यह सवाल बहस के लायक थाः क्या सरकार को किसी संकट को रोकने के लिए झ्टपट कोई एहतियाती कदम उठाना चाहिए; या फिर इंतजार करने की समझदारी दिखानी चाहिए, अपना वक्त लेना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या संकट आपके दरवाजे पर आते आते किसी खाई में गिरकर आपका रास्ता हमवार कर देगा? न्यूयॉर्क में एक दोस्ताना लंच के दौरान यह बातचीत काहिरा के तहरीर स्कवायर के संदर्भ में हो रही थी, लेकिन बड़ी आसानी से यह संदर्भ दिल्ली का जंतर मंतर भी हो सकता था.
सत्ता के लंबे तजुर्बे ने कांग्रेस को इंतजार करना सिखा दिया है. धीरेधीरे काफी कुछ हो सकता है. चुनौती की हवा निकल सकती है, अदृश्य ताकतें उसे भटका सकती हैं, अस्वाभाविक नेतृत्व से वह दोफाड़ हो सकती है. जब कामचलाऊ जुगत से ही काम निकल जाता हो तो दीर्घकालिक रणनीति क्यों बनाई जाए?
शीर्ष पर बैठे लोग न्यूनतम मौखिक दखल तक खुद को सीमित रखते हैं, हंगामा मचाने का काम बीच की पांत के उन नेताओं के जिम्मे छोड़ देते हैं, जिन्हें एक झटके में नकारा जा सकता हैः ऐसे मंत्री जिनमें खास राजनैतिक दम न हो, या असहाय प्रवक्ता जिन्हें हवा में गांठ बांधने की कला सिखाई जाती है. जब आप हर रोज बोलेंगे तो कौन सुनेगा? और अगर कोई सुन ही ले, तो बात किसे याद रहती है?
समय अमूमन सरकार का संगी होता है. सरकार शांत हाथियों की चाल चलना पसंद करती है; और कांग्रेस ऐसा हाथी है जिसकी याददाश्त बड़ी तेज है, जो बड़ेबड़े डग भरता है, संस्थागत तरीके से बरताव करता है, और जिसमें मौका मिलने पर अपने दुश्मन की खोपड़ी बेधड़क कुचलने की अनैतिक क्षमता है. लेकिन इस तरह का हाथी केले के छिलके पर रपट जाए तो क्या कहेंगे? यह मजाक है या त्रासदी?
यह उस निर्मम दर्शक के लिए शायद दोनों है जिसके पास रंगभूमि का स्थायी पास है, और वह दर्शक मतदाता है. भले ही वह हाथी फिर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए परउसकी मर्यादा तो गई ही, उसके गौरव की भी हवा निकल जाती है.
यूपीए सरकार खास तरह से रपटी है, वह बारबार केलों के समूह को ही न्यौता दे रही थी मानो एक या दो उसके भारी कदमों को फिसलाने के लिए काफी न हों. उसकी घातक चूक यह थी कि उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत के गुस्से के बारे में पूरी तरह गलत अंदाज लगा लिया. उसने इस चुनौती को तबाह विपक्ष का एक और हथकंडा मानकर खारिज कर दिया, या उससे भी ज्यादा उसे राष्ट्रीय मानस के पीछे झंकता कोई दक्षिणपंथी वेताल मान लिया. उसने ठीक उसी तरह सरकार समर्थक तत्वों को इस काल्पनिक षड्यंत्र के खिलाफ 'आ'आ करने को उकसाया जैसा उसने करीब चार दशक पहले जयप्रकाश नारायण के मामले में किया था. देशभर में गूंज रही दहाड़ जनता की आवाज है, किसी सियासी पार्टी की नहीं.
घिरी 'ई सरकार पीछे हटकर 'एकाउस्टिक शैडो' यानी ऐसे आवरण में चली जाती है जहां ध्वनि तरंगें भी नहीं पहुंच पातीं. यह युद्धकला की शब्दावली है. यह साया ऐसा अनजाना क्षेत्र होता है, जहां से आप तोप के गोले दगते तोदेख सकते हैं, लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती हालांकि वह धमाका काफी दूर तक सुनाई देता है. यह वस्तुतः निराकार जैसी स्थिति है, यह उस क्षमता को संज्ञाशून्य कर देती है जो किसी खतरनाक हकीकत को भांप सकती है. इस तरह वह साया मानसिक सुकून का दायरा बन जाता है. यूपीए इसी दायरे में सिमटी है.
डॉ. मनमोहन सिंह अगर पूरी तरह शंकालु होते तो इस संकट में ज्यादा सुकून महसूस कर सकते थे. वे बचीखुची प्रतिबद्धता की महंगी कीमत चुका रहे हैं, जो यूपीए के बने रहने की राजनीति के लिए बिल्कुल माकूल नहीं है. अगर सारी राजनीति में रंगमंच का रंग चढ़ जाए तो उसके मुख्य पात्र गंभीर नाटक के लिए जरूरी हो जाएंगे.
डॉ. सिंह पांच भाग वाली शोकांतिका में प्रमुख पात्र हैं, लेकिन न तो मैकबेथ, न ही ओथेलो. हैमलेट की तरह संघर्ष करते डॉ. सिंह के व्यक्तित्व में उभरता विभाजन देखा जा सकता हैः करें या न करें. उनका स्वभाव उनसे कहता है करो; फिर उनके वकील आ धमकते हैं और उन्हें सुझाते हैं कि वे लफ्फाजी या उलटसुलट ब्यौरों से वक्त निकालें, मानो यह देश बहस करने वालों की बिरादरी से बढ़कर कुछ न हो. भारत डॉ. सिंह से कार्रवाई की उम्मीद करता है; उनके वकील मंत्री उन्हें तर्क करने को कहते हैं.
डॉ. सिंह से सहानुभूति रखने वाला उनकी मजबूरी समझ सकता है पर जनता माफ नहीं करेगी. कार्रवाई से उनके गठबंधन को जोखिम है. दूरसंचार मामले में ए. राजा की गिरफ्तारी से द्रमुक के साथ कांग्रेस का लचीलापन पहले ही टूट के कगार पर पहुंच चुका है; अगला हिस्सा करुणानिधि परिवार की तरफ है.
आप बलि के बकरे का चाहे जितना बुरा हाल कर दें पर उस मंदिर के पुरोहित की आलोचना नहीं कर सकते जिसके साथ आपने प्रार्थना की है. शरद पवार जैसे मिडिलवेट अब भी जवाबदेही का इंतजार कर रहे हैं. क्या डॉ. सिंह मई में विधानसभा चुनाव के बाद बहुप्रचारित मंत्रिमंडल फेरबदल में पवार को बाहर कर सकते हैं? नहीं.
सरकार यथास्थिति के दलदल में फंस गई है, और यह यथास्थिति सड़ानेगलाने वाली हो गई है. गैंगरीन एक ओर जहां कांग्रेस के अंग बेकार कर देगा वहीं सहयोगियों को भी पंगु बना देगा. इससे बचने का एक ही रास्ता है कि जोरदार कार्रवाई की जाए, जिसकी संभावना नहीं है, या आम चुनाव हो, जो नामुमकिन है.
सिद्धांततः यूपीए को कोई खतरा नहीं है. लेकिन सरकारें शासन करने के लिए चुनी जाती हैं, महज बने रहने के लिए नहीं. भारतीयों के मौजूदा मानस ने राजकाज को सिर्फ एक मांग तक निथार दिया हैः भ्रष्टाचार खत्म करो, या कम से कम उसे काबू करो. डॉ. सिंह ने इस संकट से महीनों पहले सीधे निबटने की बजाए संकट को धीरेधीरे बढ़ने दिया. कहा जाता है, वक्त किसी का इंतजार नहीं करता; लेकिन यह उन लोगों का और भी इंतजार नहीं करता जो अपनी घड़ी आने का इंतजार करते हैं.

