लड़ाई में चोट खाए मराठा सरदार ने ऐसे समय में वार करने की रणनीति बनाई जब यूपीए सबसे नाजुक दौर में है. 19 जुलाई की शाम को नाराज शरद पवार की हाइप्रोफाइल झल्लाहट से रायसीना की पहाड़ी पर बने सत्ता के शिखर केंद्रों की तपिश और बढ़ गई. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने दिल्ली में यूपीए सरकार और महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से अपने मंत्रियों को हटाने की धमकी थी.
पार्टी का दावा था कि 'अहंकारी कांग्रेस' उसे अपमानित कर रही है. पार्टी ने कहा कि वह सम्मान चाहती है. इसके 48 घंटे भी नहीं हुए थे कि एक और नाराज सहयोगी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की कि तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेगी. उन्होंने चेतावनी दी, ''दिल्ली में हम तब तक गठबंधन का हिस्सा बने रहेंगे, जब तक हमें सम्मान मिलता रहेगा, लेकिन पश्चिम बंगाल में हम अकेले ही चुनाव लड़ेंगे.''
समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने 22 जुलाई को पीएमओ को एक पत्र भेजकर प्रधानमंत्री से 'अनुरोध' किया कि ''किसी भी तरह से खुदरा कारोबार को एफडीआइ के लिए न खोला जाए.'' इस पत्र पर माकपा के मुखिया प्रकाश कारात, भाकपा नेता सुधाकर रेड्डी और जनता दल (एस) के नेता दानिश अली के भी हस्ताक्षर थे. मुलायम के 22 सांसदों को हमेशा बनर्जी के सांसदों के विकल्प की तरह देखने वाली कांग्रेस को इससे करारा झटका लगा.
वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनंद शर्मा की बनावटी हंसी गायब हो गई, जो टीवी कैमरों पर यह बयान देते फिर रहे थे कि खुदरा कारोबार में एफडीआइ पर 'जोरदार सहमति' है. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कांग्रेस के प्रभावी संकट प्रबंधन के बाद उसमें जो थोड़ा आत्मविश्वास लौटा था, वह अचानक पस्त पड़ता दिख रहा है. सहयोगी दल जिस सरकार का हिस्सा हैं उसी की राह में कांटे बिछाने के अपने पुराने खेल में फिर से लग गए हैं और जिन खूटियों पर यूपीए का बहुमत निर्भर रहा है, वे फिर से गायब होती दिख रही हैं. पवार का विद्रोह तो सबसे अप्रत्याशित था. उनका स्वभाव अस्थिरता वाला नहीं है.
दिल्ली में उनके 9 सांसद शायद उतने महत्वपूर्ण न हों, लेकिन देश के सबसे धनी राज्यों में से एक महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में उनके विधायकों की महत्वपूर्ण भूमिका है. वे कांग्रेस-एनसीपी के टकरावों और तनावों से परिपक्वता से निबटते रहे हैं. यहां तक कि लवासा प्रोजेक्ट उनके करीबी सहयोगी के कारोबारी हित पर जब चोट पहुंची, तब भी वे जान-बूझकर खामोशी साधे रहे.
अन्य सहयोगी दल जहां कोई-न-कोई मांग खड़ी कर देते, पवार ने सरकार को समर्थन जारी रखा-न्यूक्लियर डील से लेकर खुदरा व्यापार में एफडीआइ तक और यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए शिवसेना का समर्थन जुटाने तक. शायद इसीलिए कांग्रेस ने यह मान लिया था कि उनका समर्थन तो मिलता ही रहेगा. आखिरकार इस बार भी वही हुआ, जब कि दरअसल वे कांग्रेस से काफी त्रस्त हो चुके हैं.
एक चतुर नेता होने के नाते पवार हर दांव सोच-समझकर चलते हैं. उन्होंने विद्रोह करने का समय तब चुना जब कांग्रेस के संकटमोचन प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए.
मुखर्जी के बाद पवार ही मंत्रिमंडल में सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं. फिर भी, मनमोहन सिंह ने मुखर्जी की जगह नंबर 2 की कुर्सी पर रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी को बैठाना पसंद किया. महाराष्ट्र के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके पवार इससे आहत जरूर हुए, लेकिन उन्होंने अपनी शिकायतों का मुख्य मसला इसे नहीं बनाया. इसकी जगह उन्होंने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस और सहयोगी दलों के बीच बेहतर समन्वय कायम करने की मांग की.
24 जुलाई को कांग्रेस की ओर से जो मरहम-पट्टी हुई है, वह बस एक वादा भर है न कि मसलों का पूरा हल. मनमोहन, सोनिया, पवार और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के बीच 7 रेस कोर्स रोड पर करीब एक घंटे तक चली बैठक में यह तय हुआ कि यूपीए सरकार ''सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाने के लिए जल्दी ही एक प्रभावी तंत्र का निर्माण करेगी.''
पटेल के मुताबिक इस समिति की अध्यक्षता सोनिया गांधी करेंगी और नीतिगत और दूसरे मसलों पर चर्चा करने के लिए इसकी महीने में एक बार बैठक होगी. एनसीपी को यह भी भरोसा दिलाया गया है कि महाराष्ट्र में बनी समन्वय समिति की बैठक लगातार की जाएगी. इसकी पिछले तीन साल से कोई बैठक नहीं हुई है.
पवार की राजनीति में एक पैटर्न देखने को मिलता है. इंदिरा गांधी की 1977 में अपमानजनक हार के बाद वे 1978 में कांग्रेस से टूटकर अलग हो गए. 1986 में फिर कांग्रेस में लौट आए. इसके बाद जून, 1999 में उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस छोड़ दी और एनसीपी का गठन किया. यह 1999 के आम चुनावों से सिर्फ तीन माह पहले की बात है, जब सोनिया गांधी पार्टी पर मुश्किल से ही पकड़ बना पाई थीं.
पवार ने कांग्रेस को तोड़ने के लिए सोनिया गांधी के विदेशी मूल को कारण बनाया. उन्हें उम्मीद थी कि त्रिशंकु लोकसभा होने की स्थिति में वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभर सकते हैं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अक्तूबर माह में एनडीए गठबंधन सत्ता में वापस आ गया. अब जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अगले कुछ महीनों में मंत्रिमंडल में शामिल होने का संकव्त दिया है, सोनिया अपने इस अनिच्छुक बेटे की आसान लैंडिंग सुनिश्चित करना चाहती हैं. इसके लिए वे चाहती हैं कि राहुल की सहयोगी दलों में स्वीकार्यता हो.
एनसीपी के एक सांसद ने कहा, ''राहुल को अगर मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता है तो पवार को कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन राहुल प्रधानमंत्री हों तो उनकी कैबिनेट का पवार हिस्सा रहेंगे या नहीं, यह अलग मामला है.'' उनका तो यहां तक कहना है कि मुखर्जी ने भी एक बार कहा था कि वे राहुल की कैबिनेट में नहीं शामिल होंगे.
पवार कभी भी 10 जनपथ की पसंद नहीं रहे हैं. सोनिया यह भूल नहीं पाई हैं कि पवार ने उनके विदेशी मूल को आधार बनाकर कांग्रेस को तोड़ दिया था. जब वे 20 जुलाई को पवार से मिलीं तो संभवतः यूपीए-2 के शासन में पवार दूसरी बार ही 10 जनपथ गए थे. आम तौर पर पटेल एनसीपी का दूत बनकर 10 जनपथ जाते रहे हैं, जबकि पवार प्रधानमंत्री से मिलते रहते हैं. एनसीपी सांसद ने कहा, ''कांग्रेस के दो नेता ऐसे हैं जिनसे पवार को ना कहने में मुश्किल होती है. वे हैं प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह.''
मुखर्जी ने जब से नंबर दो की जगह खाली की, पवार चुप्पी ही बनाए हुए थे. एनसीपी प्रमुख को उम्मीद थी कि उन्हें मनमोहन सिंह के बगल वाली कुर्सी मिलेगी. लेकिन 12 जुलाई को हुई कैबिनेट की बैठक में यह सम्मान एंटनी को दिया गया. एंटनी कभी पवार के मातहत थे, जब दोनों कांग्रेस (एस) में हुआ करते थे. कांग्रेस का कहना है कि उसके लिए नंबर दो की जगह किसी सहयोगी दल को देना मुश्किल है.
एनसीपी ने अपनी नाराजगी को छुपाया नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री को यह समझने में 7 दिन लग गए कि कुछ गंभीर गलती हुई है. 19 जुलाई की शाम को उनके सहयोगियों ने बताया कि एनसीपी के दोनों मंत्रियों-पवार और पटेल-ने दिल्ली में होने के बावजूद कैबिनेट की बैठक में आने की हामी नहीं भरी है. मनमोहन ने कैबिनेट सचिव को अन्य मंत्रियों को यह बताने को कहा कि वे बैठक में देर से आएंगे और उन्होंने फोन पर पवार से बात की.
बाद में उसी शाम पवार 7 रेस कोर्स गए और उन्होंने मनमोहन सिंह को एक पत्र सौंपा. इसमें उन्होंने बस यही लिखा कि एनसीपी एक छोटी पार्टी है, इसलिए उसे यूपीए में ज्यादा कद या सम्मान नहीं दिया जा रहा है. इसलिए वे अब अपना समय पार्टी के काम में लगाना चाहेंगे. एक एनसीपी नेता ने कहा, ''यह कैबिनेट से इस्तीफा देने की पेशकश थी.''
अगली सुबह पवार सोनिया से मिले. उन्होंने उनसे कहा कि कांग्रेस एक समावेशी सरकार नहीं चला रही. उन्होंने एनडीए का उदाहरण दिया जिसमें एक अध्यक्ष के साथ ही एक संयोजक भी नियुक्त किया गया था. भाजपा नेता (लालकृष्ण आडवाणी) एनडीए के चेयरमैन थे, तो सहयोगी दल के एक नेता (पहले जार्ज फर्नांडिस और फिर शरद यादव) उसके संयोजक. पवार ने यह भी मसला उठाया कि यूपीए-1 से वाम दलों के बाहर होने के बाद से ही कोई समन्वय समिति नहीं बनाई गई है. एनसीपी के सूत्रों ने बताया, ''सोनिया ने उनकी बात धैर्यपूर्वक सुनी और कहा कि वे स्थिति को ठीक करने का प्रयास करेंगी. उन्होंने यह भी कहा कि विचारों में मतभेद से सरकार कमजोर ही होगी.''
कांग्रेस की प्रतिक्रिया का इंतजार करने के दौरान ही एनसीपी ने कुछ सहयोगी दलों की मदद से अपना पलड़ा भारी कर लिया. 21-22 जुलाई को ममता बनर्जी ने कोलकाता से पवार को फोन किया, जबकि पटेल मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती उद्धव ठाकरे को देखने गए. उद्धव और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे के बीच सुलह की भी चर्चा होने लगी.
इससे कांग्रेस विरोधी ताकतें और मजबूत ही होंगी. डीएमके नेता टी.आर. बालू ने 23 जुलाई को दिल्ली के 8 जनपथ स्थित पवार के आवास पर उनसे बहु प्रचारित मुलाकात की. एनसीपी के सांसद डी.पी. त्रिपाठी कहते हैं, ''हम नंबर 2 की राजनीति नहीं करते हैं. हम केवल नंबर एक में यकीन रखते हैं.''
पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील की विदाई के लिए संसद में 23 जुलाई को आयोजित चाय पार्टी में जब सोनिया पटेल से मिलीं तो उन्होंने उनकी खुशामद करते हुए कहा, ''प्रफुल्ल कुछ करो.'' उनके बगल में बैठी भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने यह सुनकर हंसते हुए कहा, ''प्रफुल्ल कुछ मत करो.'' इस हंसी-मजाक में माकपा नेता सीताराम येचुरी भी शामिल हो गए और उन्होंने कहा, ''प्रफुल्ल खुश करो.'' पटेल ने इनके जवाब में तल्ख लहजे में कहा, ''पहले आप सब डिसाइड (तय) करो.''
पवार राजनीति के मैराथन रनर हैं. वे अगले आम चुनाव के लिए चालें चल रहे हैं. 1991 में जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री बन गए थे तो चंद्रशेखर ने निराश पवार से कहा था कि मराठों ने कभी भी दिल्ली पर शासन नहीं किया है. पवार इसे गलत साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. वे उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वे गैर-कांग्रेस, गैर-बीजेपी गठबंधन के प्रमुख नेता बन सकते हैं जो अन्य दलों के बाहर से सहयोग या बिना उनके सहयोग के ही एक राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जुटा लेगा.
हालांकि, एनसीपी ने विद्रोह के लिए दिखाने का मजमून संख्या को नहीं बल्कि सरकार की गुणवत्ता को बनाया है. पटेल कहते हैं, ''केंद्र सरकार हमारी उम्मीदों के मुताबिक काम नहीं कर रही और हमारी बातों पर गौर नहीं किया जा रहा. महाराष्ट्र सरकार के मामले में भी यही सच है. सहयोगी दलों के साथ इस कुप्रबंधन से कांग्रेस एक और बड़े राज्य में हार का सामना कर सकती है. वह आंध्र प्रदेश को जगन मोहन रेड्डी के हाथों में एक तरह से सौंप ही चुकी है.
महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण एनसीपी के लिए रोज नई मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. उन्होंने अपने मुख्यमंत्री बनने से पहले ही मंत्रियों के विभागों का बंटवारा तय हो जाने पर सार्वजनिक तौर पर खीज जाहिर की थी. राज्य के ज्यादातर कद्दावर मंत्रालय जैसे गृह, वित्त, ऊर्जा, जल संसाधन, ग्रामीण विकास, लोक निर्माण और जनजातीय विकास, एनसीपी के पास हैं.
नवंबर, 2010 में कार्यभार ग्रहण करने के कुछ समय बाद ही उन्होंने कहा था कि कांग्रेस इस गठबंधन सरकार की बड़ी पार्टी है, इसलिए उसे वित्त और गृह मंत्रालय मिलना चाहिए. अक्तूबर, 2011 में उन्होंने पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के लिए लवासा सिटी पर आपराधिक मामला दर्ज करने को हरी झंडी दिखा दी. पुणे के पास एक पहाड़ी पर बना यह शहर पवार की ही संकल्पना है. फिलहाल यह मामला पुणे के सेशन कोर्ट में लंबित है.
सत्ता पर पकड़ रखने के लिए एनसीपी की अपनी वजहें हैं. पिछले साल मई में रिजर्व बैंक ने महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव (एमएससी) बैंक के निदेशक मंडल को भंग कर दिया. इस बैंक पर पिछले 17 साल से शरद पवार के भतीजे और राज्य के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार का नियंत्रण रहा है.
चव्हाण ने तत्काल ही बैंक चलाने के लिए भंग बोर्ड की जगह अपने चुनिंदा प्रशासकों की नियुक्ति कर दी. एमएससी बैंक जिले के अन्य बैंकों को फंड देता है ताकि वे किसानों को कर्ज दे सकें. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा किए गए एक जांच से खुलासा हुआ कि इन बैंकों द्वारा ज्यादातर कर्ज ऐसी सहकारी चीनी मिलों और कताई मिलों को दिया गया जिन पर एनसीपी नेताओं का सीधा नियंत्रण है. एमएससी बैंक पर से नियंत्रण खोने से एनसीपी को मुश्किल आ सकती है क्योंकि उसके पास अपने मुख्य आधार पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादक किसानों को कर्ज दिलाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाएगा.
एनसीपी को भड़काने के लिए आखिरी बात चव्हाण की 4 मई को की गई यह घोषणा साबित हुई कि वे पिछले 10 साल में राज्य द्वारा सिंचाई क्षेत्र में किए गए खर्चों पर एक श्वेतपत्र प्रकाशित करेंगे. मार्च में जारी राज्य के वार्षिक आर्थिक सर्वे के मुताबिक पिछले 10 साल में राज्य सरकारों द्वारा 70,000 करोड़ रु. खर्च करने के बावजूद सिंचित क्षेत्रों में सिर्फ 0.1 फीसदी की वृद्धि की जा सकी है. 1999 से 2010 के बीच अजित पवार ही राज्य के जल संसाधन मंत्री रहे हैं, इसलिए चव्हाण की यह घोषणा एनसीपी के लिए बड़ी चोट जैसी थी.
मौजूदा जल संसाधन मंत्री एनसीपी के सुनील तटकरे का दावा है कि पिछले दशक में राज्य के सिंचित क्षेत्र में 0.1 फीसदी नहीं बल्कि 5.5 फीसदी की बढ़त हुई है. अजित पवार आर्थिक सर्वे रिपोर्ट में छपे 0.1 फीसदी के आंकड़े को 'छपाई की गलती' बताते हैं, जिसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि श्वेतपत्र से सभी गलतियां दूर हो जाएंगी और सच सामने आएगा. चव्हाण के पास शहरी विकास मंत्रालय भी है.
अपने पूववर्ती अशोक चव्हाण की आदर्श सोसाइटी घोटाले की वजह से सत्ता छिन जाने को देखते हुए वे शुरू में नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से बचते रहे. उन्होंने मुंबई के तत्कालीन नगर निगम आयुक्त सुबोध कुमार से नए निर्माण के बारे में एक सख्त नीति बनाने को कहा था. कुमार ने किसी भी आगामी हाउसिंग प्रोजेक्ट को तब तक मंजूरी नहीं दी, जब तक कि इस साल जनवरी में नई नीति नहीं बन गई. इससे एनसीपी समर्थक बिल्डर लॉबी गुस्से में आ गई.
एनसीपी के लिए राहत पहुंचाने वाली बात यह है कि पृथ्वीराज चव्हाण कांग्रेस में भी उतने ही अलोकप्रिय हो रहे हैं. राज्य के 82 में से 42 विधायकों ने राज्य कांग्रेस प्रमुख मानिकराव ठाकरे और राज्य के प्रभारी मोहन प्रकाश को जून में पत्र लिखकर मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली की आलोचना की है. बिना तिथि वाले इस पत्र को पवार के विद्रोह के बीच में ही 24 जुलाई को मीडिया को लीक किया गया. 'कुछ न करो, बेदाग बने रहो' की अपनी छवि की वजह से महाराष्ट्र के ए.के. एंटनी माने जाने वाले पृथ्वीराज चव्हाण का कहना है कि वे सिर्फ ऐसे प्रस्तावों को मंजूरी देंगे, जो जनहित के हैं.
उन्होंने ऐसा कंप्यूटराइज्ड सिस्टम तैयार किया है जिसमें विधायकों द्वारा किए गए सभी अनुरोध सेव किए रहते हैं, क्योंकि ज्यादातर विधायक विकास के प्रोजेक्ट पर बात करने नहीं बल्कि किसी के व्यक्तिगत प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाने के अनुरोध लेकर उनके पास आते हैं. पृथ्वीराज चव्हाण के एक करीबी के मुताबिक मुख्यमंत्री को शक है कि ऐसे अनुरोध में कुछ पैसों का लेन-देन जुड़ा होता है, इसलिए वे उसे मंजूर करने से बचते हैं.
सार्वजनिक तौर पर तो एनसीपी यही कहती है कि उसने कभी भी पृथ्वीराज चव्हाण को हटाने की मांग नहीं की है. पटेल कहते हैं, ''हमने कभी भी महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन या किसी खास व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने पर जोर नहीं दिया है.'' असल में उन्हें ऐसा करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि खुद कांग्रेस के विधायक चव्हाण को घेरने में लगे हुए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्रियों अशोक चव्हाण, विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे ने शिकायत की है कि आदर्श घोटाले के मामले में उन्हें बचाने के लिए मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं. कांग्रेस को धीरे-धीरे यह आभास हो रहा है कि उसका मुख्य विपक्ष तो उसके भीतर ही है. मनमोहन सरकार कितनी कमजोर है कि नौ सांसदों की पार्टी कांग्रेस के 206 सांसदों को डरा देती है!

