राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत 20 से 24 जनवरी के बीच जयपुर साहित्य सम्मेलन में सलमान रुश्दी को न केवल आने से रोकने बल्कि उनकी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी रुकवाने में कामयाब रहे. 18 जनवरी को वे नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम से मिले. उसके बाद केंद्रीय एजेंसियों से उनकी हरसंभव मदद को कहा गया ताकि लेखक रुश्दी सीधे या वर्चुअल प्रसारण भी न कर सकें.
सीधा प्रसारण रोकने से ऐन पहले 24 जनवरी को मुस्लिम फोरम के नेता पाकिर फारूकी मीडिया से बोले, ''जयपुर पुलिस आयुक्त बी.एल. सोनी के मुताबिक, अगर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हुई तो यह जयपुर में आखिरी साहित्य समारोह होगा. आयोजकों को यह बात उन्होंने बता दी है.''
पुलिस ने आयोजकों या रुश्दी की सुरक्षा के बारे में कभी आश्वासन नहीं दिया और वह खतरे की एक बड़ी आशंका लगातार जताती रही. ''रुश्दी समारोह से बड़े नहीं हैं. अगर कुछ गड़बड़ी हुई, जिसकी काफी ज्यादा संभावना है, तो फिर हम कतई जिम्मेदार नहीं होंगे.''
गहलोत आखिर क्यों रोकना चाहते थे रुश्दी को?
गहलोत को कांग्रेस आला कमान की शह थी कि वे खुद को मुस्लिम हितों के खैरख्वाह के रूप में साबित करने में इस मौके का उपयोग करें. सितंबर में उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे गोपालगढ़ (अलवर) कस्बे में राजस्थान पुलिस की गोलियों से 10 मेव मुसलमानों के मारे जाने के बाद से पार्टी खुद को बेहद डांवाडोल हालत में पा रही थी. राज्य में आधा दर्जन से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं हुईं जिनमें निशाने पर मुसलमान ही रहे. अजमेर शहर में कुरान शरीफ के पन्ने जलाए गए.
राज्य खुफिया एजेंसी ने गहलोत को बताया था कि उत्तर प्रदेश से सटे इलाकों में ऐसे पोस्टर नजर आए हैं जिनमें उनको 'गोपालगढ़ का अशोक मोदी' बताते हुए उनकी तुलना गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गोधरा से की गई है. उन्होंने फैसला किया कि सम्मेलन के लिए रुश्दी को भेजे न्यौते का इस्तेमाल अपनी खराब छवि ठीक करने के लिए किया जाए, भले ही इसके लिए मुट्ठी भर मुसलमानों को सम्मेलन में आने वाले हजारों लोगों के लिए हिंसक खतरा बताना पड़े.
गहलोत की रणनीति
गहलोत ने एक अनजान और अनसुने गुट के ज्ञापन पर संज्ञान लिया. इस समूह ने खुद को मुस्लिम एकता फोरम बताया और अपने ज्ञापन के साथ देवबंद के दारुल उलूम का पत्र भी नत्थी किया. दारुल उलूम ने केंद्र से रुश्दी को इस आयोजन से दूर रखने की मांग की लेकिन उसने 2007 में तब इसे नजरअंदाज कर दिया था जब वे इसमें शरीक हुए थे. पार्टी आला कमान से इजाजत लिए बगैर भाजपा के राज्य अल्पसंख्यक सेल ने भी रुश्दी को समारोह से दूर रखने की मांग की. भाजपा के इस सेल का वजूद भी लगभग वैसा ही है जैसा एकता फोरम का है.
गहलोत ने इन मुट्ठी भर मुसलमानों को हरकत में ला दिया जबकि इनमें से किसी का कुछ भी दांव पर नहीं था. सम्मेलन शुरू होने से पहले उन्होंने बार-बार कहा कि इस तरह के जज्बात को देखते हुए कानून और व्यवस्था की बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.
राजस्थान विश्वविद्यालय से जुड़े मुशीरुल हसन ने कहा कि पूरे जयपुर में विरोध करने वाले 50-100 से ज्यादा नहीं थे. ''किसने उकसाया उन्हें? हमें पता करने की जरूरत है?'' गहलोत को एहसास था कि इससे उदारवादी परेशान होंगे और यात्रा पर प्रतिबंध के खुले समर्थन से उनकी छवि को नुकसान पहुंचेगा. लिहाजा, उन्होंने भ्रम पैदा करने का रास्ता चुना. एक तरफ उन्होंने दावा किया कि वे केंद्र को विरोधी लोगों के विचार बता रहे हैं. साथ ही वे यह भी कहते रहे कि वे और उनकी सरकार इस यात्रा में कतई बाधक नहीं हैं.
झूठ पकड़ा गया
रुश्दी की यात्रा को लेकर उनके और उनकी सरकार की साजिश का भंडाफोड़ रुश्दी के बयान से हुआ. 20 जनवरी को रुश्दी ने कहा कि वे अपनी यात्रा रद्द करने को मजबूर हुए जब उन्हें ऐसी खुफिया जानकारी मिली कि उनकी हत्या के लिए भाड़े के दो हत्यारे मुंबई से रवाना हो गए हैं. खुफिया ब्यूरो ने जून, 2011 की एक सूचना निकाल ली और उसे नया बनाकर जारी कर दिया. इसमें कहा गया था कि महाराष्ट्र में हथियारों के साथ हिरासत में लिए गए एक आदमी पर शक है कि वह रुश्दी को अपना निशाना बना सकता है.
लेकिन एक बार सोनी और महाराष्ट्र पुलिस ने जब ऐसे किसी खतरे या अनहोनी की आशंका से इनकार किया तो रुश्दी और मीडिया ने इस खतरे को झूठ करार दिया. इसके बाद गहलोत और उनके गृह सचिव जी.एस. संधू 23 जनवरी को यह स्वीकार करने को मजबूर हुए कि वे आधिकारिक तौर पर यात्रा के बारे में जानते थे और आयोजकों और रुश्दी को खतरे के बारे में आगाह करते रहे हैं.
आखिर मान लिया
रुश्दी को दूर रखने की योजना में शामिल एक बहुत ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इंडिया टुडे से कहा, ''हां, हम रुश्दी को दूर रखने का आदेश लागू करने में सफल रहे.'' राज्य कांग्रेस प्रवक्ता सत्येंद्र राघव ने 24 जनवरी को पहली बार पार्टी का आधिकारिक रुख बताया, ''हम इस बात के लिए तैयार थे कि अंग्रेजी मीडिया हमारी आलोचना करेगा. हां, कांग्रेस कभी नहीं चाहती थी कि रुश्दी आएं.''
पुलिस कार्रवाई पूरी तरह प्रदर्शनकारियों की सहायता करने पर केंद्रित थी. राज्य पुलिस का यह रवैया इस लिहाज से एकदम उलट था कि उसने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 9 और 17 जनवरी को उनकी जयपुर की दो यात्राओं के दौरान पूरी सुरक्षा दी. मोदी को जान का जोखिम रुश्दी से कहीं ज्यादा है. या फिर जब उसने अमेरिकी टॉक शो सेलिब्रिटी ओपरा विनफ्रे के लिए 22 जनवरी को सुरक्षा व्यवस्था की जबकि उनको किसी तरह का कोई आतंकी खतरा नहीं था. उनका सत्र शुरू होने के एक घंटे से भी पहले उस स्थल के दरवाजे बंद कर दिए गए.
2,000 पासधारी कार्यक्रम स्थल से 200 मीटर दूर रोक दिए गए. अंदर जगह होने के बावजूद लोगों को दो घंटे तक भीतर नहीं जाने दिया गया. इसके विपरीत, पुलिस ने आयोजकों से कहा कि प्रतिबंधित पुस्तक सैटेनिक वर्सेज के अंश पढ़ने वाले चारों लेखक गिरफ्तारी या हिंसा का शिकार होने से बचने के लिए जयपुर छोड़ दें जबकि इन लेखकों ने कानून नहीं तोड़ा था क्योंकि प्रतिबंधित किताब उनके पास थी ही नहीं.
पुलिस ने आयोजकों से कहा कि वे प्रदर्शनकारियों को आगंतुक के रूप में दर्ज करें. उनमें से कुछ ने तो उत्सव स्थल पर ही नमाज पढ़ी. इसके साथ ही, पुलिस ने आयोजकों से कहा कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर सकते हैं लेकिन यह सुनिश्चित करें कि बहस के दौरान किसी तरह भी कानून का उल्लंघन न हो. यह एक रणनीति थी ताकि आयोजक प्रदर्शनकारियों को भीतर घुसने से न रोक पाएं.
लेकिन रुश्दी की प्रस्तावित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शुरू होने से एक घंटा पहले ही पुलिस ने पूरे क्षेत्र को सील कर दिया. यहां तक कि उसने आयोजन स्थल आना चाह रहे स्कूली छात्रों से भरी बसों को भी एक किमी पहले ही रोक दिया. आयोजक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शुरू करते, इसके कुछ ही मिनट पहले पुलिस ने अपने बिना हथियार वाले जवानों से आगे का लॉन घेर लेने को कहा, जिससे आयोजकों को खतरे की गंभीरता का एहसास हो और वे अपना इरादा छोड़ दें. उन्होंने निराश होकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रद्द कर दी.
आत्मसमर्पण
इस सम्मेलन के जरिए मशहूर हुए डिग्गी पैलेस के मालिक राम प्रताप सिंह ने भी सरकार का ही राग अलापना पसंद किया. उन्होंने घोषणा की कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए इजाजत से उन्होंने ही इनकार किया. आयोजकों की मुख्य आवाज संजय रॉय को कार्यक्रम रद्द करने का बयान बीच में ही अधूरा छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्हें हाशिए पर कर दिया गया था.
गहलोत की कामयाबी उत्तर प्रदेश के चुनाव में ऐसे शख्स के रूप में भुनाई जाएगी जिन्होंने रुश्दी को अपने राज्य में नहीं आने दिया. गहलोत आखिरकार सभी मुसलमानों को खतरनाक तरीके से हिंसक हो जाने की बात प्रचारित करने में सफल हो गए. अब देखना यह है कि मुसलमानों को हिंसक समुदाय के रूप में प्रचारित करने का गहलोत प्रशासन का तीर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महंगा पड़ता है या भाजपा को हिंदू वोट दिलाएगा!

