भारतीय पकवानों को अब भी अमेरिका और कनाडा के बाजार में अपनी जगह बनानी है, लेकिन दोनों देशों के टीवी दर्शकों के बीच भारतीय भोजन पर बात करने वाले खूब कामयाब है. हाल के महीनों में यहां के टीवी पर लोकप्रिय फूड शो में भारतीय चेहरों की मौजूदगी लगातार बढ़ी है.
चेन्नै में जन्मी मशहूर मॉडल और कुकबुक लेखिका, 41 वर्षीया पद्मा लक्ष्मी पिछले आठ सीजन से केबल चैनल ब्रावो पर टॉप शेफ यूएसए की मेजबानी कर रही हैं. इस रियलिटी कार्यक्रम में शेफ या खानसामों के बीच प्रतिस्पर्धा कराई जाती है. यह अमेरिका का सर्वाधिक लोकप्रिय फूड शो है जिसके दर्शकों की संख्या करीब 20 लाख है.
इस साल की शुरुआत में मॉडल-अभिनेत्री, 40 वर्षीया लीसा रे ने इस कार्यक्रम के कनाडाई संस्करण टॉप शेफ कनाडा की मेजबानी की थी. लीसा रे भारतीय मूल की कनाडाई हैं. इसमें कोई शक नहीं कि दोनों मेजबानों का ग्लैमर इन कार्यक्रमों को लोकप्रिय बना रहा है, लेकिन दोनों अपने आपमें भारतीय पकवानों की विशेषज्ञ भी हैं.
पद्मा लक्ष्मी ने दो कुकबुक लिखी हैं; और टोरंटो में रहने वाली लीसा बड़े गर्व से बताती हैं कि दीपा मेहता की फिल्म वाटर में अपनी भूमिका की तैयारी करते वक्त उन्होंने चंडीगढ़ के करीब एक गांव में पराठे और मक्के की रोटी बनाना सीखा था.
टॉप शेफ कार्यक्रम में आम तौर पर मुख्यधारा के जायके पर बात होती है, लेकिन मेजबानों को अपनी निजी पसंद पर बात करने का पर्याप्त मौका मिलता है. लीसा कहती हैं, ''टॉप शेफ कनाडा के मंच का इस्तेमाल मैं भारतीय खाने की अपनी पसंद पर बात करने के लिए करती हूं.'' वे कार्यक्रम में अपनी यादों को दर्शकों के साथ साझ करती हैं, चाहे वे केरल में कोच्चि के प्रॉन (झींगे) से बने पकवानों की याद हो या फिर दिल्ली से धर्मशाला के बीच ढाबों पर मिलने वाले पराठे और राजमा-काले उड़द की दाल की.
अब तो अमेरिका और कनाडा के टेलीविजन पर भारतीय पकवानों पर केंद्रित शो भी आने लगे हैं. मुंबई में जन्मी और लॉस एंजिलिस में रहने वाली 33 वर्षीया आरती सिकेरा ने दो साल पहले द नेक्स्ट फूड नेटवर्क स्टार के सीजन 6 में खिताब हासिल किया, जिसके बाद वे आरती पार्टी नाम के शो की मेजबानी करने लगीं. इसमें वे दर्शकों को अमेरिकी व्यंजनों में भारतीय तड़का लगाने के तरीके बताती हैं.
मसलन, आम और प्याज की चटनी के साथ प्रेट्जेल फ्राइड स्टीक तैयार करते वक्त वे जरूरी सामान में आम की चटनी, पिसा हुआ धनिया, जीरा और कसूरी मेथी गिनाती हैं. वे बताती हैं कि ये सारी चीजें किसी भी भारतीय स्टोर से खरीदी जा सकती हैं.
एक अन्य भारतीय चेहरा है वैंकूवर में रहने वाली बाल आर्नेसन का, जो फूड नेटवर्क के कुकिंग चैनल पर स्पाइस गॉडेस नामक कार्यक्रम पेश करती हैं. भारतीय मसालों और कंद-मूल के इस्तेमाल का तरीका सिखाने वाला यह शो अपने दूसरे सीजन में चल रहा है.
आर्नेसन का बचपन पंजाब के फगवाड़ा के करीब एक गांव में बीता है. उन्होंने दो कुकबुक लिखी हैं और तीसरे पर काम कर रही हैं. वे अपने दर्शकों से आग्रह करती हैं कि वे इटालियन मीटबॉल, मैकरोनी और ची.ज में भारतीय मसालों का प्रयोग करें. वे इलायची की खुशबू वाला क्रीम ब्रूली बनाना भी सिखाती हैं.
उम्र के तीसरे दशक में चल रहीं आर्नेसन कहती हैं, ''जब मैं भारत में बीते अपने बचपन की कहानियां सुनाती हूं, तो खाने के साथ ही इसे जोड़ने की कोशिश करती हूं और लोगों को वास्तव में यह पसंद आता है.'' शो के बीच-बीच में आर्नेसन पंजाबी और हिंदी भी बोल लेती हैं और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए कहती हैं, 'हुआ जाओ, आ जाओ, खा लो.''
अमेरिका के दर्शकों को भी अब भारतीय जायके का स्वाद मिल रहा है. विभिन्न रियलिटी शो में प्रतिभागी के तौर पर भारतीय खानसामों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. मुंबई में जन्मे शेफ फ्लॉयड कार्डोज ने उपमा खिलाकर 2011 में टॉप शेफ मास्टर्स प्रतियोगिता जीत ली थी. न्यूयॉर्क और शिकागो में स्थित रेस्तरां वर्मीलियन के एक्जीक्यूटिव शेफ मनीत चौहान और रेस्तरां मालिक जहांगीर मेहता आयरन शेफ में एक-दूसरे को टक्कर दे चुके हैं.
लेकिन टीवी के परदे पर भारतीय खानसामों की मौजूदगी इन देशों में भारतीय व्यंजनों की लोकप्रियता का पैमाना नहीं है. एकाध मामलों को छोड़ दें तो अब भी बाजार में भारतीय व्यंजनों को अपनी जगह बनानी है. अमेरिका में महंगे भारतीय खानसामों की कमी नहीं, मसलन तुलसी के हेमंत माथुर, जुनून के विकास खन्ना और टैमरिंड ट्रिबेका के अवतार वालिया को इनमें गिना जा सकता है. ये तीनों रेस्तरां मिशेलिन रेटेड हैं और न्यूयॉर्क में ही हैं.
लेकिन जैसा कि माथुर बताते हैं, जब भारतीय पकवानों की बात आती है तो छोटा सोचना पड़ता है. वे बताते हैं कि तुलसी में सिर्फ 70 कवर हैं, (यानी 70 लोगों को ही सर्व किया जा सकता है). कार्डोज की भी यही राय है. वे अमेरिका के सबसे लोकप्रिय रेस्तरां तबला में काम करते थे जो 1998 में खुला था लेकिन उसे 2010 में बंद करना पड़ा.
इसके मालिक डैनी मेयर मानते हैं कि रोज रात में 263 सीटों को भर पाना नामुमकिन था. पचास वर्षीय कार्डोज ने तुलसी में आधुनिक भारतीय व्यंजनों से अमेरिकियों का परिचय करवाया था. आज वे न्यूयॉर्क के नॉर्थ ऐंड ग्रिल में एक्जीक्यूटिव शेफ हैं.
बाजार में भी भारतीय पकवान उतने लोकप्रिय नहीं हुए हैं जितनी लोकप्रियता चीइनीज, मेक्सिकन, थाई या पश्चिम एशिया के व्यंजनों को हासिल है. ये सारे व्यंजन अमेरिका के मॉल्स और एयरपोर्ट में स्थित फूड कोर्ट में आसानी से मिल जाते हैं.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन और फूड स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर कृष्णेंदु रे इसका बड़ा सरल जवाब देते हैं, ''पिज्जा की जगह नान तो नहीं ले पाएगा, कम से कम हमारे जीते जी.'' उनके मुताबिक, यहां के लोगों में भारतीय खाने का चलन बढ़ने के लिए जरूरी है कि कम से कम एक करोड़ लोग अमेरिका आएं और एकाध सौ साल यहां रह जाएं. रे न्यूयॉर्क में मौजूद भारतीय रेस्तरां का समाजशास्त्रीय अध्ययन करते हैं.
उन्होंने एक किताब का भी सह-लेखन किया हैः करीड कल्चर्स-फूड ग्लोबलाइजेशन इन साउथ एशिया. वे मानते हैं कि भारतीय पकवान अमेरिकी पकवानों की सूची में शामिल हो चुके हैं और इसका श्रेय आंशिक तौर पर अमेरिका में रह रहे उन भारतीय खानसामों को जाता है जिन्होंने इसके लिए प्रयास किया है, साथ ही टीवी शो में इनकी मौजूदगी का भी इसमें काफी हाथ रहा है.
बहरहाल, भारतीय खाने के शौकीन लोगों को उम्मीद है कि छोटे परदे पर जो कामयाबी हासिल हुई है, वह जल्द ही अमेरिकी रसोई और रेस्तरां के मेन्यू में खुशबू बिखेरेगी.

