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कहानी संग्रह: जनसंघर्ष के कथानक

कहानीकार उर्मिला शिरीष के इस संग्रह में भारतीय समाज के जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ की बारीक परतों को निर्ममता से खुरेचा गया है. यथार्थवाद की कथाभूमि की बंधी-बंधाई चौहद्दी को लांघती इन कहानियों का मूल स्वर है-सामाजिक सरोकारों से जुड़ते हुए अनुभूत सच की संवेदना को पूरी मार्मिकता से उकेरना.

अपडेटेड 5 फ़रवरी , 2012

लकीर तथा अन्य कहानियां

उर्मिला शिरीष

आर्य प्रकाशन मंडल, गांधीनगर, दिल्ली-31,

कीमतः 190 रु.

कहानीकार उर्मिला शिरीष के इस संग्रह में भारतीय समाज के जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ की बारीक परतों को निर्ममता से खुरेचा गया है. यथार्थवाद की कथाभूमि की बंधी-बंधाई चौहद्दी को लांघती इन कहानियों का मूल स्वर है-सामाजिक सरोकारों से जुड़ते हुए अनुभूत सच की संवेदना को पूरी मार्मिकता से उकेरना. मृत्युपर्व-एक कवि की मौत का जश्न कहानी में विपरीत परिस्थितियों के दुष्चक्र में संघर्ष करते एक रचनाकार की मौत से उपजी विडंबनाओं को धारदार तरीके से खोला गया है.

8 फरवरी 2012: तस्‍वीरों में इंडिया टुडे

इसी तरह की एक सार्थक कहानी है आशिक अली जो वृहत्तर सामाजिक समस्याओं के बीच टिपिकल पात्रों के भीतर सांप्रदायिकता के विद्वेष को पैनेपन से उभारती है. जान-बूझकर सांप्रदायिक ठहरा दिए गए व्यक्ति के वजूद का निर्धारण उसके मनुष्य होने से इतर शक्तियां करती हैं. एक भलामानुस किस कदर सांप्रदायिकता के घेरे में उग्र और हिंसक रूप में लपेटा जाता है, इस सच वृत्तांत को भावनात्मक आधार पर रचा गया है. पारिवारिक जीवन के विघटन की कहानी है हंसी, जिसमें स्त्री-पुरुष की गैरबराबरी और शोषण के नए-नए बारीक औजारों को दर्शाया गया है जहां एक तलाकशुदा मां को समाज में बिखरी चुनौतियों का सामना करने को मजबूर होना पड़ता है.

1 फरवरी 2012: तस्‍वीरों में इंडिया टुडे

तथाकथित सभ्य समाज की आधुनिकता के नकाब को खोलती है साहसिक शीर्षक कहानी लकीर. इसमें शादी के बाद लड़की की हैसियत पूरी तरह से रूपांतरित होती जाती है. संपत्ति से बेदखल करने की चालों, कूटनीतियों का पर्दाफाश करते हुए स्त्री पात्र के द्वंद्व, दुविधा, क्षोभ, उम्मीदों और हताशाओं को यहां प्रभावी ढंग से अंकित किया गया है. अब और नहीं जीवन की सांध्यवेला में एकांतवास के लिए मजबूर कर दिए गए वृद्धपात्र की बेबसी और असहायता की कहानी है. इन दशाओं को जीवन के सरोकारों से जोड़ते हुए उर्मिला पाठक को सामान्य से दिखते जीवन के बीच भावुक मृदुलता तक बड़ी सहजता से खींच ले जाती हैं. उसके बाद पात्रों के जिए गए जीवन के असंख्य दुख, अवसाद और निराशाओं के बावजूद उम्मीद की एक लौ जगाना वे नहीं भूलतीं.

25 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

अग्निरेखा कहानी के जरिए निम्नवर्गीय जीवन को साक्ष्य भाव से देखते हुए शोषण के नए-नए चेहरे चीन्हती रचनाकार जनसंघर्ष के तमाम मुद्दे उठाती हैं. कभी वे लूट की कमाई से उगाहे जाते पैसों पर किसी समाजवेत्ता की तरह खरी-खरी बातें सुनाती हैं तो कभी अनुभव के भीतर घुसपैठ करते हुए यथार्थ के भीतर बसे यथार्थ की परतें खुरेचते हुए पूरी निर्ममता और निस्संगता से मोर्चा जैसी कहानी रच डालती हैं. इसमें कहानी का कारुणिक अंत पाठक को निरंतर अमानवीय होती स्थितियों से रू-ब-रू कराकर स्तब्ध कर डालता है. व्यवस्था में इस्तेमाल होते पात्रों की दारुण कथाएं पढ़ते हुए पाठक सामाजिक हकीकत से जुड़ी घटनाओं और बढ़ते बाजारवाद के हस्तक्षेप से उपजते सांप्रदायिक उन्माद से विचलित होता है. कुल मिलाकर व्यवस्थागत दबावों के द्वंद्व से बेचैन होते, फड़फड़ाते पात्रों की बेबसी को पूरी संवेदना से खोलती हैं ये कहानियां.

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