23 मई को आने वाले चुनावी नतीजे अगर एक्जिट पोल की राह ही गए तो इसका असर कई जगहों पर दिख सकता है. इनमें से पहला असर तो उस फेडरल फ्रंट पर ही पड़ेगा, जिसे कई क्षेत्रीय दलों के नेता बनाने में जुटे थे. चुनावी नतीजे अगर एक्जिट पोल की राह पर ही गए तो तथाकथित फेडरल फ्रंट का शीराजा शुरू होने से पहले ही बिखर सकता है. फिलहाल ऐसा लग रहा है कि गैर-भाजपा दलों के लिए लोकसभा में बहुत अधिक, यानी जितनी वो उम्मीद कर रहे थे, उतनी जगह तो नहीं है. कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने भाजपा को सरकार में आने से रोकने के लिए कुछ कोशिशें की थीं.
असल में, केसीआर ने ही 2018 में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फेडरल फ्रंट का विचार दिया था और उस समय ममता समेत कई क्षेत्रीय नेताओं से मिले थे. पिछले हफ्ते भी राव ने डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन से मुलाकात की. केसीआर के चिरप्रतिद्वंद्वी एक्जिट पोल के वक्त हालांकि, अधिक सक्रिय थे और पिछले एक हफ्ते में उन्होंने विपक्षी खेमे में तकरीबन हर नेता से मुलाकात की थी. इनमें यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हैं.
लेकिन एक खास बात जो गौर करने योग्य है कि आखिर इस साल के अंत में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां इन नतीजों का क्या असर पड़ सकता है.
अब इस साल के आखिर में झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं. साल 2014 में जम्मू और कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव कराया गया था पर वहां राष्ट्रपति शासन लागू है और वहां का चुनाव अनुकूल परिस्थितियों में ही कराया जाएगा. फिर भी, अगर जम्मू-कश्मीर में चुनाव हुए तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली सीटों से वहां सज्जाद गनी लोन के साथ उसके रिश्ते और अधिक गाढ़े ही होंगे. उभरते हुए युवा नेता लोन घाटी में असरदार हैं और जम्मू क्षेत्र में भाजपा अधिकतम सीटों के साथ नई तरह की सरकार बनाने की कोशिश करेगी.
झारखंड में भाजपा को मिलने वाली सीटों से मुख्यमंत्री रघुबर दास की किस्मत बंधी है. प्रदेश भाजपा के सूत्र बताते हैं, "अगर भाजपा पिछला प्रदर्शन दोहरा न भी पाए पर ठीक-ठाक प्रदर्शन कर जाए तो मुख्यमंत्री बने रहेंगे. लेकिन भाजपा ने अगर झारखंड में बुरा प्रदर्शन किया तो दास की जगह पार्टी किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकती है. पर अधिक उम्मीद यही है कि सूबे का चुनाव मोदी के नाम पर ही लड़ा जाएगा."
गौरतलब है कि झारखंड में भाजपा को एक्जिट पोल में ठीक-ठाक प्रदर्शन करता हुआ दिखाया गया है. हरियाणा में भी यही स्थिति है. चुनाव जीतने के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने हरियाणा में गैर जाट मुख्यमंत्री का दांव चला था. पर, लोकसभा के नतीजे मनमाफिक नहीं आते हैं तो यह समीकरण उलट भी दिया जा सकता है.
उधर महाराष्ट्र में, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रत्यक्ष तौर पर लोकसभा चुनाव अभियान में मतदाताओं को यह समझाने के लिए एक मंच पर साथ आए थे कि साढ़े चार साल तक एक-दूसरे की जमकर आलोचना करने के बाद वे फिर से क्यों इकट्ठे हुए हैं. हालांकि शिवसेना ने राम मंदिर और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर एकजुटता दिखाने की भरसक कोशिश की. लेकिन यह भी तय है कि भाजपा और शिवसेना इस बार विधानसभा में मिलकर लडेंगे. अगर लोकसभा के नतीजों में इस गठजोड़ को कम सीटें हासिल होती हैं तो तब तो हाथ से हाथ मिले रहेंगे. पर शिवसेना या भाजपा दोनों में से किसी एक का प्रदर्शन दूसरे से कम हुआ तो उसका असर विधानसभा चुनाव के वक्त दिखेगा.
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