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राजेश खन्‍ना: हमारा पहला सुपरस्टार

वे खांटी मिडिल क्लास हीरो थेः सुघड़ चेहरा-मोहरा और आजमाई अदाएं. लड़कियां इसी पर मर मिटीं.

राजेश खन्ना
राजेश खन्ना
अपडेटेड 23 जुलाई , 2012
राजेश खन्ना
1942-2012

भारत के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना को उनके चाहने वालों ने बरसों सराहा और प्यार दिया, लेकिन बौद्धिक जगत में उन्हें पहचान न मिल पाई. सत्तर के दशक की शुरुआत में वे बड़े नायक थे, बावजूद इसके अमिताभ बच्चन की चमकदार और धीर-गंभीर शख्सियत का ग्रहण उन पर ऐसा लगा कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी भूमिका को ही नजरअंदाज कर दिया गया.

राजेश खन्ना 'कूल' नहीं थे. वे एक भोले-भाले मध्यवर्गीय लड़के की तरह थे. वे क्लासिक हैंडसम नहीं बल्कि सुघड़ थे. अकसर अपने चुस्त सफारी सूट और थोड़े सख्त बालों में कुछ अजीब-से लगते थे. लेकिन जिस पल वे गर्दन हलकी-सी झुकाकर मुस्कराते और कैमरे की ओर देखकर पलकें झपकाते, उनका आकर्षण असहनीय हो जाता और महिलाएं सर्द आहें भरने लगती थीं.

ऐसी अदा एक पल को उनकी अपनी जान पड़ती और उनकी भोली-भाली शख्सियत सीधे आंखों से अपने चाहने वालों के साथ एक करीबी रिश्ता जोड़ लेती थी. उनकी साधारण छवि, मासूम अदा और मोहक आकर्षण कुल मिलाकर मारक बन जाते थे. यही वह अदा थी जिसने फिल्म दाग (निर्देशकः यश चोपड़ा, 1973) के अंत में चाहने वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि दो शादियां करके भी चैन से रहा जा सकता है और यह बेहद सामान्य बात है. दूसरा कौन ऐसा कर सकता था?

वे आम तौर पर मध्य या उच्च मध्य वर्ग के किरदार निभाते थे, जिन्हें अकसर परिवार का सहारा नहीं होता था और प्यार की तलाश में जो गुमसुम से जख्मी दिल पड़े रहते थे. ऐसे किरदारों के दर्द में भी एक गुस्सा होता था, जो परदे पर नशे में डूबकर और उम्दा गीतों के जरिए बयान किया जाता. मसलन कटी पतंग (निर्देशकः शक्ति सामंत, 1970) का ये जो मोहब्बत है. राजेश खन्ना पर कुछ सदाबहार गीत फिल्माए गए, खासकर किशोर कुमार के गाए और आर.डी. बर्मन के संगीतबद्ध किए हुए. फिर भी बेहतरीन अभिनय वाली उनकी फिल्मों में से एक है इत्तेफाक (निर्देशकः यश चोपड़ा, 1969), जिसमें कोई गाना नहीं था. उसमें उन्होंने एक भगोड़े संदिग्ध हत्यारे की भूमिका निभाई है.

उनकी पहली बड़ी फिल्म थी आराधना (निर्देशकः शक्ति सामंत, 1969) जिसमें उनकी दोहरी भूमिका थी और हीरोइन थीं शर्मिला टैगोर. हिंदी सिनेमा के सबसे मादक गीतों में से एक रूप तेरा मस्ताना इसी फिल्म में था, जिसमें कैमरे और गीत के संयोग से बन रहे मादक माहौल में बंधनों से परे आकर्षण में बंध कर प्रेमी-प्रेमिका का एक दूसरे की ओर देखना ऐसा दृश्य बनाता था जहां 'भूल' होनी तो तय थी.

इसी फिल्म में खन्ना जब दूसरी भूमिका में लौटते हैं तो शर्मिला टैगोर उनकी मां होती हैं. इस क्लासिक फिल्म के दौरान जिस किस्म का खिंचाव दोनों के बीच पैदा हुआ था उसी का असर था कि शर्मिला अपने गुरु सत्यजित रे के साथ बीच में ही काम करने चली गईं, जिसके कारण मेरे सपनों की रानी गीत में शर्मिला वाले दृश्यों को बाद में अलग से फिल्माया गया.

आनंद (निर्देशकः हृषिकेश मुखर्जी, 1971) में खन्ना ने कैंसर के मरीज की भूमिका निभाई. फिल्म का फलसफा उसके महान गीत और डायलॉग में ही बयां हो जाता है, ''जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं.'' यह फिल्म मौत नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है. इसमें पहली बार राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन साथ आए. बाद में मुखर्जी ने ही नमक हराम में दोनों को 1973 में दोबारा साथ लिया.

बांग्ला लेखक बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय की कहानी निशिपद्मा पर बनी थी फिल्म अमर प्रेम (निर्देशकः शक्ति सामंत, 1972). इन्हीं की कहानी पर सत्यजित रे ने पाथेर पांचाली बनाई थी. अमर प्रेम की कहानी वेश्यालय में बेच दी गई एक लड़की पर है, जिसे बाद में प्रेम हो जाता है. इस फिल्म में चिंगारी कोई भड़के गीत काफी लोकप्रिय हुआ. इसके अलावा राजेश खन्ना का डायलॉग, ''पुष्पा, आइ हेट टियर्स'' फिल्मी इतिहास के सुनहरे पलों में एक है जिसे बोलने के बाद वे खुद रोने लग जाते हैं.

अपनी तमाम बेहतरीन भूमिकाओं में खन्ना का चरित्र रोमांटिक नायक तक सिमटा हुआ नहीं है बल्कि उनकी फिल्में अकसर बीमारी, ट्रेड यूनियनवाद, वेश्यावृत्ति, पशु कल्याण आदि विषयों को उठाते हुए व्यापक पारिवारिक रिश्तों के दायरे में प्रेम को स्थापित करती हैं. उन्हें अगर सिर्फ रोमांटिक हीरो के रूप में याद किया जाता है, तो शायद इसलिए कि उनके काम का सही आलोचनात्मक मूल्यांकन नहीं हुआ है और ऊपरी तौर पर मान लिया गया है कि अमिताभ के उभार ने उनके ऊपर ग्रहण लगा दिया था.

हिंदी फिल्मों के इतिहास में उन पर फिल्माए गए गाने शायद सबसे रूमानी हैं, लेकिन उन्हें भी राजेश खन्ना के समग्र काम के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए.

मैं कई बार बांद्रा के कार्टर रोड पर राजेश खन्ना के बंगले आशीर्वाद के पास से गुजरी हूं. वह काफी उपेक्षित-सा था. मैं खन्ना और हिंदी फिल्मों में स्टारडम के बारे में सोचने पर मजबूर हो गई. निजी मामलों में उनके और परिजनों की गरिमापूर्ण चुप्पी की मैं कायल रही हूं. अंतिम समय में जब सभी एक साथ आए तो देख कर खुशी भी हुई.

साठ के दशक के अंत और सत्तर के दशक की शुरुआत में एक गैर शहरी पुरुष की छवि से स्टारडम तक का सफर खन्ना के काम के आलोचनात्मक मूल्यांकन की मांग करता है. हिंदी फिल्मों के बारे में लिखने वाला कोई भी व्यक्ति उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता.

हाल ही में मैंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक परचा पढ़ा था, जिसमें मेरी पसंदीदा फिल्म हाथी मेरे साथी (निर्देशकः एम.ए. तिरुमुगम, 1971) के बारे में कई बातें थीं. इनसानों और जानवरों के बीच फर्क पर फिल्म में सवाल उठाया गया है और राजेश खन्ना इकलौते शख्स हैं जो जानवरों का सम्मान करते हैं और उनके प्यार, समर्पण को समझते हैं.

फिल्म में राजू और उसके हाथियों पर गणेश की कृपा दिखाई गई है, जिसकी परिणति यह होती है कि इनसानी क्रूरता और अविश्वास का शिकार होने के बावजूद अंत में राजू पर परिवार का भरोसा लौट आता है. आज भी खतरे में पड़े जानवरों की रक्षा के लिए सरकारों को यह प्रेरणा देती है. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति देः प्यार की दुनिया में खुश रहना मेरे यार.

(ड्वायर यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के एसओएएस में भारतीय संस्कृति और सिनेमा की प्रोफेसर हैं)

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