कहते हैं कि अकबर से संघर्ष के दिनों में जंगलों की खाक छानते हुए मेवाड़ के महाराणा प्रताप का दिल एक दिन विचलित हो गया और उन्होंने अकबर को संधिपत्र लिखने का मन बना लिया. यह बात जब राजस्थानी के कवि पृथ्वीराज राठौड़ को पता चली तो अकबर की सेवा में रहते हुए भी उन्होंने महाराणा प्रताप को उलाहना भरी एक कविता भेजी, जिसका अर्थ था कि मैंने सुना है कि आज सूरज ने बादलों की ओट में छुप जाने का और शेर ने गीदड़ों के साथ रहने का मन बना लिया है.
इस कविता ने महाराणा प्रताप को नई ऊर्जा दी और उन्होंने आजादी के संघर्ष की मशाल जलाए रखी. क्या कोई आसानी से स्वीकार कर सकेगा कि जिस राजस्थानी भाषा की कविता ने महाराणा प्रताप की स्वातंत्र्य चेतना को नए सिरे से आलोकित किया था, उस भाषा को अभी तक संवैधानिक मान्यता के लिए तरसना पड़ रहा है?
राजस्थानी के लोकप्रिय रचनाकार ईसरदास बारहठ को तो समाज में इतना सम्मान प्राप्त था कि 'ईसरा सो परमेसरा' कहकर उन्हें परमेश्वर के समकक्ष रखा जाता था. नरहरिदास और ईसरदास के ग्रंथों का कई घरों में आज भी वैसे ही पारायण होता है, जैसे हिंदीभाषी प्रदेशों में रामचरित मानस का. हमारे दौर के ही महत्वपूर्ण रचनाकारों की बात करें तो विजयदान देथा, लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत, कन्हैया लाल सेठिया, सी.पी. देवल, रेवतदान चारण, सांवरदइया, जनकवि उस्ताद तक रचनाकारों की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने लोक की इस भाषा में कालजयी साहित्य की रचना की. राजस्थानी का साहित्य दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है. राजस्थानी भाषा, साहित्य के संवर्धन/संरक्षण के लिए राज्य में एक पृथक अकादमी है, फिर भी इस भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में जगह नहीं मिल रही है.
आजादी से पहले तक राजस्थानी भाषा को मुड़िया लिपि में लिखा जाता था. कुछ राष्ट्रीय नेताओं की अपील पर राजस्थान के नेताओं/ विद्वज्जनों ने देवनागरी लिपि को ही अपनाने का फैसला किया. नतीजाः मुड़िया लिपि धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गई. आज गिनती के बचे हैं इस लिपि को पढ़ने वाले. पर राजस्थानी में लिखने वालों की संख्या हाल के दिनों में तेजी से बढ़ी है. शहरी वर्ग में राजस्थानी बोलने वाले अपेक्षाकृत घटे हैं, फिर भी राजस्थानी बोलने वालों की संख्या संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कई भाषाओं से बहुत ज्यादा है.
सेठिया का यह दोहा राजस्थानी की मान्यता के आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया हैः ‘खाली धड़ री कद हुवै मूण्डै बिन पैछाण/ राजस्थानी के बिना गूंगो राजस्थान.’ उम्मीद है, डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, सेठिया, रावत सारस्वत जैसे विद्वानों के उठाए राजस्थानी की मान्यता के सवाल को जल्द समाधान मिलेगा.
अतुल कनक को उनकी पुस्तक जूण जातरा के लिए इस बार केंद्रीय साहित्य अकादमी का राजस्थानी का पुरस्कार मिला है

