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धुंध के बीच बढ़ रही सियासी सरगर्मी

इस बार सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही कांग्रेस सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल को दे सकती है कड़ी चुनौती. बादल पिता-पुत्र के लिए सत्ता में लौटना आसान नहीं होगा.

बादल पिता-पुत्र
बादल पिता-पुत्र
अपडेटेड 5 जनवरी , 2012

इस बार पंजाब में राजनैतिक पार्टियों के बीच घमासान मचने वाला है क्योंकि चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार के लिए उन्हें अब तक का सबसे कम समय दिया है.

30 जनवरी को 1,74,33,408 मतदाता विभिन्न पार्टियों के उम्मीदवारों की किस्मत वोटिंग मशीनों में बंद करने वाले हैं. उत्तर प्रदेश के महासंग्राम के बीच भी पंजाब का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

पंजाब के सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले और चार बार राज्‍य के मुख्यमंत्री रहे 84 वर्षीय प्रकाश सिंह बादल घोषणा कर चुके हैं कि यह उनका अंतिम चुनावी युद्ध होगा.

लेकिन जनता का फैसला यह तय करेगा कि उनके इकलौते बेटे और राजनैतिक उत्तराधिकारी उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल अपने पिता की विरासत संभाल पाएंगे या नहीं. पिछले कम-से-कम तीन वर्षों से वास्तविक मुख्यमंत्री रहे 49 वर्षीय सुखबीर के बारे में जानकारों का कहना है कि वे अगर शिरोमणि अकाली दल का नेतृत्व अपने हाथ में बनाए रखना चाहते हैं तो उन्हें हर हाल में यह चुनाव जीतना होगा.

लेकिन उप-मुख्यमंत्री के लिए खेल बिगाड़ने का काम उनके 49 वर्षीय चचेरे भाई मनप्रीत सिंह बादल कर रहे हैं. सुखबीर और प्रकाश सिंह बादल से मतभेदों के कारण अक्तूबर, 2010 में उन्होंने राज्‍य के वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद अकाली दल से रिश्ता तोड़ दिया था.

माना जाता है कि इस मतभेद की मुख्य वजह उत्तराधिकार की लड़ाई ही रही है. फिर मार्च में मनप्रीत ने पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब नाम से अपनी पार्टी बनाई. समझा जा रहा है कि यह नई पार्टी पंजाब के मालवा क्षेत्र यानी दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम गढ़ में शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) का खेल बिगाड़ सकती है.

एक ऐसे राज्‍य में जहां गेहूं और धान की फसल की तरह बारी-बारी से सरकारें बदलती रहती हैं, पूर्व मुख्यमंत्री 69 वर्षीय कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पंजाब कांग्रेस को 2012 में अपनी वापसी की पूरी उम्मीद है.

एसएडी-भाजपा के कुशासन, वादे पूरा न करने और अपनी पार्टी के लोगों के खिलाफ राजनैतिक दुश्मनी निभाने का आरोप लगाते हुए अमरिंदर सिंह कहते हैं, ''सत्ता में बादल पिता-पुत्र की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.''

लेकिन कांग्रेस को खास तौर से शहरी इलाकों में झटका लग सकता है, जहां निम्न मध्यम वर्ग के पढ़े-लिखे लोगों की एक बड़ी संख्या में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटालों और अण्णा हजारे के साथ केंद्र के दुर्व्यवहार से खासी नाराजगी है.
पंजाब विधानसभा में पार्टियों की स्थिति
वर्ष कांग्रेस एसएडी भाजपा अन्य
2007 44 48 19 05*
2002 62 41 03 10
1997 14 75 18 10
1992 97 02** 06 22+
1985 31 73 06 07
1980 63 37 01 16
1977 17 59 24*** -
*  मनप्रीत के इस्तीफे के कारण एक सीट खाली** एसएडी (पंथिक) ***जनता पार्टी    +इनमें से 9 बसपा के

पंजाब भाजपा के वरिष्ठ नेता मनोरंजन कालिया को पूरा विश्वास है कि महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर जनता की नाराजगी के आगे सत्ता-विरोधी भावनाएं दब जाएंगी.

लेकिन कोई जोखिम न उठाते हुए बादल सरकार चुनाव की संहिता के डर से पूरे दिसंबर भर अपनी पसंद की जगहों पर पुलिस अधिकारियों और अफसरों के तबादलों में जुटी रही.

23 दिसंबर को चुनाव तारीखों की घोषणा से ठीक एक दिन पहले आइएएस और पंजाब सिविल सेवा के 24 अधिकारियों के तबादले किए गए. कुछ पुलिस अधिकारियों के तबादले भी इसी अंदाज में किए गए.

हालांकि चुनाव आयोग ने कुछ तबादलों को निरस्त कर दिया. चुनाव संहिता से घंटा भर पहले पेट्रोल और डीजल पर शुल्क खत्म करने के फैसले को भी फिलहाल रोक दिया गया है.

चुनाव आयोग पूरी सख्ती बरत रहा है. राज्‍य में कई जगहों पर छापे मारकर करोड़ों रु. की अवैध रकम जब्त की गई है. सत्ताधारी एसएडी-भाजपा गठबंधन और विपक्षी कांग्रेस दोनों को अपनी जीत का पूरा भरोसा है.

अपनी पार्टी के प्रचार की अगुआई करते हुए सुखबीर बादल दावा करते हैं कि उनकी पार्टी अगले 25 साल तक राज करती रहेगी, जबकि अमरिंदर सिंह अपने विरोधियों को धूल चटाने की बात करते हैं.

ऐसे में पंजाब के लोगों को जोशीले नारों और नेताओं के बीच एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के कारण कड़ाके की ठंड में भी राजनैतिक गर्मी का अनुभव होने वाला है.

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