उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भले ही सीटों के लिहाज से कोई खास फायदा न हुआ हो, लेकिन इससे कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को जरूरी सियासी सबक जरूर मिल गया है. यह है- वरिष्ठ नेताओं की गुटबाजी पार्टी का बेड़ा गर्क करती है. 2013 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए राहुल जब छत्तीसगढ़ पहुंचे तो उन्होंने साफ कहा कि वरिष्ठ नेता गुटबाजी बंद करें. आखिर पार्टी छत्तीसगढ़ में चुनाव क्यों हारी जहां उसके पास कार्यकर्ता और जनाधार दोनों हैं?
ये कौन से वरिष्ठ नेता हैं, जिनकी गुटबाजी ने राहुल को इतना परेशान कर दिया है? इस सवाल पर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल ने कहा 'मैं वरिष्ठ नेता नहीं हूं. प्रदेश में सात वरिष्ठ नेता हैं- चरण दास महंत, मोहसिना किदवई, मोतीलाल वोरा, विद्या चरण शुक्ल, अजीत जोगी, अरविंद नेताम और परशुराम भारद्वाज.' हालांकि गुटबाजी के सवाल पर पटेल ने बड़ी सफाई से कहा, 'नेता पहले भी एकजुट थे और अब राहुल जी ने कह दिया है तो और एकजुट होकर काम करेंगे. अगर दो चुनाव हारे हैं तो कहीं ना कहीं कमी तो रही ही होगी.'
वैसे कहने को सात नेता वरिष्ठ हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में अजीत जोगी और चरणदास महंत गुट हावी हैं. इसके अलावा कभी महंत गुट के करीबी रहे पटेल का भी अपना गुट हो गया है. उधर, राहुल की यात्रा के दौरान ही राज्य से मनोनीत एंग्लो-इंडियन लोकसभा सांसद इंग्रीड मैक्लाउड ने जिस तरह छोटे से मुद्दे को तूल देकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया और प्रदेश प्रभारी बी. के. हरिप्रसाद ने उसे अनुशासनहीतना बताते हुए स्वीकार भी कर लिया, उससे साफ है कि पार्टी में अहम का टकराव उफान पर है.
कांग्रेस की राह इतनी आसान नहीं है. गुटबाजी के सवाल पर विधानसभा में विपक्ष के नेता रवींद्र चौबे ने कहा, 'बस यही तीन गुट हैं, इससे ज्यादा नहीं. राहुल जी के आह्वान के बाद पार्टी पूरी तरह एकजुट होकर काम कर रही है.' इन तीनों गुटों की ताजा स्थिति को देखें तो अजीत जोगी का कद पहले से कम हुआ है. पार्टी के एक वरिष्ठ विधायक कहते हैं, '2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में जोगी की खूब चली लेकिन पार्टी दोनों चुनाव हार गई. ऐसे में 2013 के चुनावों में उनकी दावेदारी कमजोर होना तय है.' इस बार चरणदास महंत को उम्मीद है कि उन्हें आलाकमान की ओर से तरजीह मिलेगी. रहा सवाल पटेल का तो संगठन को मजबूत करने की कोशिश के लिए खुद राहुल गांधी ने एनएसयूआइ के कार्यक्रम में उनकी पीठ थपथपाई. लेकिन कांग्रेस जैसी पार्टी में पीठ थपथपाने और सिर पर मुकुट सजाने में कितना फर्क है, यह बताने की जरूरत नहीं है.
अब पार्टी के सामने सवाल यही है कि क्या वह अपना घर संभाल पाएगी? वैसे कांग्रेस को पिछले चुनाव में भाजपा से 1.5 फीसदी ही कम वोट मिले थे. एकजुट कांग्रेस के लिए इस अंतर से पार पाना बहुत कठिन काम नहीं है, लेकिन एकजुट होना इससे ज्यादा कठिन है. देखें, राहुल का चुंबक क्या इन गुटों को चिपका पाता है, या फिर वही ढाक के तीन पात.

