हर 12 कोस (36 किमी) पर पानी और बोली बदल जाती है. यह कहावत कम-से-कम राजस्थानी भाषा के संदर्भ में सटीक बैठती है क्योंकि यहां की विभिन्न बोलियां राजस्थानी भाषा की मांग को लेकर कभी भी एक सुर में नहीं बोल पाईं. खैर, राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए एक अरसे से उठ रही मांग का भले कोई नतीजा न निकल पाया हो लेकिन इंटरनेट और ब्लॉग पर आज यह भाषा दहाड़कर बोल रही है. बस गूगल पर राजस्थानी लैंग्वेज टाइप करने की दरकार है, एक लंबी सूची सामने आ जाएगी, जो आपको राजस्थानी भाषा, उसकी साहित्यिक समृद्धता और कलात्मक वैभव से रू-ब-रू करवाएगी. राजस्थानी लर्न वेबसाइट तो अंग्रेजी से राजस्थानी भी सिखा रही है.
इंटरनेट पर ऐसे दर्जनों ब्लॉग और साइट्स हैं, जिनका पता लिखने पर राजस्थानी भाषा के और करीब पहुंचा जा सकता है. युवा राजस्थानी साहित्यकारों ने अपनी रचनात्मक छटपटाहट को शांत करने के लिए अब इंटरनेट को अपना मुकाम बना लिया है. प्रदेश के चूरू जिले के युवा साहित्यकार दुलाराम सहारण ने पोथीखानो नाम से ब्लॉग बना रखा है. इस पर आपको राजस्थानी भाषा से जुड़े साहित्यकार, किताबें, इस भाषा में निकलने वाली पत्र-पत्रिकाएं, भाषा की जानकारी सब कुछ मिल सकता है.
युवा रचनाकार राव गुमान सिंह के राजस्थानी ओळखाण, जितेंद्र कुमार सोनी के मुळकती माटी, विनोद सारस्वत के मायड़ रो हेलो, कीर्ति राणा के आपणी भाषा-आपणी बात जैसे ब्लॉग भी काफी पसंद किए जा रहे हैं. इनमें राजस्थानी भाषा की मिठास भी आपको मिल सकती है. यह इंटरनेटीय होड़ इस भाषा को युवा पीढ़ी से जोड़े रखेगी.
अब सवाल आता है भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का. 7 करोड़ राजस्थानियों की भाषा पर मान्यता को लेकर राजनैतिक पेच बड़े विलेन के रूप में सामने आया है. राजस्थान में बोली जाने वाली विभिन्न बोलियों की वजह से प्रदेश के राजनेताओं में मूल राजस्थानी भाषा को लेकर कभी एक राय नहीं बन पाई. प्रदेश में मारवाड़ी भाषा जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर इलाके में बोली जाती है तो उदयपुर, भीलवाड़ा क्षेत्र में मेवाड़ी. बांसवाड़ा और डूंगरपुर का इलाका बागड़ी का है तो जयपुर अंचल में ढूंढाड़ी चलती है. कोटा और बूंदी क्षेत्र हाड़ौती का है तो भरतपुर मेवाती का.
राजस्थानी भाषा और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्याम महर्षि साफ करते हैं कि ‘बंगाल और महाराष्ट्र में भी दर्जनों बोलियां हैं लेकिन वहां भी एक क्षेत्रीय भाषा है.’ बता दें कि राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा दिलाने को लेकर पहली दफा 1936 में मांग उठी थी. लेकिन राज्य की विधानसभा में इस भाषा पर 2003 में जाकर कोई एकराय बन पाई और तब इस आशय का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया. केंद्र ने ओडीशा के वरिष्ठ साहित्यकार एस.एस. महापात्र की अगुआई में एक कमेटी बना दी. उसने दो साल बाद रिपोर्ट पेश की. इसमें राजस्थानी और भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जे का पात्र बताया गया.
2006 में उस वक्त के गृह मंत्री ने उसी चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल में राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा देने का भरोसा दिया. बाकायदा बिल भी तैयार कर लिया गया था. लेकिन पेश वह आज तक नहीं हो पाया. महर्षि इसका ठीकरा राजनैतिक दलों पर फोड़ते हैं, ‘कांग्रेस कहती है कि हमने प्रस्ताव भेज दिया तो कम से कम विपक्ष को तो दबाव बनाना चाहिए था. वह क्यों मौन है?’
पंद्रहवीं लोकसभा के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान बीकानेर के सांसद अर्जुन मेघवाल ने राजस्थानी भाषा में शपथ लेनी चाही पर उन्हें रोक दिया गया. वजहः क्योंकि वह संविधानिक मान्यता प्राप्त नहीं थी. इसके बाद मेघवाल ने संसद में एक दर्जन से ज्यादा बार यह मामला उठाया. वे कहते हैं, ‘सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून के तहत पांचवीं तक के बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाने को कहा. पर राजस्थान में मातृभाषा है कहां?’ वे मानते हैं कि मातृभाषा में छोटे बच्चे अच्छी तरह समझेंगे. लेकिन ऐसा कानून बनाने से पहले सरकार को राजस्थानी भाषा के बारे में सोचना चाहिए.
वैसे, पेच और भी हैं. भारतीय रिजर्व बैंक ने कह दिया है कि रुपए पर अब एक और भाषा छापने के लिए जगह नहीं. लेकिन नोट पर तो अभी भी सारी मान्यता प्राप्त भाषाएं कहां छप रही हैं? संघ लोक सेवा आयोग की सुनिए. उसकी आयोजित होने वाली परीक्षाओं में पेपर तैयार करने के लिए उसके पास जानकार नहीं हैं. महर्षि फिर टोकते हैं, ‘जयपुर और जोधपुर विश्वविद्यालय के पेपर कैसे तैयार होते हैं?’ इतनी समृद्ध भाषा के आगे ये पेच इतने भी उलझे हुए नहीं हैं, बशर्ते कोई सुलझाने में दिलचस्पी दिखाए. 600 कहानियों और अपनी बातां री फुलवारी के लिए मशर लेखक 87 वर्षीय विजयदान देथा (बिज्जी) राजस्थानी साहित्य के अपने 58 वर्ष के लंबे अनुभव पर थोड़ा बोलते हैं: ‘राजनेता ही संवैधानिक ओहदा दिलाकर इस समृद्ध भाषा को बचा सकते हैं.’ देथा की मानें तो राजस्थानी अमेरिका जैसे पराये देश में भाषा की मान्यता को लेकर संघर्ष कर रहे हैं जबकि उनके खुद के देश में ये भाषा पराई है.
यहां एक और शिकायती स्वर आकर जुड़ता है, राजस्थानी सिनेमा का. फिल्मकार-अभिनेता शिरीष कुमार कहते हैं कि जब 200 रु. में शाहरुख खान बिकता है तो इतने में ही शिरीष कुमार को या दूसरी राजस्थानी फिल्मों को कौन देखना पसंद करेगा? प्रदेश की (अशोक) गहलोत सरकार ने हर तरह के सिनेमा को सौ फीसदी करमुक्त करके न सिर्फ राजस्थानी फिल्मों का हक छीना है बल्कि अश्लीलता को भी बढ़ावा दिया है.’
खैर, केंद्र सरकार भले ही करोड़ों लोगों की भाषा समझने की कोशिश न करे लेकिन अखबार और स्थानीय न्यूज चैनल जरूर उसकी अहमियत को समझ गए हैं. खबरों में रोचकता लाने और राजस्थानियों के दिलों तक पहुंचने के लिए वे अपनी खबरों में ठेठ राजस्थानी शब्दों को परोसने लगे हैं. ईटीवी राजस्थान राजस्थानी भाषा से जुड़े कई कार्यक्रम प्रसारित कर रहा है. इस चैनल के प्रमुख जगदीशचंद्र कहते भी हैं, ‘सरकार को करोड़ों लोगों की भावना को देखते हुए राजस्थानी भाषा को ससम्मान दर्जा देना चाहिए.’
मोबाइल कंपनियां भी राजस्थानी में ग्राहकों तक पहुंच रही हैं. कस्टुमर केयर राजस्थानी भाषा में ग्राहकों से बात कर रहा है तो उसी भाषा के गाने, कॉलरट्यून और रिंगटोन भी खूब बज रहे हैं. जरूरत है सरकार को करोड़ों लोगों की भाषा समझने की, ताकि नेताओं और मतदाताओं में अपणायत बणी रहे.

