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निजी सुरक्षा का सार्वजनिक अभिशाप

इंदिरा गांधी की हत्या ने हमारे देश का सुरक्षा परिदृश्य बदल दिया. राजीव गांधी की हत्या के बाद चुनाव में प्रत्याशियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो गई.

अपडेटेड 29 जनवरी , 2012

कई राज्‍यों में जारी चुनाव अभियानों ने एक बार फिर हमारे देश में सत्ता और निजी सुरक्षा के विशेषाधिकार के संबंधों को केंद्र में ला दिया है. मुझे बताया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी के करीब होने के चलते उत्तर प्रदेश में सुरक्षा तामझाम के साथ उतर रहे तमाम नेता अपने अंगरक्षकों के चलते बा'बल का अधिकतम असर पैदा कर रहे हैं. इसमें राज्‍य के नेताओं का सुरक्षा तामझाम तो अपनी जगह है ही.

11 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

भारत में निजी सुरक्षा के विकास के सूत्र तलाशना दिलचस्प होगा. एक समय था जब प्रधानमंत्री सहित किसी का भी इतने तामझाम वाला सुरक्षा इंतजाम नहीं होता था. मुझे '80 के दशक की शुरुआत की एक घटना अच्छी तरह याद है. मेरी सास हम लोगों के पास दिल्ली आई थीं. मैंने उन्हें शहर घुमाने के लिए एक दिन की छुट्टी ली थी. मैं कार चलाकर साउथ ब्लॉक पहुंचा और प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवेश द्वार पर कार खड़ी कर कोई जरूरी काम निबटाने अंदर चला गया. मेरी पत्नी और सास कार में ही बैठी हुई थीं. जब मैं वापस लौटा तो मेरी सास भावविभोर थीं-प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लंच के लिए घर जाते हुए हमारी कार की बगल से गुजरी थीं.

04 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

आज प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवेश द्वार के पास कहीं भी कार खड़ी करने की कल्पना लगभग असंभव है. जैसा हम सभी जानते हैं, इंदिरा गांधी की हत्या की घटना ने भारत के सुरक्षा परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया. सात साल बाद एक चुनाव अभियान में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कई मायनों में आजकल चुनाव के दौरान प्रत्याशियों और प्रचारकों की सुरक्षा व्यवस्था के अति-रक्षात्मक होने के लिए जिम्मेदार है.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

मगर उसके बहुत पहले से ही सुरक्षा के लिए पात्रता न सिर्फ नेताओं में बल्कि अधिकारियों के बीच भी स्टेटस सिंबल बन गई थी. जब सुरक्षा के वर्गीकरण पर शुरुआती विचार-विमर्श चल रहा था तो इंटेलिजेंस ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक एम.के. नारायणन को सुरक्षा जोखिम के श्रेणीकरण को उलटे क्रम में रखने का अभिनव विचार सूझा. सबसे उच्च श्रेणी का नाम 'ए' रखे जाने के सामान्य व्यवहार के विपरीत सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी का नामकरण उन्होंने 'जेड' किया. ऐसी उम्मीद की गई थी कि इस वर्गीकरण का पालन किए जाने से अहंकार और रुतबे पर आधारित उच्चतर सुरक्षा के लिए मांग कम-से-कम होगी. बहरहाल, सुरक्षा की चाह रखने वाले वर्ग को इस तिकड़म में ज्‍यादा दिन तक नहीं फांसा जा सका. एक बार 'राज' उजागर हो जाने के बाद हर किसी ने उच्चतम, 'जेड' नहीं बल्कि 'जेड प्लस' श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था की फरियाद शुरू कर दी.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए स्थापित स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) के गठन के दौरान काफी विचार-विमर्श चला. इसके पहले निदेशक डॉ. एस. सुब्रमण्यम कायदे-कानून पर जोर देने वाले शख्स थे. उन्होंने राजीव गांधी से स्पष्ट कह दिया था कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा से संबंधित मामलों में, प्रधानमंत्री की नहीं बल्कि एसपीजी के निदेशक की चलेगी. प्रधानमंत्री के नजदीकी सुरक्षा घेरे के लिए विभिन्न केंद्रीय पुलिस संगठनों और आइपीएस से चुने गए युवा अधिकारी स्मार्ट और बेहतर ढंग से शिक्षित-प्रशिक्षित थे. सफारी सूट तब निजी सुरक्षा अधिकारी की पहचान बन गया. फिर हर मुख्यमंत्री ने अपनी सुरक्षा में ऐसा ही तामझाम शुरू कर दिया. दुर्भाग्य से कई लोग यह भी मानने लगे कि यदि कोई पुलिसकर्मी सफारी सूट पहन ले तो वह खुद-ब-खुद काबिल निजी सुरक्षा अधिकारी बन जाता है.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

चुनाव आयोग ने चीजों को व्यवस्थित करने के लिए बहुत मेहनत की है. सुरक्षा दस्ते के वाहनों के उपयोग के संबंध में दिशा-निर्देश बहुत स्पष्ट हैं. चुनाव के दौरान मंत्री या किसी भी राजनैतिक पदाधिकारी को पायलट कार इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होती, भले ही राज्‍य प्रशासन ने उसे सशस्त्र अंगरक्षकों की मौजूदगी वाला सुरक्षा कवर प्रदान कर रखा हो. चुनाव की निगरानी में दूरदराज के राज्‍यों से विभिन्न सेवाओं के अधिकारी जुटाए जाते हैं ताकि कोई पक्षपात न हो. इसी तरह दूरदराज के जिन राज्‍यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां चौकियों को मजबूत करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल को भारत के एक सिरे से दूसरे तक भेजा जाता है. इस समय पंजाब के चुनाव में केरल सशस्त्र पुलिस बल की आठ कंपनियां तैनात हैं.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों की चौकसी, चुनाव के समय निजी सुरक्षा को ताकत के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने में कमी ला सकती है. मगर यह शाश्वत समस्या है, जिसका जनता की सेवा करने की पुलिस की क्षमता पर असर पड़ता है. इसका स्थायी समाधान तभी मिल सकता है जबकि हमारे विश्लेषक जोखिम का नितांत प्रोफेशनल ढंग से कोई आकलन दे पाएं और उच्च जोखिम श्रेणी में आने वाले हर व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा रणनीति को दुरुस्त किया जाए. हमें एक प्रच्छन्न और कम तामझाम वाले (प्रधानमंत्री को छोड़कर) दृष्टिकोण पर विचार करने की जरूरत है, जिसे इस देश के खुफिया प्रमुख स्वयं अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. समस्या यही है कि चर्चा में रहने के इच्छुक लोगों के लिए कम तामझाम वाली यह सुरक्षा शायद किसी काम की न हो.

सेवानिवृत्त आइपीएस अधिकारी होर्मिस थारकन केरल पुलिस और रॉ के प्रमुख रह चुके हैं.

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