भारत एक बाजार है
विष्णु नागर
राजकमल प्रकाशन,
नई दिल्ली-02,
कीमतः 200 रु.
साहित्य की एक अहम विधा व्यंग्य के प्रयोजन पर, उसकी जरूरत पर और उसे विधा बनाने के उपक्रम को लेकर न जाने कितनी बहसें हिंदी साहित्य में मिल सकती हैं. वे बहसें पता नहीं, किसी निष्कर्ष पर पहुंचीं या नहीं पर व्यंग्य लगातार लिखा जा रहा है और वह अब भी बहसतलब है.
कठिनाई के दौर में व्यंग्य की प्रासंगिकता पर संभवतः सवाल नहीं उठने चाहिए बशर्ते व्यंग्य लेखक इसकी उपयोगिता को समझें. इस दृष्टि से पिछले दिनों आया कवि, कहानीकार, पत्रकार विष्णु नागर का व्यंग्य संग्रह 'भारत एक बा.जार है' महत्वपूर्ण है. लगभग इक्यावन व्यंग्य निबंधों के इस संग्रह में समकालीन जीवन की विडंबनाओं, विकृतियों की गंभीर पड़ताल है.
शीर्षक निबंध 'भारत एक बा.जार है' को पढ़ने के बाद यह बिल्कुल नहीं लगता कि इस व्यंग्य को सिर्फ व्यंग्य के लिए लिखा गया है, जैसा कि व्यंग्य लेखन में आमतौर पर दिखाई देता है. भारत के बाजार होने को यहां जिस यथार्थ के धरातल पर दिखलाया गया है, उसे पढ़कर एक अभूतपूर्व वितृष्णा से मन भर जाता है.
साथ ही इस देश में अपने अस्तित्व में बने रहने पर घोर आश्चर्य भी होता है. अंततः हम किस काठी के बने हुए हैं कि इस सड़ांध मारती घातक व्यवस्था में भी जीवित हैं.. हमारी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था के लगभग हर कोने और पहलू का विश्लेषण इस व्यंग्य में निहित है.
इसमें जो दृष्टि समाहित है, वह लेखक की निजी नहीं है. संपूर्ण व्यवस्था ही ऐसी है कि जो लेखक की दृष्टि है वह समय का सच बनकर सामने आता है. निजी दृष्टि को सार्वजनिक दृष्टि के साथ एकाकार करने का अद्भुत कौशल यहां संभव हुआ है. यह एक तरह से संपूर्ण व्यंग्य है. समकालीन जीवन में पैबस्त विकृतियों के पृथक विवरण अन्य निबंधों में दिख जाते हैं.
राजनैतिक पार्टियों के नेता इस हद तक बेशर्म और हाजिरजवाब हैं कि वे आपके प्रश्नों के उत्तर दे तो देंगे पर वह वास्तविक उत्तर नहीं होगा. इस विद्रूप स्थिति को 'सिद्धांतवादी पार्टी के नेता से साक्षात्कार' शीर्षक व्यंग्य में दर्शाया गया है. यहां एक धूर्त नेता का एक तरह की भूलभुलैया में जबरदस्ती ले जाने का सफल प्रयास है. यहां जैसे-जैसे आप सच को उजागर करने की कोशिश करेंगे, यह नेता वैसे-वैसे उस पर झूठ की लौह परत बिछाता जाएगा. फिर आप इन परतों को उठाने में समर्थ नहीं रहेंगे.
हरिशंकर परसाई के बाद इस तरह का सिरे से झ्कझेर देने वाला व्यंग्य संभवतः पहली बार उपलब्ध हुआ है. समकालीन राजनैतिक धूर्तता के सारे रेशे यहां खुलते हैं.
'ईमानदारों की राजनीति' शीर्षक व्यंग्य में ईमानदारी के संदर्भ में अनेक सवाल उठाए गए हैं. बड़ा सवाल यह है कि आपकी ईमानदारी क्या कायरता से पैदा हुई है? कोई भी व्यक्ति यह बता सकता है कि काफी हद तक यह सच है. अधिसंख्य भ्रष्ट नागरिकों के बीच ईमानदार की क्या स्थिति हो सकती है, यह अनुमान लगाना सहज है.
सृजनात्मक लेखन समाज में परिवर्तनवादी भूमिका का निर्वाह किस तरह करता है, यह देखने के लिए कोई त्वरित विधि विकसित नहीं हो सकती, बल्कि यह ज्ञात करने के लिए युगों की प्रतीक्षा की दरकार होती है. संग्रह में शामिल 'सादा जीवन नीच विचार', 'हम पुलिस वाले हैं, भिखारी नहीं', 'हाइ प्रोफाइल लो प्रोफाइल', 'आज है कि आज प्रेमचंद नहीं हैं' जैसे व्यंग्यों से गुजरना इस तरह के साक्ष्य एकत्रित करना है.
बढ़ती अदृश्य विडंबनाओं के इस दौर में परिवर्तनकामी उत्तेजना के लिए जिन सूक्ष्म ब्यौरों की जरूरत है और जिनके चलते पाठक के अंतर्मन के मंथन की आंतरिक यात्रा संभव हो सकती है, उन सारे तत्वों के प्रतिपादन के साथ यह संग्रह हमारे सामने है. सार्थक व्यंग्य सृजन की परंपरा को समृद्ध करता हुआ.

