अपने पुत्र राहुल गांधी के साथ नियमित स्वास्थ्य चेकअप के लिए अमेरिका रवाना होने से दो दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नई कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) गठित की. उन्होंने अपनी सांगठनिक और अन्य मामलों में अपनी मदद के लिए एक विशेष समिति बनाई, ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) के लिए सेंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी बनाने के साथ कई नए महासचिवों की तैनाती की और उन्हें अलग-अलग राज्यों का प्रभार दिया. यह बदलाव 23 कांग्रेसी दिग्गजों की तरफ से पार्टी अध्यक्ष को 7 अगस्त को भेजे पत्र के करीब एक महीने बाद किया गया. पत्र में प्रभावशाली नेतृत्व के साथ पार्टी संगठन और ढांचे के अलावा वैचारिक परिवर्तन की मांग भी उठाई गई थी. गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, भूपेंदर सिंह हुड्डा, कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक, शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे नेताओं की तरफ से लिखे गए इस पत्र की 24 अगस्त को हुई सीडब्ल्यूसी की बैठक में गांधी परिवार के वफादार नेताओं ने कड़ी आलोचना की और यहां तक कि राहुल गांधी ने पत्र की टाइमिंग को लेकर भी सवाल उठा दिया. हालांकि पत्र लिखने वाले नेताओं ने कहा कि वे किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है और पार्टी संगठन के भीतर फैसला लेने का मजबूत ढांचा बनाना चाहते हैं. इस ‘बगावत’ के बाद पार्टी के शीर्ष संगठन में किए गए बदलाव बहुत सारे राजनीतिक संदेश देते हैं.
सीडब्ल्यूसी को न, पर सामूहिक नेतृत्व को हां
स्पष्ट किया गया कि सीडब्ल्यूसी का गठन कांग्रेस अध्यक्ष के नामांकित लोगों से ही होगा- पत्र लिखने वालों की ये मांग पार्टी को मंजूर नहीं है कि सीडब्ल्यूसी सदस्यों का चुनाव कराया जाए. लेकिन बागियों की सामूहिक शीर्ष नेतृत्व की मांग को सोनिया की मदद के लिए विशेष समिति बनाकर एक तरह से खत्म कर दिया गया. बागियों में एक मुकुल वासनिक को कमेटी का सदस्य बनाकर सोनिया गांधी ने बागियों का ऊंचा नैतिक आधार खत्म कर दिया. विशेष समिति में गांधी परिवार के तीन वफादार- ए.के. एंटनी, अहमद पटेल और सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी के नजदीकी के.सी. वेणुगोपाल और रणदीप सिंह सुरजेवाला शामिल हैं.
तीन की बड़ी हार
सीडब्ल्यूसी की 24 अगस्त की बैठक में हुए निर्णय के मुताबिक, नए चुनाव प्राधिकरण का गठन बताता है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव होगा- लेकिन इसकी कोई संभावना नहीं है कि गांधी परिवार के बाहर का कोई व्यक्ति इस चुनाव में खड़ा होगा. सीडब्ल्यूसी का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि राहुल गांधी कांग्रेस में शीर्ष पद को अपनी सुविधा के समय पर संभालेंगे. 57 सदस्यीय सीडब्ल्यूसी में कम से कम 20 सदस्य उनके पसंदीदा हैं. अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की मांग करने वाले तीन नेता शशि थरूर, मनीष तिवारी और मिलिंद देवड़ा को नई कमेटी में स्थान नहीं मिला है. कुछ का पद बरकरार है, कुछ को प्रमोशन मिला और कुछ को उपेक्षा- यानी नई कमेटी का गठन कुछ इस तरह किया गया है ताकि 23 बागियों के गुट में दरार पड़ जाए.
कैसी है नई सीडब्ल्यूसी?
तीन साल से कम समय के भीतर दूसरी सीडब्ल्यूसी का गठन किया गया है-पिछली बार फरवरी 2018 में इसका गठन तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने किया था. सीडब्ल्यूसी में तीन तरह के सदस्य होते हैं-23 कोर ग्रुप सदस्य (अभी 22 हैं), 26 स्थायी आमंत्रित और 9 विशेष आमंत्रित सदस्य. कोर ग्रुप लगभग पहले जैसा है-पांच को हटाया गया है और चार नए सदस्य लाए गए हैं. स्थायी आमंत्रित ग्रुप में छह सदस्य हटाए गए हैं (तीन को कोर ग्रुप में भेजा गया है) और 15 नए सदस्य बनाए गए हैं (दो को विशेष आमंत्रित ग्रुप से लाया गया). तीन सदस्य विशेष आमंत्रित ग्रुप से बाहर किए गए हैं (दो को स्थायी आमंत्रित ग्रुप में लाया गया है) जबकि एक को बाहर का रास्ता दिखाया गया है. सीडब्ल्यूसी कोर में जो नए नेता शामिल हुए हैं वे हैं- पी. चिदंबरम, जितेंद्र सिंह और रणदीप सिंह सुरजेवाला. ये सभी पिछली सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित ग्रुप में थे. साथ बिहार से 2018 में कांग्रेस में आने वाले तारिक अनवर को भी कोर ग्रुप में शामिल किया गया है. अनवर ने 1999 में शरद पवार और पी. संगमा के साथ सोनिया गांधी के नेतृत्व का उनके विदेशी मूल के आधार पर विरोध करते हुए कांग्रेस छोड़ दी थी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई थी. अनवर को केरल का प्रभारी बनाया गया है जहां अगले साल चुनाव होने हैं. अनवर को कोर ग्रुप में जगह देकर आजाद को संदेश दिया गया है कि वे अकेले पार्टी के शीर्ष मुस्लिम नेता नहीं हैं.
आजाद का दिलचस्प मामला
दरअसल, आजाद, शर्मा और वासनिक को कोर टीम में बरकरार रखने और एक अन्य पत्र लेखक जितिन प्रसाद को विशेष आमंत्रित से स्थायी आमंत्रित ग्रुप में लाना पूरे बदलाव का सबसे पेचीदा फैसला है. अटकलें थीं कि आजाद की जगह राज्यसभा में कांग्रेस नेता का पद जयराम रमेश के पास चला जाएगा लेकिन सोनिया गांधी के नजदीकी सूत्रों ने इससे इनकार किया और बताया कि कांग्रेस के लिए इसका प्रतीकात्मक महत्व है. एक सीडब्ल्यूसी सदस्य के मुताबिक, “एक मुस्लिम नेता को संसद में महत्व देने का सोनिया गांधी को गर्व है.” दूसरी ओर आजाद से महासचिव पद और हरियाणा के प्रभारी पद का जिम्मा छीन लिया गया है.
प्रसाद दंडित या प्रतिष्ठित?
प्रसाद को पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी दी गई है. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्र इसे दोधारी तलवार मान रहे हैं. प्रसाद को तरक्की देकर उन्हें शिकायत का मौका नहीं दिया गया है जबकि उन्हें गृह राज्य उत्तर प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जहां वे खुद को कांग्रेस पार्टी के ब्राह्मण नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे. यूपी के एक और नेता आर.पी.एन. सिंह ने सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्य और झारखंड प्रभारी की अपनी पोजीशन बरकरार रखी है लेकिन वे महासचिव पद पर तरक्की से वंचित हैं जैसा कि राजस्थान के जितेंद्र सिंह को मिली. प्रसाद, आर.पी.एन. सिंह और जितेंद्र सिंह यूपीए सरकार में मंत्री थे और केवल राहुल गांधी के पसंदीदा जितेंद्र सिंह को महासचिव बनाकर असम का प्रभार दिया गया है जहां अगले साल चुनाव होने हैं. ये तीनों नेता 2014 का चुनाव हार गए थे. आरपीएन को जून में सीडब्ल्यूसी बैठक में यह कहने पर राहुल और प्रियंका के गुस्से का शिकार बनना पड़ा था कि प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करना पार्टी के लिए प्रतिकूल साबित हो रहा है.
प्रियंका और उत्तर प्रदेश
निर्णय लेने में प्रियंका का असर साफ दिख रहा है क्योंकि यूपी से उनके कुछ पसंदीदा नेताओं को स्थान मिला है. अलीगढ़ के पूर्व विधायक विवेक बंसल को न केवल हरियाणा का प्रभारी बनाया गया है बल्कि सीडब्ल्यूसी का स्थायी आमंत्रित सदस्य भी बनाया गया है. रामपुर खास से नौ बार के विधायक प्रमोद तिवारी को भी स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है. इसके अलावा पार्टी ने दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, जयराम रमेश और पवन कुमार बंसल जैसे बुजुर्ग नेताओं को भी जगह दी है. सीडब्ल्यूसी में कर्नाटक के पांच नेताओं को जगह दी गई है जो कि संख्या के लिहाज से यूपी के बाद दूसरे नंबर पर है. साथ ही महाराष्ट्र के 4, केरल के 3, तमिलनाडु के 3 और हरियाणा के 3 नेताओं को सीडब्ल्यूसी में जगह मिली है. दिल्ली के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं. माकन के अलावा पूर्व विधायक देवेंद्र यादव को उत्तराखंड का प्रभारी बनाया गया है जबकि दिल्ली के पूर्व पर्यटन मंत्री मनीष चतरथ को अरुणाचल प्रदेश और हरियाणा का जिम्मा सौंपा गया है. दिल्ली के ही नेता और पत्र लेखकों में शामिल अरविंदर सिंह लवली को सेंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी का सदस्य बनाया गया है. विश्लेषक मानते हैं कि इन लोगों को दिल्ली से बाहर काम पर लगाना पार्टी की राज्य इकाई में गुटबाजी पर काबू करने का एक प्रयास है.
बाहर किए गए दिग्गज
नई सीडब्ल्यूसी से तीन बड़े नेताओं को बाहर किया गया है- मोतीलाल वोरा, लुइजिन्हो फलेरियो और ताम्रध्वज साहू. वोरा को उम्र की वजह से और फलेरियो को पार्टी में उनकी कमजोर पकड़ की वजह से हटाया गया. राहुल गांधी के करीबी साहू को बाहर करने से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल काफी खुश होंगे क्योंकि साहू को उनका प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को हाल में पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था और सचिन पायलट की बगावत के बाद राजस्थान प्रभारी पद से हटाए गए महाराष्ट्र के दिग्गज अविनाश पांडे को नीचे खिसकाते हुए स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है. राजस्थान के नए कांग्रेस प्रभारी और अगस्त में सीडब्ल्यूसी कोर ग्रुप में शामिल किए गए माकन की पोजीशन बरकरार है. इस बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण है राहुल गांधी के पसंदीदा वेणुगोपाल, माकन, सुरजेवाला, राजीव साटव, माणिकराम टैगोर को तरजीह दिया जाना. इनमें भी सबसे ज्यादा फायदे में रहे सुरजेवाला जो कि कांग्रेस के कम्युनिकेश प्रभारी हैं. उन्हें न केवल सीडब्ल्यूसी का कोर सदस्य बनाया गया बल्कि सोनिया गांधी को मदद देने वाली छह सदस्यीय टीम में भी वे शामिल हैं. सुरजेवाला को कर्नाटक जैसे बड़े राज्य का जिम्मा मिला है जो उनके लिए गृहराज्य में भी राहत देने वाली खबर है. उन्हें हरियाणा मे भूपेंदर सिंह हुड्डा जैसे दिग्गज का प्रतिरोध झेलना पड़ता था. इसके अलावा प्रियंका गांधी के पसंदीदा विवेक बंसल को प्रभारी बनाने से भी सुरजेवाला को राहत मिली है क्योंकि उनके बंसल से अच्छे ताल्लुक हैं. साथ ही पत्र लेखकों में शामिल होकर हुड्डा ने गांधी परिवार का विश्वास खो दिया है.
रावत को पंजाब प्रभारी बनाने का मतलब
सांगठनिक फेरबदल के क्रम में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पंजाब की प्रभारी आशा कुमारी के स्थान पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को राज्य का प्रभारी बनाया है. इससे अमरिंदर विरोधी खेमे की बांछें खिल गई हैं. हिमाचल प्रदेश से छह बार की विधायक आशा कुमारी खुद भी तत्कालीन चंबा राजघराने से आती हैं और उनके महाराजा परिवार से तात्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से पारिवारिक रिश्ते हैं. सूत्र बताते हैं कि रावत की तैनाती के बाद अब पंजाब में कैबिनेट और राज्य संगठन में बदलाव जल्द दिख सकता है.
रावत का काम सभी धड़ों से बातचीत करना और राज्य को 2022 के चुनाव से पहले एक इकाई के रूप में एकजुट करना है. लेकिन अमरिंदर सिंह और राज्यसभा सांसद प्रताप बाजवा का हाथ मिलवाने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी होगी. अमरिंदर सिंह के बाद बाजवा ही राज्य के सबसे बड़े कांग्रेस नेता हैं और माझा क्षेत्र में उनका खासा दबदबा है. अमरिंदर सिंह ने बाजवा से बातचीत की संभावनाएं पहले ही खत्म कर चुके हैं क्योंकि वे उनकी सार्वजनिक रूप से खिल्ली उड़ाने का कोई मौका नहीं चूकते. बदले में बाजवा भी खुद को मुख्यमंत्री पद का अगला दावेदार मानते हैं और अमरिंदर सिंह व उनके वफादारों की आलोचना का अवसर नहीं गंवाते हैं.
इसके अलावा भी रावत के सामने चुनौतियां हैं जैसे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह ढुल्लो, क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिद्धू, लुधियाना के सांसद रवनीत बिट्टू, पूर्व युवा कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग- ये सभी मुख्यमंत्री से खफा चल रहे हैं. इनकी शिकायतों में एक ये भी है कि इनके आदमियों को सरकार में जगह नहीं दी गई. पंजाब में आम आदमी पार्टी नेताओं की तलाश में है, सुखबीर बादल के नेतृत्व वाला अकाली दल भी नई पीढ़ी के नेताओं को संगठन में लाना चाहता है और भाजपा भी दमदार जाट-सिख नेता की तलाश में है. ये सभी कांग्रेस के बिखरने का इंतजार कर रहे हैं ताकि 2022 में वे अपने लिए बेहतर चेहरे चुन सकें. इसलिए रावत का काम और भी कठिन है और इसके लिए बदलाव की जरूरत होगी.
अनुवादः मनीष दीक्षित
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