उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में जिला मुख्यालय से तकरीबन आठ किलोमीटर दूर लखनऊ-फैजाबाद हाइवे पर मौजूद कस्बे दादरा से दौलतपुर गांव जाने वाली संकरी सी सड़क पर घुसते ही खेती के मायने बदल जाते हैं. सड़क के दोनों किनारों पर दूर तक फैले खेतों में विशेष तकनीकी से खड़ी हुई केला की फसल और हर किसान की संपन्नता शहरों में रहने वाले लोगों को इर्ष्या करने पर मजबूर कर देती हैं. यह सड़क दौलतपुर के प्रगतिशील किसान राम सरन वर्मा की आलीशान कोठी पर जाकर रुकती है जिन्होंने अपने नवोन्मेषों से खेती को एक नई पहचान दी है. घर की माली हालत बेहद खराब होने के कारण राम सरन कक्षा आठ से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके और कृषक पिता का हाथ बटाने खेतों में कूद पड़े. महज चार एकड़ खेत और उस पर गेहूं-चावल की परंपरागत खेती से किसी तरह परिवार का पेट ही भर पाता था.
वर्ष 1989 में राम सरन ने किसी तरह पांच हजार रुपयों का जुगाड़ किया और तकरीबन डेढ़ वर्ष तक भ्रमण कर देश के दूसरे प्रगतिशील किसानों तथा खेती से जुड़ी संस्थाओं से संपर्क कर बारीकियां सीखीं. वर्ष 1991 में पहली बार राम सरन ने पिता के विरोध को दरकिनार कर एक एकड़ क्षेत्रफल में केला की खेती शुरू की. शुरुआत में कुछ फायदा दिखा तो दोबारा एक खास तरीके से ‘टिश्यू कल्चर’ तकनीकी को अपनाकर जब केले की खेती की तो उत्पादन अचानक 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गया. इसके बाद राम सरन ने खेतों को अपनी प्रयोगशाला बना दिया. गांव के कुछ और किसानों को अपने साथ जोड़कर बड़े क्षेत्रफल में केले की खेती शुरू की और शुरुआती फायदे ने किसानों को गेहूं-चावल की भरण पोषण खेती से पूरी तरह व्यावसायिक खेती की ओर मोड़ दिया. इसके बाद राम सरन ने आसपास के गांव के किसानों के खेतों को अपने साथ जोडक़र ‘स्टेकिंग’ विधि से टमाटर, आलू बुआई की उन्नत तकनीकी और मेंथा का तेल निकालने की कम खर्चीली और प्रभावशाली तकनीकों को इजाद कर आसपास के गांवों की पैदावार 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा दी.
वर्ष 1995 में राम सरन को जबरदस्त घाटा तब हुआ जब इस वर्ष हुई अधिक बरसात और आंधी ने केले की पूरी फसल खराब कर दी. इसके बाद इन्होंने फसल चक्र में आमूलचूल परिवर्तन किए और बरसात के दिनों में खेत के दो तिहाई हिस्से को खाली रखकर नुकसान को न के बराबर कर दिया. गेहूं की फसल के बाद और आलू की फसल के बाद केले की फसल लगाकर खेती में प्रयोग होने वाली खाद की मात्रा को आधा कर दिया. राम सरन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिली जब पिछले वर्ष इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. इससे पहले केंद्र सरकार इन्हें ‘जगजीवन राम किसान पुरस्कार’ से सम्मानित कर चुकी है. इसके साथ ही इन्हें केंद्र सरकार से ‘एग्री कृषि अवार्ड’, ‘एग्रीकल्चर लीडरशिप एवार्ड’, ‘उद्यान विकास एवार्ड’, के अलावा प्रदेश सरकार से ‘रोल मॉडल किसान सम्मान’, ‘नव अन्वेषक किसान सम्मान’ और ‘चौधरी चरण सिंह किसान पुरस्कार’ मिल चुका है.
राम सरन के कार्यों ने उत्तराखंड, हरियाणा की सरकारों से भी इन्हें सम्मान दिलाया है और गुजरात सरकार ने वर्ष 2013 में इन्हें अपने कृषि विभाग का सलाहकार भी नियुक्त किया था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपनी अध्यक्षता में यूपी में खेती के विकास के लिए जो सलाहकार मंडल बनाया है राम सरन उसके भी सदस्य हैं. कृषि सुधार पर केंद्र सरकार के बिल के बारे में पैदा हुई दुविधाओं को दूर करने के लिए राम सरन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाने की तैयारी कर रहे हैं. राम सरन वर्मा कहते हैं कि कृषि सुधार के लिए केंद्र सरकार का बिल किसानों के हित में है. वर्मा कहते हैं, “खास तौर पर जो हमारे किसान अभी बंदिश में बंधे थे, अपना माल बेच नहीं सकते थे मगर इस बिल के बाद अब वे देश के किसी भी कोने में अपनी उपज को बेच सकते हैं. अगर हम अपनी फसल को कहीं बाहर ले जाएंगे तो हमें कोई मंडी शुल्क नहीं लगेगा, कोई रुकावट नहीं आएगी इसलिए यह बिल किसान के लिए बहुत उपयोगी है. इससे बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और किसान अब स्वतंत्र होकर व्यापार कर सकता है.”
राम सरन के पास अभी भी केवल 12 एकड़ ही खेत हैं लेकिन वे सहकारिता के आधार पर आसपास के किसानों के कुल 300 एकड़ से अधिक खेतों पर अपनी नवोन्मेषी खेती के जरिए सोना उगा रहे हैं. इस वक्त राम सरन ने 100 एकड़ खेत पर एक लाख 50 हजार केले की पौध को लगाया है. उत्तर भारत में इतने बड़े पैमाने पर केले की खेती करने वाले राम सरन इकलौते किसान हैं. एक एकड़ खेत पर केले की खेती पर एक लाख रुपए का शुद्ध लाभ होता है. इस तरह सौ एकड़ खेत पर राम सरन एक करोड़ रुपए का लाभ कमाते हैं. राम सरन अब तक देश भर के एक लाख से अधिक किसानों को अपने घर पर नई तकनीकी से केला, आलू, टमाटर और मेंथा की खेती का नि:शुल्क प्रशिक्षण दे चुके हैं. यह सिलसिला अनवरत जारी है. राम सरन का सिर्फ कृषि से सालाना कारोबार तीन से चार करोड़ रुपए को पार कर गया है. इनके साथ आसपास के किसान भी माला-माल हुए हैं. अपने खेतों में काम कर रहे पांच दर्जन से अधिक कर्मचारियों की ओर इशारा करते हुए राम सरन बड़ी गर्व के साथ कहते हैं, "दूसरे गांव के लोग नौकरी के लिए शहर जाते हैं लेकिन शहर के लोग नौकरी के लिए मेरे गांव आते हैं."
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