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संस्कृत शिक्षा: 'त्याज्‍य' बने अब तारणहार

बड़े पैमाने पर संस्कृत की तालीम ले रही दलित और मुस्लिम महिलाओं ने इस भाषा के लिए जगाई नई संभावना.

संस्कृत शिक्षा
संस्कृत शिक्षा
अपडेटेड 6 जून , 2012

हरियाणा में कैथल जिले के राजौंद गांव की 35 वर्षीया कौशल पंवार को शुरू के दिनों में यही फिक्र सताए रहती थी कि दसवीं के बाद आगे पढ़ भी पाएंगी कि नहीं. वाल्मीकि परिवार में जन्मी कौशल को श्रमिक मां-बाप के साथ कई बार खुद भी सड़क निर्माण वगैरह के काम में मजदूरी करने जाना पड़ता था. आज वे दिल्ली विवि के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में संस्कृत की शिक्षिका हैं.

रोहतक विवि से एम.फिल. और फिर 'धर्मशास्त्रों में शूद्र' विषय पर जवाहरलाल नेहरू विवि (जेएनयू) से पीएच.डी. करने के बाद आज वे देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विवि में मनुस्मृति पढ़ाती हैं, अपनी समसामयिक व्याख्या के साथ.Sanskrit teching

बिहार के मुंगेर जिले की 29 वर्षीया दीपिका कश्यप की कहानी उनसे ज्‍यादा अलग नहीं है. बचपन में रुचि के साथ श्लोक पढ़ने वाली, ट्रेन ड्राइवर बनारसी पासवान की इस बेटी ने बारहवीं में जब संस्कृत विषय लेने की जिद की तो पिता ने कोई सोच-संकोच न किया. हालांकि बेटी के इस फैसले का उन्हें तमाम परिचितों के बीच अपने ढंग से बचाव करना पड़ा. आज वे भी दिल्ली विवि के किरोड़ीमल कॉलेज में भर्तृहरि का नीतिशतक पढ़ाती हैं और छात्रों में लोकप्रिय हैं. बिहार के दरभंगा जिले की 28 वर्षीया मनीषा पासवान भी इसी राह पर हैं.

मुजफ्फरपुर, दरभंगा और काशी हिंदू विवि से होते हुए आजकल वे जेएनयू में 'सांख्य (दर्शन) की वैदिक परंपरा का आलोचनात्मक अध्ययन' जैसे विषय को लेकर शोध कर रही हैं.

भारतरत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर को बचपन में दलित होने की वजह से संस्कृत पढ़ने से रोक दिया गया था. आज उसी दलित समाज की लड़कियां देवभाषा मानी जाने वाली संस्कृत की तारणहार बन रही हैं तो मुस्लिम परिवारों की लड़कियां भी इसमें ज्‍यादा पीछे नहीं. अलीगढ़ मुस्लिम विवि से अब तक 18 से ज्‍यादा मुस्लिम छात्राएं संस्कृत में पीएच.डी. कर देश में अलग-अलग उच्च शैक्षिक संस्थानों में सेवाएं दे रही हैं.

इसके अलावा, किश्वर जबीं नसरीन हैं, जो इलाहाबाद विवि में 32 साल से संस्कृत पढ़ा रही हैं और न्नग.जाला अंसारी राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के लखनऊ परिसर में संस्कृत शिक्षिका हैं. इसी संस्थान के गुरुवायूर परिसर से पिछले तीन साल में तीन मुस्लिम छात्राएं और भोपाल परिसर से पिछले चार साल में 63 दलित छात्राएं संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं.

लखनऊ, कुमायूं और कई अन्य विवि में संस्कृत पढ़ातीं मुस्लिम या दलित शिक्षिकाओं को अब उतनी हैरत से नहीं देखा जाता. 2009 में केरल विवि में संस्कृत वेदांत की परीक्षा में एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार की छात्रा रहमत ने टॉप किया. इससे पहले 2006 में भी एमए संस्कृत की परीक्षा में एक मुस्लिम श्रमिक परिवार की बेटी सजीना अव्वल आई थी.

ऐसा क्या हुआ कि शुद्ध शास्त्रियों/सवर्णों की भाषा का तमगा पा चुकी संस्कृत एकाएक, तथाकथित पंडितों की भाषा में अछूत माने जाने वाले तबके की पहुंच में आ गई? संस्कृत की शिक्षा में जम्रियत की ऐसी बयार कहां से बहने लगी? जानकारों की मानें तो इस भाषा में रोजगार बढ़ने के अलावा इसकी और भी कई वजहें हैं.

मशहूर दलित चिंतक, जेनएयू में रूसी और मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र के प्रमुख प्रो. तुलसीराम इसका श्रेय केंद्र में मंत्री रहे डॉ. मुरलीमनोहर जोशी को देते हैं. ''हिंदुत्वकरण के अपने एजेंडे के साथ जोशी तो वैसे पुरोहिती सिखा रहे थे लेकिन इस बहाने से ही सही, वे संस्कृत को जनता के बीच ले आए. जब तक वह लाल कपड़े में छिपाकर रखी गई, वह उपयोगी न बन पाई. संस्कृत की पवित्रता ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई.''

देश में संस्कृत के अग्रणी विद्वानों में से एक और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली के कुलपति डॉ. राधा वल्लभ त्रिपाठी इसे एक लंबे सिलसिले की शक्ल में देखते हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''मुगल शहजादे दाराशुकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया ही था. संस्कृत काव्यशास्त्र के  आचार्य पंडितराज जगन्नाथ शाहजहां के दरबार में थे. 400 साल पहले हिंदू भी उर्दू-फारसी पढ़ते थे. अंग्रेजों के आने से पहले संस्कृत शिक्षकों में भी इतनी कट्टरता नहीं थी. मुश्किल उसके बाद ही शुरू हुई.''

डॉ. त्रिपाठी को वे वाकए भी याद हैं जब विश्वविद्यालयों में संस्कृत शिक्षकों के पद पर मेधावी मुसलमान/दलित प्रत्याशियों के चयन के लिए उन्हें 'शास्त्रियों' से अच्छी-खासी बहस करनी पड़ी. ''वे दूसरों से कहीं ज्‍यादा योग्य हैं तो यह कैसे मुमकिन है कि आप उनकी जाति/मजहब के आधार पर उनके दावे को नकार दें?''

इसमें दो राय नहीं कि संस्कृत में गणित की तरह पूरे-पूरे अंक मिलना भी इसकी ओर आकर्षण की एक वजह रही है. लेकिन इस राह पर दूर तक चलकर आई हर छात्रा की संघर्ष की अपनी-अपनी दास्तान हैं. कौशल पंवार ने जब छठवीं में संस्कृत ली तो कक्षा में अध्यापक ने कहा कि ''जाकर मैला ढो. नहीं मानी तो जोर का चांटा धरा और आखिरी लाइन में बिठा दिया.

पिता ने कहा और मैंने भी तय किया कि अब संस्कृत में सबसे ऊंची कक्षा तक पढ़ूंगी.'' शोध के लिए रोहतक विवि में पंजीकरण के आखिरी दिन उनका फॉर्म लेने से ही मना कर दिया गया. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक इंटर कॉलेज में संस्कृत शिक्षिका फरजाना परवीन को तो यह विषय पढ़ने पर परिवार में किसी ने नहीं टोका. पर सहारनपुर जिले के एक ग्रामीण प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका और हरियाणा संस्कृत अकादमी से संस्कृत विदुषी का खिताब पा चुकीं रजिया सुल्ताना कट्टरपंथियों से खासी आशंकित थीं. उन्होंने दादा प्रोफेसर सुलेमान के साथ मिलकर .कुरान का अनुवाद किया है. ''डर लग रहा था कि अरब मुल्कों के और दूसरे कट्टरपंथी इस पर बखेड़ा न खड़ा कर दें. लेकिन ईरान की और दूसरी मजहबी संस्थाओं ने इस पर खुशी जताई तो तसल्ली हुई.''

चमड़ी के रंग तक से भेद किया गया. मनीषा जब दरभंगा में बीए करने पहुंचीं तो ''मेरे बारे में पता चलने पर शिक्षक ने कहा कि तुम दलित लगती नहीं हो. उसके बाद वे कॉलेज में क्लास ही नहीं लेते, बाकियों को घर पर बुलाकर पढ़ा देते थे. मुझे बहुत पीड़ा हुई.'' बाद में एमए में काशी हिंदू विवि में प्रवेश मिलने पर वे उन गुरुजी को मिठाई खिलाने गईं तो वे अपराध बोध में बोले कि ''तुमको मैंने सहयोग भी नहीं दिया, बेटे को संस्कृत पढ़ाई पर उसने नाक कटवा दी. वह मैनेजमेंट में भाग गया.''

पंवार तो अब भी सहती हैं. ''मुझसे जुड़े कई फैसले फैकल्टी के लोग ले लेते हैं और फिर कहते हैं कि कोई बात नहीं, आप तो दस्तखत कर दीजिए.'' इन सबके बावजूद इस तबके की संघर्ष शक्ति कम नहीं पड़ रही. दीपिका संस्कृत के और भी ऊंचे अध्ययन के लिए जर्मनी जाना चाहती हैं.

ये नई प्रतिभाएं भाषा के रूप में संस्कृत में निहित संभावनाओं को खंगाल रही हैं. यहां तक कि मदरसों में भी इसकी पढ़ाई शुरू करवाने की कोशिशें चल रही हैं. पर जैसा कि डॉ. त्रिपाठी भी मानते हैं, ''सब कुछ स्वाभाविक ढंग से होना चाहिए, कहीं से कुछ भी थोपा न जाए. तभी संस्कृत गहरी जकड़बंदी से निकल पाएगी.'' और तभी शायद उसे एक नई जिंदगी भी मिले.
-साथ में सीता पांडेय

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