बिजनौर जिले में कोर्ट के भीतर अभियुक्त की हत्या के मामले ने एक बार फिर न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाया है. कोर्ट परिसर की कड़ी निगरानी को रोडमैप बनाने के लिए विधि एवं न्याय विभाग के कैबिनेट मंत्री बृजेश पाठक लगातार बैठकों में व्यस्त हैं. न्याय विभाग प्रदेश में जल्द ही कई नई योजनाएं शुरू करने जा रहा है जो प्रदेश में कानून के पालन को और सख्त करेगा. इन्हीं योजनाओं की जानकारी बृजेश पाठक ने 19 दिसंबर को लखनऊ में विधानभवन स्थित कक्ष में “इंडिया टुडे” से बातचीत में दी.
-यूपी में न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं?
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के सभी जनपद न्यायालयों के साथ दोनों उच्च न्यायालय भवनों की कड़ी सुरक्षा करने के निर्देश पहले ही दिए थे. लेकिन इनमें स्थानीय पुलिस और प्रशासन की लापरवाही सामने आई है. बिजनौर में कोर्ट के भीतर हत्या के मामले में लापरवाह पुलिस कर्मियों को निलंबित किया गया है. हमने अपर मुख्य सचिव गृह, डीजीपी तथा सभी संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक करके न्यायालय की सुरक्षा से जुड़ी आख्या मांगी है. सुरक्षा के लिए कितना संसाधन चाहिए? सुरक्षा के लिए कौन-कौन से उपकरण चाहिए? इसके लिए कितनी धनराशि चाहिए? इन सभी बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई है. सरकार प्रदेश की सभी न्यायालयों की सुरक्षा कड़ी करेगी और कोई भी अपराधी कोर्ट परिसर में नहीं आ सकेगा. बिजनौर की घटना की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए कठोर कदम उठाए जा रहे हैं. सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कोर्ट परिसर में कोई भी व्यक्ति ऐसी वस्तु लेकर दाखिल न हो पाए जिससे किसी को क्षति पहुंच सके.
-आपकी सरकार दंगों के आरोपियों से मुकदमे वापस ले रही है?
उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले से ही तय किया था कि जो भी राजनीतिक दृष्टि से दर्ज मुकदमे हैं उन्हें वापस लिया जाएगा. लोगों ने इसे गलत समझा. उन्होंने समझा कि सरकार राजनीतिक लोगों के मुकदमे वापस लेने जा रही है. राजनीतिक ढंग से किसी को प्रताड़ित करने के लिए जो मुकदमे दर्ज किए गए थे उन्हें वापस लेने की घोषणा मुख्यमंत्री जी ने विधानसभा में की थी. इसी के अनुरूप सरकार कार्रवाई कर रही है. इसमें खास बात यह है कि कोई यह नहीं कह सकता कि एक ही दल के मुकदमे वापस हो रहे हैं. सभी दलों के लोगों के मुकदमे सरकार वापस ले रही है. किसी भी राजनीतिक दल के नेता या कार्यकर्ता को कोई गलत ढंग से प्रताड़ित न कर पाए सरकार की यह भी जिम्मेदारी है.
-मुकदमों की ठीक ढंग से पैरवी न होने पर कई बार न्यायालय ने सरकार के खिलाफ तल्ख रवैया अपनाया है?
हमारी सरकार लगातार सरकारी मुकदमों की गंभीरता से पैरवी कर रही है. पिछले दिनों मैंने अभियोजन से जुड़े कार्यों की समीक्षा की. इसमें सरकारी अधिवक्ताओं को बुलाया. इनको कड़े निर्देश दिए कि किसी भी तरह मुकदमों की पैरवी में कोई कोताही न हो. सरकार को भी अच्छे नतीजे मिले हैं. औरेया में एक बच्ची से रेप के मामले मे आरोपियों को एक हफ्ते के भीतर आजीवन कारावास की सजा दिलाई गई है. कानपुर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जनपदों से ऐसी ही सूचनाएं मिली हैं. कई जगहों पर न्यायालय और अधिवक्ता अच्छा काम कर रहे हैं.
-रेप के कई मुकदमों में जल्दी न्याय न मिलने से भी हालात बिगड़े हैं?
हम सरकारी वकीलों की मेरिट के हिसाब से तैनाती कर रहे हैं. वकीलों की वरीयता, मुकदमों में पैरवी का ढंग, कार्यशैली, चरित्र जैसे बिंदुओं के आधार पर इनकी नियुक्ति करते हैं. सरकार यह योजना बना रही है कि इन वकीलों को सरकारी मामलों की पैरवी के लिए अलग से प्रशिक्षण दिया जाए. सरकारी वकीलों के चयन में सरकार ने जिलाधिकारी और जिला जज को भी शामिल किया है. यह तीन वकीलों का पैनल बनाकर शासन में भेजते हैं जहां से अंतिम निर्णय लिया जाता है. पाक्सो एक्ट के मुकदमे के लिए सरकार ने अलग से मेधावी, मेरिट वाले वकीलों को नियुक्त किया है जिससे आरोपियों को जल्द से जल्द सजा दिलाई जा सके. सरकार 218 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट खोलने जा रही है. इनमें 144 कोर्ट केवल महिलाओं से रेप के मामले ही सुनेंगे. अभी तक इन कोर्ट में महिलाओं से जुड़े अन्य मामले भी आते थे अब सिर्फ रेप के ही मामले 144 कोर्ट सुनेंगे. शेष 74 कोर्ट बच्चों से जुड़े लैंगिग अपराध के मामले सुनेंगे. सरकार ने तय किया है कि रेप के मामले में तुरंत चार्जशीट लगे. चार्जशीट लगने के बाद तुरंत लोगों को न्याय मिले.
-न्याय विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी है. ऐसे में नए न्यायालय कितना सक्षम हो पाएंगे?
न्याय विभाग में अभी केवल 2100 जज हैं. सरकार ने 610 नए जूनियर डिवीजन के सिविल जज के पद सृजित किए हैं. इनकी भर्ती प्रक्रिया पूरी हो गई है और नियुक्ति आदेश जारी हो रहे हैं. इसके अलावा सौ नए पद अतिरिक्त सत्र न्यायधीश स्तर के भी सृजित किए गए हैं. महिलाओं के घरेलू मामलों को निबटाने के लिए 110 पारिवारिक अदालतें भी खोली गई हैं. 25 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट एससी-एसटी के मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए खोले गए हैं. इसके अलावा ईज आफ डुइंग बिजनेस के आधार पर सरकार ने 13 नए कामर्शियल कोर्ट भी खोले हैं. सामान्यतया कामर्शियल मुकदमे सिविल न्यायालयों चलते थे. ये नए कामर्शियल कोर्ट उन जिलों जैसे मेरठ, नोएडा गाजियाबाद में खोले गए हैं जहां इन विवादों की संख्या अधिक है. इसीतरह मादक द्रव्य पदार्थ अधिनियम की सुनवाई के लिए भी अलग से मुकदमे खोले गए हैं.
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