतंत्र को बचाना मुश्किल है. राजनेता चाहें तो पुलिस को निर्मल बनाने से शुरुआत कर सकते हैं लेकिन उनसे उम्मीद नहीं है. उम्मीद तो अदालत से ही है जो इन दोनों को दुरुस्त रखती है.

