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पटौदी परिवार में अरबों की जायदाद पर जंग

पटौदी परिवार में लगभग 4,000 एकड़ जमीन को लेकर जंग छिड़ी है. इस जमीन की अनुमानित कीमत 4,500 करोड़ रु. है.

विवादित मकान
विवादित मकान
अपडेटेड 10 जनवरी , 2012

अपने शौहर नवाब मंसूर अली खान पटौदी की मौत के बाद शर्मिला टैगोर जब पहली बार भोपाल आईं तो नीयत थी पुश्तैनी संपत्ति को लेकर जारी विवाद को निबटाने की.

4 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

नवाब पटौदी भोपाल और आसपास के इलाकों में जो संपत्ति छोड़कर गये हैं उस पर मालिकाना हक के लिये उनकी पत्नी और दोनों बहनों-सालेहा और सबीहा-ने दावा तेज कर दिया है, इसके साथ ही विवाद का हल निकालने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

एक अनुमान के मुताबिक पटौदी की पुश्तैनी जायदाद लगभग 4,000 एकड़ है जिसकी बाजार में कीमत करीब 4,500 करोड़ रु. है. यही संपत्ति पटौदी और उनकी बहनों के बीच टकराव का कारण है.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

दिसंबर महीने में भोपाल आईं टैगोर ने मामले को सुलझने के लिये जिस फ्लैग स्टाफ हाउस में डेरा डाला, संपत्ति विवाद की शुरुआत वहीं से हुई. फ्लैग स्टाफ हाउस नवाब पटौदी के कब्जे में था. पटौदी के पास 1998 तक भोपाल में 23 संपत्ति थी, जिनमें फ्लैग हाउस, अहमदाबाद पैलेस, नूरु-उस-सबा प्रमुख थे.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

लेकिन पटौदी ने इन सभी को बेच दिया और 2002 तक उनके पास सिर्फ फ्लैग हाउस रह गया. उसी साल उन्होंने चिट्ठी लिखकर अपनी बहन सबीहा सुल्तान को कहा कि वे भोपाल आने पर फ्लैग स्टाफ हाउस में न रुकें क्योंकि भोपाल में खुद पटौदी के रुकने के लिए एकमात्र यही जगह रह गई है.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

 

विवाद की जड़ यही चिट्ठी थी, जिसके बाद उनकी बहनों ने फ्लैग स्टाफ हाउस में हिस्सा मांगना शुरू कर दिया. मामला 2003 में अदालत तक पहुंच गया. फास्ट ट्रैक अदालत में बहनों से हारने के बाद पटौदी ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

परिवार में कलह इस कदर बढ़ गई कि पटौदी के भानजे फैज़ बिन जंग ने जोर-जबरदस्ती फ्लैग स्टाफ हाउस में डेरा डाल लिया. यह जगह भोपाल के बेहद प्रतिष्ठित कोहेफि.जा इलाके में सात एकड़ क्षेत्र में फैली है. बाजार में इसकी मौजूदा कीमत सौ करोड़ रु. से भी ज्‍यादा बताई जाती है. अंग्रेजी शासनकाल में यह अधिकारियों का गेस्ट हाउस हुआ करता था.

भोपाल, रायसेन, सीहोर, चिकलोद सहित अन्य जगहों पर भी नवाब परिवार की संपत्ति हैं, जिन पर अदालत में इतने सारे मामले चल रहे हैं कि खुद पटौदी परिवार को भी उन सबकी जानकारी नहीं है.

अरबों रुपयों की संपत्ति को लेकर परिवार आपस में तो झ्गड़ ही रहा है, सरकार और आम लोगों के साथ परिवार की कानूनी लड़ाई भी चल रही है. इन सभी मामलों को पटौदी परिवार के अधिवक्ता जगदीश छवानी सूचीबद्घ करने में जुटे हैं.

कलेक्ट्रेट में एक मामला प्रशासन और नवाब खानदान के बीच आठ गांवों की 2,000 हेक्टेयर जमीन को लेकर चल रहा है, जिसकी कीमत 3,000 करोड़ रु. से भी ज्‍यादा आंकी जा रही है. मर्जर एग्रीमेंट के तहत यह जमीन शासन को मिलनी थी लेकिन नवाब खानदान के पास चली गई. इसमें से ज्‍यादातर जमीन पर या तो अतिक्रमण है या बेची जा चुकी है.

जिला प्रशासन के सूत्र बताते हैं कि भोपाल के हलालपुरा, निशातपुरा और बेहटा क्षेत्र में भी पटौदी परिवार की लगभग 1,200 एकड़ जमीन है, इस पर भी प्रशासन के साथ विवाद चल रहा है. इसके अलावा शहर के शाहपुरा और कोटरा में परिवार की 1,150 एकड़ जमीन पर भी विवाद है.नवाब पटौदी की संपत्ति की सूची और भी लंबी है.

इसमें कई मस्जिदें, इमारतें, रायसेन में प्रसिद्ध सूफी संत बाबा पीर फतेहउल्लाह की दरगाह, संस्थाएं, कई कब्रिस्तान और सऊदी अरब में भोपाल के हज यात्रियों के ठहरने के लिए रुबात (धर्मशाला) भी शामिल हैं. अरबों रुपये की यह संपत्ति शाही औकाफ ट्रस्ट के तहत आती हैं.

भाई और बहनों के बीच कलह की वजह बने इस संपत्ति विवाद को टैगोर आपसी बातचीत के जरिए सुलझना चाहती हैं. हालांकि संपत्ति को लेकर दोनों पक्षों की ओर से पहले ही अदालत में मामले विचाराधीन हैं.

अपने भोपाल प्रवास के दौरान टैगोर ने कहा, ''कोर्ट में समय और पैसा बर्बाद करने का कोई फायदा नहीं है. इसे हम आपसी बातचीत से सुलझने की कोशिश करेंगे.''

इस मौके पर उन्होंने सालेहा और सबीहा के शौहर अरजूमन खान सहित कुछ अन्य रिश्तेदारों के साथ संपत्ति के बंटवारे को लेकर बातचीत भी की. बातचीत का एक दौर हैदराबाद में हो चुका है. अगली बैठक 10 जनवरी को फिर से भोपाल में होगी. मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष गुफराने आजम कहते हैं कि नवाब पटौदी भी संपत्ति विवाद को सलाह-मशविरे से निपटाना चाहते थे.

नवाब पटौदी की मौत के बाद उनकी बेटी सबा को शाही औकाफ ट्रस्ट का मुतवल्ली (संरक्षक) बनाया गया. पटौदी अपने जीवनकाल में ही उन्हें नायब मुतवल्ली (उप संरक्षक) बना चुके थे. यह आरोप भी लगाया जाता है कि इस फैसले के पीछे उनका मकसद शाही संपत्ति को अपने परिवार के कब्जे में रखना था.

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