संसद के मानसून सत्र के लिए एजेंडा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नहीं, सोनिया गांधी ने घोषित किया. यूपीए-दो की दूसरी वर्षगांठ के मौके पर रात्रिभोज में सोनिया ने ऐलान किया कि सरकार अगले सत्र में भूमि अधिग्रहण और खाद्य सुरक्षा विधेयक पटल पर रखेगी.
मनमोहन सिंह इस पर महज मुस्कुराए लेकिन उन्होंने भोज का मजा किरकिरा नहीं किया, शायद यह सोचकर कि ये विधेयक पेश तो किए जाएंगे लेकिन ठीक वैसे नहीं होंगे जैसे तैयार करने का 'क्म सोनिया ने दिया था.
खाद्य सुरक्षा विधेयक पर सरकार और सोनिया की अगुआई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के बीच पिछले दो साल से बहस-मुबाहिसा चल रहा है. पेंच फंसा है गरीबी के आंकड़ों पर, एनएसी गरीबरेखा से नीचे के परिवारों (बीपीएल) के अलावा गरीबों का दायरा बढ़ाना चाहती है.
सरकार ने इसे मान तो लिया है लेकिन अभी वह तय नहीं कर पाई है कि इन गरीबों को अनाज किस कीमत पर दिया जाए.
दूसरे कई मुद्दों पर भी एनएसी की सरकार से ठनी है. मसलन, एनएसी की इस आपत्ति के बावजूद कि पोस्को की परियोजना वनाधिकार कानून का उल्लंघन करती है हाल ही में उसे हरी झंडी दिखा दी गई. एनएसी के सदस्य एनोसी. सक्सेना ने पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को 3 अगस्त, 2010 को लिखकर बताया था कि परियोजना क्या-क्या उल्लंघन करती है.
पोस्को का विरोध करने वाले कहते हैं कि उसे 'पीएमओ के दबाव' में मंजूरी दी गई. सोनिया के पसंदीदा नीति-निर्माण क्लब के विचारों से जबानी रजामंदी दिखाने के बाद सरकार ने परियोजना को मंजूरी दे दी.
एनएसी के सदस्य ज्यां द्रेज कहते हैं, ''हकीकत यह है कि एनएसी की कई सिफारिशें या तो नजरअंदाज कर दी गईं, नामंजूर कर दी गईं, भोथरी कर दी गईं या हद से हद आंशिक तौर पर मानी गईं. मुझे नहीं लगता कि एनएसी के 'सुपर कैबिनेट' के तौर पर विशेषण को गंभीरता से लेने की जरूरत है. यह किसी कार्टूनिस्ट के लिए अच्छा मसाला हो सकता है लेकिन इसका हकीकत से जरा भी संबंध नहीं है.''
पिछले हफ्ते योजना आयोग के गरीबी के आंकड़ों के विरुद्ध एनएसी के तीन सदस्यों-द्रेज, अरुणा रॉय और हर्ष मंदर का प्रदर्शन दिखाता है कि विशेषाधिकार प्राप्त एनएसी के सदस्यों को भी अपनी मागों के लिए आम आदमी की तरह सड़क पर उतरना पड़ता है.
खाद्यान्न के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नरों के मुख्य सलाहकार बिरज पटनायक हताशा से कहते हैं, ''सरकार और एनएसी में साफ तौर पर मतभेद हैं. यदि ऐसा ही चलता रहा तो सुप्रीम कोर्ट पहल को अपने हाथ में ले लेगा और तब सरकार का बनाया कोई भी मसौदा बेकार हो जाएगा.''
एक और मिसाल सोनिया का पसंदीदा महिला आरक्षण विधेयक है जो इसे पारित करने के लिए सरकार से उनकी कई मिन्नतों के बावजूद अभी भी लटका पड़ा है. सरकार का दावा है कि लोकसभा में उसके पास पर्याप्त सदस्य-बल नहीं है. लेकिन मनमोहन सिंह के प्रिय परमाणु विधेयक के मामले की तरह इसे भी पारित कराने के लिए कोई सर्वानुमति बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई.
इससे तकलीफ जरूर होती होगी खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि जब परमाणु विधेयक को संसद से पारित कराने की बारी आई तो सोनिया ने मनमोहन को भरपूर समर्थन दिया था. सोनिया ने मनमोहन के पाकिस्तान के साथ शांति बहाल करने के एकसूत्रीय एजेंडे, जिसके कारण शर्म-अल-शेख जैसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, को लेकर उनके मंत्रिमंडल के कुछ सहयोगियों की आलोचना को खामोश कर दिया था और प्रधानमंत्री के अमेरिकी एजेंडा की आलोचनाओं को भी जबकि कांग्रेस के परंपरागत वफादार सुदूर उत्तर और अरब देशों के साथ रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के एक सांसद कहते हैं, ''भारत-अरब दोस्ती के इतिहास से कांग्रेस को लाभ मिलता है लेकिन यह प्रधानमंत्री के एजेंडे में नहीं है.''
मनमोहन सिंह ने बड़े मुद्दों पर सोनिया की अनदेखी नहीं की है, मसलन, मंत्रिमंडल का विस्तार. लेकिन कई ऐसे मसले हैं जिन पर वे मना कर देते हैं, विधेयकों के मसौदे उनमें से एक है. ज्यादातर मामलों में सोनिया की सिफारिशें सुनी तो जाती हैं लेकिन उन पर पूरी तरह अमल नहीं किया जाता. एनएसी ने घरेलू हिंसा विधेयक, सूचना का अधिकार और यहां तक कि मनरेगा में कमियों पर खूब शोर मचाया था.
कांग्रेस के एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं, ''कांग्रेस ने अपना चुनाव जिताऊ अभियान मनरेगा के इर्दगिर्द बुना था. लेकिन ऐसी शिकायतें थीं कि विधेयक में खामियों की वजह से मनरेगा पर पूरी तरह अमल नहीं किया जा सका.'' इससे रायसीना हिल इन अफवाहों से सरगर्म हो गई कि मनमोहन को अधिक आज्ञाकारी ए.के. एंटनी से बदला जा सकता है. लेकिन कैबिनेट के एक सूत्र ने कहा कि अगर कोई ''परिवर्तन होगा तो वह रा'ल गांधी के पक्ष में ही होगा.''
विवाद का ताजा मसला भूमि अधिग्रहण विधेयक है. 25 मई को अपनी सात घंटे की बैठक के बाद एनएसी ने इसके मसौदे में कई बदलाव सुझाए, इनमें सबसे विवादास्पद सुझाव यह है कि यदि किसी परियोजना से 400 से ज्यादा घर बेदखल होते हैं तो उसके लिए जमीन लेने का काम निजी कंपनियां खुद करें.
सरकारी सूत्र कहते हैं कि यह ऐसा सुझाव है जिसे मामना मनमोहन सिंह के लिए मुश्किल होगा. यूपीए की अहम सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने यूपीए-एक के बनाए 2007 के विधेयक पर आपत्ति जताई थी जिसमें कहा गया था कि यदि निजी कंपनी ने 70 फीसदी जमीन अधिग्रहित कर ली हो तो सरकार को 30 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण करना चाहिए. तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद कहते हैं, ''ममता मजाक में कहती हैं, हालांकि वे भी सरकार की मुखिया हैं लेकिन फिर भी वे ऐसे अधिकार नहीं चाहतीं.''
एनएसी भी सरकार के शुरुआती प्रस्ताव की आलोचक रही है जिसमें जमीन की कीमतों में बढ़ोतरी पर ध्यान नहीं दिया गया. सक्सेना कहते हैं, ''पुनः बिक्री के मामले में जब-जब कीमत बढ़े, किसानों को उसके अंतर का 25 फीसदी भुगतान किया जाना चाहिए.''
एनएसी के सुझावों का तिया-पांचा होने पर द्रेज कहते हैं, ''एनएसी के लिए ज्यादा अधिकार मांगने के पक्ष में नहीं हूं. यह एक सलाहकार संस्था है जिसकी सिफारिशें मानी जा सकती हैं या नहीं मानी जा सकतीं.'' सक्सेना कहते हैं, '' हमने परियोजना की 1 या 2 प्रतिशत लागत किसानों को देने की सिफारिश की है. यदि सरकार उन्हें कुछ नहीं देना चाहती तो यह फैसला सरकार को करना है.''
ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख कहते हैं कि पुनर्वास और पुनःबसाहट विधेयक को भूमि अधिग्रहण विधेयक के साथ जोड़ने की एनएसी की सिफारिश से समस्या खड़ी हो सकती है. वे कहते हैं, ''पहला विधेयक राष्ट्रीय आपदाओं से पीड़ित लोगों के लिए भी है.''
साफ है कि सोनिया को एक और मामले में 'नहीं' कहा जाने वाला है. प्रधानमंत्री के मामले में वे जो कहते हैं वह महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि वे जो नहीं कहते, वह होता है. यह वह संदेश है जो 10 जनपथ को सात साल के रिश्ते के बाद आखिरकार समझ में आया है.
-साथ में शफी रहमान
तुर्शी-ब-तुर्शी
भूमि अधिग्रहण बिल
सोनिया कहती हैं: जहां 400 परिवार बेदखल हों वहां सरकार 100 फीसदी जमीन अधिग्रहित करे. राहत और पुनर्वास विधेयक को भूमि अधिग्रहण विधेयक के साथ जोड़ा जाए.
मनमोहन का रुखः ममता भूमि अधिग्रहण में सरकारी भूमिका की विरोधी हैं. दोनों विधेयकों को जोड़ना कठिन, राहत-पुनर्वास विधेयक प्राकृतिक आपदाओं से बेदखल लोगों के लिए भी.
यूनिक आइडेंटिफिकेशन (यूआइडी)
सोनियाः एनएसी के कुछ सदस्यों की आपत्ति कि यह निजी स्वतंत्रता का हनन. वे कहते हैं, यह सामाजिक पहल नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना है.
मनमोहनः यूआइडी को अनाज सुरक्षा तथा मनरेगा के जॉब कार्डों से जोड़ना चाहते हैं.
पोस्को
सोनियाः परियोजना वनाधिकार कानून का उल्लंघन है; ओडीसा का पुनर्वास पैकेज कमजोर. है.
मनमोहनः पोस्को को सशर्त मंजूरी, ओडीसा से वनाधिकार कानून से तालमेल को कहा गया है.
अनाज सुरक्षा
सोनियाः एनएसी चाहती है बीपीएल परिवारों को 3 रु. किग्रा दर से 35 किग्रा गें/चावल और एपीएल परिवारों को पीडीएस के तहत 20 किग्रा गें/चावल दिया जाए.
मनमोहनः शुरू में एपीएल परिवारों को शामिल करने से मना किया. अब राजी हो गए हैं लेकिन नियंत्रित अमल चाहते हैं. कीमत और वितरण के लिए अनाज की मात्रा तय होनी बाकी है.
महिला आरक्षण विधेयक
सोनियाः संसद में महिलाओं की 33 फीसदी से कम नुमाइंदगी से खुश नहीं.
मनमोहनः सरकार कहती है कि वह सपा, राजद जैसे सहयोगियों को नाराज नहीं कर सकती.
कर छूट
सोनियाः कश्मीरी विस्थापितों की टैक्स छूट की मांग का समर्थन करते हुए सरकार को लिख चुकी हैं.
मनमोहनः आयकर नियमों में व्यक्तियों के समूह को छूट देने का कोई प्रावधान नहीं.

