शहरयार सुनो गुलजार के संपादन में शहरयार की शायरी की ताजादम किताब है. किताब क्या है, दो अदीबों की संगत है. शहरयार और गुलजार, दोनों की आदमकद शख्सियतें हैं. गुलजार ने शहरयार की बेहतरीन नज्मों और गजलों का इंतख्वाब किया है. यह चयन शहरयार की शायरी की व्यापकता, सरोकार, रुझान, मानवीयता, कथ्यगत संश्लिष्टता और अनुभवों की सुदीर्घ यात्रा को भी स्पष्ट करता है.
किताब में गुलजार की भूमिका बड़ी नफासत और शायरी के शऊर को समझने वाले लहजे में लिखी गई है. गुलजार के लफ्जों में रचनात्मक धज और अर्थ का संगीत छुपा रहता है. भूमिका में गुलजार ने बड़े शायराना अंदाज में शहरयार की नज्मों और गजलों पर तनकीद की है और शायरी के भीतर जाकर, नए अर्थ भी तलाश किए हैं. बड़ा रचनाकार दूसरे बड़े रचनाकार को और भी बड़ा बनाने की जज्बाती कोशिश करता है. गुलजार ने यही किया है.
शहरयार मानीखे़ज शायर हैं. आसान से आसान शेर भी अपनी संपूर्णता के साथ, संवेदना के दर खोलता प्रतीत होता है. शहरयार की जदीदियत अकेलेपन की आवाजों को अपने भीतर जज्ब करती हुई आगे निकल जाती है. और शहरयार जिदगी के जिस सच की तलाश करते हैं, उसकी अपनी तल्खी है और आकर्षण भीः हवा का जोर ही काफी बहाना होता है, अगर चिराग किसी को जलाना होता है.
शहरयार की शायरी में जिंदगी की अनेक छवियां प्रतिबिंबित होती हैं. भावना का प्रबल आवेग अश्आर को न सिर्फ गहराई प्रदान करता है, बल्कि उन्हें आकर्षक भी बनाता है. इसलिए उनकी गजलें और नज्में अपनी भावनात्मक गूंज के साथ उपस्थित होती हैं: सभी को गम है समंदर के शुश्क होने का, कि खेल श्त्म हुआ किश्तियां डुबोने का. अगर किश्तियों को डुबोना खेल है तो महानगरीय निस्संगता और निस्संगता से पैदा हुआ अकेलापन कवि की बेचैनी का बायस बनता हैः सीने में जलन आंखों में तूफान-सा क्यों है/इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है. उर्दू शायरी में प्रश्ववाचकता हर दौर में रही है. गालिब की शायरी में 'क्यों' बार-बार उभरता है और वो हर बार विडंबनाओं पर सवाल खड़े करता है. शहरयार जब कहते हैं-हर शह्लस परेशान-सा क्यों है? तो वे पूरी शिद्दत के साथ 'मेट्रो कल्चर' को रेशा-रेशा कर देते हैं.
शहरयार नए समय के शायर हैं. रवायत को बचाकर, आधुनिकता बोध को रचते हैं. शहरयार की जदीदियत उर्दू शायरी से थोड़ी भिन्न भी है. यहां संश्लिष्टता है और व्यापकता भी. नज्मों में वो समय, मृत्यु, जीवन, व्यर्थता जैसे तत्वों पर लिखते वक्त कहीं सूफियाना रंग बिखेरते हैं तो कहीं आध्यात्मिक होने लगते हैं: ध्यान की पुरपेच गलियों और गुजरगाहों पे, ज्ञान के फैले हुए सहरा की जानिब, चंद साए जा रहे हैं.
शहरयार अपनी गजलों में और नज्मों में जिंदगी की लय को ऐसे तहलील करते हैं कि शायरी, समय, और इंसान और प्रकृति का रागतत्व बन जाती है. बेशक उनकी शायरी में किश्तियां, ख्वाब, सैराब, दरिया, रात जैसे प्रतीक बार-बार रिपीट होते हैं. इसके बावजूद शहरयार की शायरी, इतनी महीन, सूक्ष्म, अर्थवान है कि लय और अनुभूति मिलकर जिस सृष्टि की संरचना करते हैं वो और कुछ नहीं वो शह्रयार की शायरी ही होती है.
एक बेचैन समय में कोई भी संवेदनशील शायर अपनी व्याकुलता को व्यर्थ नहीं गंवाता. शहरयार अपनी व्याकुल दुनिया को अश्आर की दुनिया बना देते हैं: श्ला में इक नया चेहरा उभारें यानी इस ठहरे हुए वक्त में कोई कशमकश पैदा करें. वो कशमकश पैदा करते भी हैं लेकिन भाव वही विनम्रता से भरा. लहजा वही नफीस. अंदाज वही शाइस्ता. शहरयार हर शेर में एक परिसर की तलाश करते हैं. दो मिसरों के बीच विचार की एक दुनिया को बसाते हैं. अल्फाज के प्रति इतने सचेत रहते हैं कि कोई शब्द न लाउड न मुंहफट! उनकी शायरी सपनों, स्मृतियों, उदासियों और आकांक्षाओं की शायरी है. सैराब, समंदर और किश्तियों को .जरा मिलाकर देखें तो कवि के मन का द्वंद्व और कशमकश की सूरतें दिखाई देती हैं. विचित्र बात है कि शहरयार की गजलें पढ़ो तो वे गजल के शायर प्रतीत होते हैं और उनकी नज्में पढ़ो तो वे नज्मों के शायर दिखते हैं. यानी वे हर लिहाज से एक पुख्ता शायर हैं. नज्मों में उन्होंने बेशक ज्यादा कल्पनाशील होकर अपने भाव व्यक्त किए हैं. अकेलेपन को इस बा-कमाल ढंग से शहरयार ही व्यक्त कर सकते हैं: सन्नाटे की भरी बोतलें बेचने वाले, मेरी खिड़की के नीचे फिर खड़े हुए हैं, और आवाजें लगा रहे हैं.
गुलजार संपादित शहरयार सुनो शायरी की शानदार किताब है, जिसमें अपने समय की स्मृतियां, सपने, तलाश, तल्शियां जिज्ञासा, कल्पनाएं और वर्तमान से जिरह गहरी अनुभूतियों के साथ जज्ब हैं....यह नए समय की नई शायरी है.
यह समीक्षा शहरयार के निधन से पूर्व लिखी गई है.

