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बिजली की किल्‍लत: जून में अंधेरा

बिहार में सुखद वैवाहिक जीवन की सबसे नई चाभी है-दहेज के सामान में एक इन्वर्टर देना. पटना के 37 साल के इन्वर्टर मैकेनिक शंभू कुमार से पूछिए.

अपडेटेड 6 जून , 2011

बिहार में सुखद वैवाहिक जीवन की सबसे नई चाभी है-दहेज के सामान में एक इन्वर्टर देना. पटना के 37 साल के इन्वर्टर मैकेनिक शंभू कुमार से पूछिए.

शंभू ने एक प्रसिद्ध ब्रांड के इन्वर्टर बेचने वाले एक फ्रेंचाइजी के यहां अपनी वर्षों पुरानी नौकरी छोड़कर अपनी दुकान खोल ली है. शंभू कहते हैं, ''ब्लैकआउट के इन महीनों में इन्वर्टर एक घरेलू जरूरत की चीज है. वास्तव में अगर आप बिहार में शादी कर रहे हैं, तो दहेज में मांगी जाने वाली चीजों में सबसे नई शामिल होने वाली चीज यही है.''

अप्रैल के अंतिम सप्ताह में, बिहार के भोजपुर, गोपालगंज और भागलपुर जिलों में नाराज लोग बिजली आपूर्ति की बेहद खस्ता हालत के खिलाफ विरोध जताते हुए सड़कों पर उतर आए. भागलपुर के कुछ उप-खंडों में दिन में सिर्फ एक घंटा बिजली आती है. गोपालगंज में शहर के मोहनिया चौक पर जमा बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हवा में गोलियां चलानी पड़ीं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्‍य को पर्याप्त बिजली आवंटित न करने के लिए केंद्र को दोषी ठहराते हैं.

तमिलनाडु में बिजली की जबरदस्त कमी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गई. द्रमुक ने भले ही भ्रष्टाचार से नाराज हुए मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त में टेलीविजन बंटवाए हों, लेकिन राज्‍य के लगभग हरेक  हिस्से में कम-से-कम तीन घंटे की विद्युत कटौती ने मतदाताओं से उनके पसंदीदा कार्यक्रम देखने का मौका ही छीन लिया. सरकार ने अपने से पिछली सरकार पर दोष मढ़ने की कोशिश की. यह बहाना लोगों के गले नहीं उतर सका.

इन गर्मियों में बिजली की इस जबरदस्त किल्लत के लिए दोषी कौन है? जो सरकार में हैं उन्हें किसी और पर दोष दे देना बहुत आसान लगता है. राज्‍य केंद्र को दोषी बताते हैं. केंद्र राज्‍यों को दोषी बताता है. बिजली संविधान की समवर्ती सूची में है. राज्‍य और केंद्र दोनों बराबर के दोषी होने चाहिए.

बिजली के उत्पादन में कमी का इल्जाम केंद्र को अपने सिर लेना चाहिए. सरकार के अपने आकलनों के अनुसार बिजली की मांग और आपूर्ति का अधिकतम अंतर (पीक पावर डेफिसिट) 2010 की गर्मियों में 10.8 प्रतिशत था. उपलब्ध बिजली का अकुशल ढंग से वितरण करने की जिम्मेदारी राज्‍यों की बनती है.

देश भर में वितरण के दौरान हुई क्षति का औसत 30 प्रतिशत से अधिक होता है. केंद्र में विद्युत, पर्यावरण, कोयला और भारी उद्योग मंत्रालय क्षमता में वृद्धि की राह में विभिन्न तरीकों से रोड़े की तरह व्यवहार कर रहे हैं. राज्‍यों में, लोकलुभावन में जुटी सरकारें और रीढ़विहीन नियामकों ने बीमार पड़े वितरण नेटवर्क को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया है.

हालात सुधरने के पहले और खराब होने की संभावना ज्‍यादा है. केंद्रीय विद्युत मंत्री के मुख्य सलाहकार निकाय-केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने 2012 से 2017 के बीच 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान एक लाख मेगावॉट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है.

जिस अर्थव्यवस्था के लिए 9 प्रतिशत वार्षिक की विकास दर की भविष्यवाणी की गई हो, उसे विद्युत संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए इतनी बिजली की जरूरत होगी. योजना आयोग इस लक्ष्य को स्वीकार करता है, लेकिन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश नहीं करते.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में 21 अप्रैल को हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में रमेश ने कहा था कि यह लक्ष्य 'पारिस्थितिक दृष्टि से अरक्षणीय' है. रमेश की चिंता यह है कि इस अतिरिक्त बिजली उत्पादन का जलवायु परिवर्तन पर क्या प्रभाव पड़ेगा. इस अतिरिक्त क्षमता का 70 प्रतिशत कोयला आधारित ताप ऊर्जा के जरिए होगा.

वैसे भी, पिछले 20 वर्ष के निराशाजनक रिकॉर्ड को देखते हुए रमेश को सरकार के लक्ष्य पूरे होने की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. योजना आयोग के आकलनों के अनुसार 1992 से 2007 तक, आठवीं, नवीं और दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में कुल लक्ष्यों का औसत मात्र 50.5 प्रतिशत प्राप्त किया गया.

इस दौरान देश के प्रत्येक बड़े राजनैतिक गठजोड़ ने देश पर राज किया है-कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और यूपीए किसी के भी पास बिजली क्षेत्र में कामकाज पर गर्व करने लायक कुछ नहीं है.

11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) का लक्ष्य पहले ही 78,700 मेगावॉट से घटाकर 62,374 मेगावॉट किया जा चुका है. 2012 खत्म होने में अभी डेढ़ साल बाकी है, और इस संशोधित लक्ष्य का भी महज करीब 50 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका है. यथार्थपरक बात यह है कि सरकार अगर 2012 के अंत तक मूल लक्ष्य का 60 प्रतिशत भी हासिल कर ले, तो यह बड़ी बात होगी.

उत्पादन में सबसे गंभीर अड़चन है कोयले की कमी. 2007 के अंत में, कोयले की मांग और आपूर्ति में अंतर 3.5 करोड़ टन था. 2012 के अंत तक यह अंतर 8.3 करोड़ टन हो जाने की संभावना है. योजना आयोग का मध्यावधि समीक्षा दस्तावेज कहता है कि   अगर कोयला आधारित सारे ऊर्जा संयंत्र योजना के अनुरूप समय पर चालू हो जाते, तो कमी और भी ज्‍यादा होती. 2017 तक कोयले की कमी 20 करोड़ टन के स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान है.

अप्रैल, 2010 से दिसंबर, 2010 के बीच ताप विद्युत क्षेत्र, जो भारत की कुल ऊर्जा के 60 प्रतिशत से ज्‍यादा का उत्पादन करता है, की वृद्धि दर 3.03 प्रतिशत की निराशाजनक दर पर रही, कुल ऊर्जा क्षेत्र की 4.5 प्रतिशत की वृद्धि दर से भी कम पर. सरकार इस समस्या को स्वीकार करती है.

2011 के सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, ''घरेलू आयातित कोयले की कमी से ताप विद्युत का उत्पादन प्रभावित हुआ.'' इस कमी का थोड़ा दोष पर्यावरण मंत्री पर डाला जा सकता है. 2009 में घोषित की गई रमेश की विवादास्पद 'प्रवेश के लिए वर्जित' नीति ने एक सघन वन क्षेत्र में खनन पर प्रतिबंध लगा दिया.

मंत्रालय ने नौ बड़े कोयला खनन क्षेत्रों में 35 प्रतिशत वन क्षेत्र को प्रवेश के लिए वर्जित घोषित कर दिया. इससे 203 ब्लॉक्स में खनन गतिविधियों पर तुरंत रोक लग गई, जहां 60 करोड़ टन की संभावित क्षमता थी. कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कहते हैं कि इस प्रतिबंध से बिजली उत्पादन पर 1,30,000 मेगावॉट तक का अंतर आ सकता है.

मामला अब खनन पर बनी मंत्रियों की एक समिति के पास है, जिसका नेतृत्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कर रहे हैं. रमेश के खिलाफ पासा पलट सकता है. जापान में परमाणु दुर्घटना का मतलब यह है कि ताप ऊर्जा फिर प्राथमिकता में आ गई है.

पुनर्वास को लेकर चिंताओं के कारण पनबिजली लगातार लड़खड़ा रही है. समझैते की मंशा जताते हुए रमेश ने अप्रैल में कहा था, ''कोई बीच का मार्ग निकालने के लिए मैंने कुछ सुझाव दिए हैं. इन पर अंतिम फैसला लेना मंत्रियों की समिति पर निर्भर है.'' जायसवाल का मंत्रालय भी समस्या का ही हिस्सा है.

कोयले का खनन दरअसल सरकारी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआइएल) का एकाधिकार है. निजी क्षेत्र की कंपनियां सिर्फ कैप्टिव माइनिंग करती हैं (अपनी स्वयं की इस्पात या ऊर्जा परियोजनाओं के लिए) और वे कोयले को बाजार में नहीं बेच सकतीं.

सार्वजनिक क्षेत्र के ज्‍यादातर मालदार उपक्रमों की तरह सीआइएल के पास उस कोयले का उत्पादन बढ़ाने की कोई वजह नहीं है, जो साल-दर-साल कम पड़ता जा रहा है.

जायसवाल इस समस्या को स्वीकारते हैं. अप्रैल में 'एनर्जाइजिंग इंडिया' सम्मेलन में उन्होंने कहा, ''अच्छा यह होता कि कोयला क्षेत्र को भी ऊर्जा क्षेत्र के सुधारों की तर्ज पर 1990 की दशक की शुरुआत में ही व्यावसायिक खनन के लिए खोल दिया जाता.'' वे स्वीकारते हैं कि मौजूदा प्रणाली देश की मांग को पूरा कर सकने में नाकाम रही है.

सुधारों का इंतजार है. उत्पादन में एक और गंभीर अड़चन है उपकरणों की कमी. ऊर्जा क्षेत्र पर कंसल्टिंग फर्म कव्पीएमजी द्वारा 2010 में तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार- ''दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत के क्षमता बढ़ाने के लक्ष्य हासिल नहीं कर सकने का एक महत्वपूर्ण कारण उपकरणों की कमी था. यह कमी मूल तौर पर बॉयलर, टरबाइनों और जनरेटरों के अहम पुर्जों की थी.''

2011 की आर्थिक समीक्षा में इस आकलन की पुष्टि की गई. लेकिन पूरी सरकार इस विषय पर एकमत नहीं है कि इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए. बिजली उत्पादन  करने वाली कंपनियों के लिए समाधान यही रहा है कि जरूरी उपकरणों को चीन से आयात कर लिया जाए. पिछले 2-3 वर्षों में करीब 32,000 मेगावॉट की क्षमता के निर्माण में पहले ही चीनी उपकरणों का इस्तेमाल हुआ है सीईए ने चीनी उपकरणों की गुणवत्ता और मूल्यों को मंजूरी दी है.

लेकिन चीनी उपकरणों की आवक ने भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) और लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) जैसे घरेलू उपकरण निर्माताओं के बीच खतरे की घंटियां बजा दी हैं. प्रतियोगिता के भय से, इन दोनों कंपनियों ने 2010 में चीनी उपकरणों के आयात पर शुल्क लगवाने के लिए दबाव डाला.

एलऐंडटी के अध्यक्ष ए.एम. नाइक ने 25 प्रतिशत शुल्क की मांग की. भेल के अभिभावक मंत्रालय-भारी उद्योग मंत्रालय-ने 14 प्रतिशत शुल्क की मांग की. सरकार ने योजना आयोग के सदस्य अरुण माइरा के नेतृत्व में एक पैनल गठित किया, जिसने आयातित ऊर्जा उपकरणों पर 14 प्रतिशत शुल्क लगाकर घरेलू निर्माताओं को संरक्षण देने का समर्थन किया.

सौभाग्यवश, वित्त मंत्रालय इस दबाव में नहीं आया. केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने ऊर्जा उत्पादकों की ओर से मजबूत हस्तक्षेप किया. शिंदे ने कहा, ''हमने आश्वासन दिया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत (31 मार्च, 2011) तक सरकारी और निजी ऊर्जा उत्पादकों को उपकरणों के आयात पर शुल्क का लाभ मिलता रहेगा.'' मामला अभी खत्म नहीं हुआ है और अगले साल इस पर फिर विचार होगा.

शुल्क लगाने से वे निजी निवेशक पीछे हट सकते हैं, जिन्होंने 2007 से 2012 के बीच अतिरिक्त क्षमता के सृजन में निर्णायक भूमिका अदा की है. आकलन है कि 32 प्रतिशत अतिरिक्त क्षमता का श्रेय उन्हें ही जाता है. उदारीकरण के 20 वर्षों में निजी क्षेत्र द्वारा ऊर्जा उत्पादन में यह सबसे बड़ा योगदान है.

निजी निवेशकों को यह बात भी भविष्य में पीछे हटने के लिए बाध्य कर सकती है कि राज्‍यों के विद्युत मंडल (एसईबी) व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक दरों पर बिजली खरीदने में असमर्थ हो सकते हैं. जब भारत के सबसे बड़े ताप विद्युत उत्पादक-राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) के विशुद्ध लाभ में 2010-2011 में मात्र 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई, तो एनटीपीसी के अध्यक्ष अरूप रॉय चौधरी ने पत्रकारों से कहा, ''हमने ऊर्जा संयंत्र उपलब्ध करा दिए थे, लेकिन एसईबी ने इन बिजलीघरों से बिजली नहीं खरीदी.

इससे बिजली का कम उत्पादन हुआ और नतीजतन कम राजस्व  मिला.'' एनटीपीसी के विद्युत उत्पादन कम करने से 2010-2011 में बिजली की 13 अरब यूनिट का नुक्सान हुआ. भारत का वार्षिक विद्युत उत्पादन लगभग 800 अरब यूनिट होने का अनुमान लगाया जाता है.

एनटीपीसी के विद्युत उत्पादन में की गई कटौती इसका 1.6 प्रतिशत है. अगर एसईबी को बिजली बेचना एनटीपीसी के लिए समस्या है, तो यह हर किसी के लिए समस्या ही होने की संभावना है. सारी राज्‍य विद्युत मंडलों का कुल जमा घाटा इस समय लगभग 70,000 करोड़ रु. है. 13वें वित्त आयोग ने अनुमान लगाया है कि यह आंकड़ा 2014 तक बढ़कर 1 लाख करोड़ रु. हो जाएगा.

इस घाटे के तीन मुख्य कारण हैं-बिजली की चोरी, मीटरिंग और बिलिंग की अनुपयुक्त प्रणालियां और उपभोक्ताओं से वसूली जाने वाली अव्यावहारिक दरें. पहले दो कारणों से लिए राज्‍य विद्युत मंडलों स्वयं जिम्मेदार हैं.

वितरण के दौरान तकनीकी और वाणिज्यिक क्षति का औसत अभी भी लगभग 30 प्रतिशत है. भारत में 95 प्रतिशत राज्‍य विद्युत मंडल अभी भी राज्‍य सरकारों के स्वामित्व में है, जिससे उनके घाटों पर काबू न पा सकने की वजह समझी जा सकती है-चूंकि घाटा सरकार भुगतती है, इसलिए उनके पास घाटे को काबू करने की कोई वजह ही नहीं है.

जिन कुछ राज्‍यों ने विद्युत वितरण का निजीकरण कर दिया है, उन्होंने शानदार नतीजों का प्रदर्शन किया है. निजी स्वामित्व वाली कोलकाता की सीईएससी के लिए कुल तकनीकी और वाणिज्यिक क्षति 14.3 प्रतिशत है, अहमदाबाद की टोरंट पॉवर के लिए 11 प्रतिशत है, दिल्ली की एनडीपीएल के लिए 14 प्रतिशत है और सीईएससी नोएडा के लिए मात्र 8 प्रतिशत है. दिल्ली शहर की सफलता को स्पष्ट करते हुए दिल्ली के ऊर्जा मंत्री हारून यूसुफ कहते हैं, ''इसके लिए तीन चीजों की जरूरत होती है-राजनैतिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और निजीकरण.''

लेकिन मात्र निजीकरण और तकनीकी और वाणिज्यिक क्षति में कटौती कर देना ही काफी नहीं है. दिल्ली की तीन निजी वितरण कंपनियों का कुल अब तक का घाटा 9,000 करोड़ रु. तक पहुंच चुका है. बीएसईएस राजधानी पॉवर लिमिटेड के सीईओ गोपाल सक्सेना कहते हैं, ''अगर टैरिफ में संशोधन नहीं किया जाता तो हम ऊर्जा प्रदाय की गुणवत्ता को बरकरार नहीं रख सकते.''

दिल्ली की वितरण कंपनियों को उपभोक्ता को दी गई प्रत्येक यूनिट पर 1.79 से 1.93 रु. का घाटा होता है. 20 बड़े राज्‍यों में (दिल्ली और ओडीसा को छोड़कर) वितरण कंपनियों की वित्तीय निष्पत्ति को लेकर योजना आयोग द्वारा किए गए आकलन में बताया गया है कि उपभोक्ता को दी गई प्रत्येक यूनिट बिजली पर 2009-10 में औसत 90 पैसे का घाटा होता था. 2005 से 2010 के बीच बेची गई प्रत्येक यूनिट बिजली पर घाटा एक रु. से 80 पैसे के बीच रहा है.

आम धारणा के विपरीत, भारतीय उपभोक्ता औसत तौर पर प्रत्येक यूनिट बिजली के लिए उन देशों की तुलना में कहीं कम भुगतान करता है, जो आमदनी और संसाधन-दोनों दृष्टियों से ज्‍यादा संपन्न हैं.

कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका में 12 से 15 सेंट और अधिकांश यूरोप व विकासशील विश्व में 19-20 सेंट की तुलना में भारत में वसूला जाने वाला औसत टैरिफ 8 अमेरिकी सेंट है. पूर्व ऊर्जा सचिव अनिल राजदान कहते हैं, ''हमें विकसित देश की तरह सोचना शुरू करना होगा. यह अंतर्निहित बात है कि बिजली शुल्क का नियमन हों.''

पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक वी.के. शुंगलू के नेतृत्व वाली एक समिति वितरण कंपनियों को होने वाले घाटे को कम करने के तरीकों की सिफारिश करने पर काम कर रही है. बताया जाता है कि इन सिफारिशों की सूची में शीर्ष पर उन निष्क्रिय राज्‍य विद्युत नियामक प्राधिकरणों पर कार्रवाई करने की जरूरत है, जो दरअसल में टैरिफ निर्धारित करती हैं.

नियामक प्राधिकरणों के पास वैधानिक स्वायत्तता होती है, लेकिन आम तौर पर वे राज्‍य सरकार के दबाव में काम करती हैं. मसलन, तमिलनाडु में टैरिफ पुनरीक्षण 7 साल से नहीं हुआ है. दिल्ली में टैरिफ पुनरीक्षण 3 साल से नहीं हुआ है. इसे बदलना होगा. नेताओं, नियामकों और नागरिकों को व्यवहार्य टैरिफ की जरूरत को समझाना होगा.

एक अन्य चीज जिससे निजी निवेशकों का प्रेरित होना तय है, वह है 'खुली पहुंच' का सिद्धांत, जिसमें वे बिक्री के लिए किसी एक राज्‍य विद्युत मंडल के बंधक नहीं हैं. सभी राज्‍य विद्युत मंडल भी बिजली खरीद के लिए अपने राज्‍य से बाहर तलाश करने के लिए स्वतंत्र हैं.

2009-10 से लागू इस सुविधा का लाभ कई निकाय पहले ही उठा रहे हैं. देशव्यापी पारेषण नेटवर्क का विस्तार करके इसे प्रभावी बनाने के लिए काफी कुछ किए जाने की जरूरत है. तब नीतीश कुमार के पास कम केंद्रीय आवंटन की शिकायत करने की कोई वजह नहीं होगी. उनका राज्‍य विद्युत मंडल कमी की पूर्ति करने के लिए बिजली खरीदने में समर्थ होगा.

अभी तक अंतर-क्षेत्रीय हस्तांतरण क्षमता सिर्फ मात्र 22,400 मेगावॉट की है. ऊर्जा क्षेत्र में बाकी तमाम चीजों की तरह, यहां भी कार्य प्रगति पर है, और भूमि अधिग्रहण की समस्याओं के कारण अटक रहा हो सकता है.

इस सब के बीच, झारखंड में बिजली की स्थिति की बात करें तो जहां 2,500 से 3,00 मेगावाट बिजली की जरूरत है, वहीं कुल उपलब्धता सिर्फ 800 मेगावाट ही है.

बिजली का केंद्रीय आवंटन भी 291 मेगावाट से अधिक नहीं है. राज्‍य में प्रतिव्यक्ति विद्युत की खपत 300 यूनिट है. इस पूरे परिदृश्य को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि 2016-17 तक खपत का यह लोड 3,500 मेगावाट तक पहुंच जाएगा. राज्‍य में बिजली की कमी की मुख्य वजहें प्रेषण, वितरण और बिजली चोरी हैं. इस बारे में झारखंड के विद्युत सचिव एस.के. सत्पथी कहते हैं, ''अगर हमारी नजर प्रति व्यक्ति बिजली के उपभोग को 1,000 यूनिट पर ले जाने की है तो हमें 30,000 करोड़ रु. की जरूरत होगी और यह सिर्फ निजी क्षेत्र के जरिए ही हासिल किए जा सकते हैं.''

यही नहीं, पिछले दस सालों झारखंड में एक मेगावाट बिजली तक का उत्पादन शुरू नहीं हुआ है. इसकी मुख्य वजह झारखंड राज्‍य विद्युत बोर्ड में भ्रष्टाचार है जिसकी जांच हाइकोर्ट के आदेश पर सीबीआइ कर रही है. पिछले दस साल में विद्युत उत्पादन की तकनीक को अद्यतन करने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं. जेएसईबी को अन्य राज्‍यों से 230 करोड़ रु. की बिजली  खरीदनी पड़ती है.

एक ओर जहां देश भर समेत बिहार में बिजली का संकट बरकरार है, वहीं बिहार के उपभोक्ताओं के लिए बुरी खबर भी है. बिहार विद्युत विनियामक आयोग के अध्यक्ष उमेश नारायण पंजियार ने बिजली शुल्क में बढ़ोतरी की घोषणा की है, जिसे पहली मई से प्रभावी कर दिया गया है.

17 फरवरी, 2011 को बिजली बोर्ड की ओर से दिए गए प्रस्ताव पर विचार के बाद विनियामक आयोग ने यह नई दरें निर्धारित की हैं. बोर्ड ने 1,714 करोड़ रु. का घाटा दिखाते हुए 65 फीसदी दर बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था.

लेकिन इसमें राज्‍य सरकार ने 1,080 करोड़ रु. का अनुदान बिजली बोर्ड को दिया है. शेष 726 करोड़ रु. के लिए दर में वृद्धि की गई है. बोर्ड के इस घाटे को पाटने के लिए औसतन 19 फीसदी बिजली बिल में बढ़ोतरी की गई, जिससे 481 करोड़ रु. का राजस्व मिल सकव्गा. आयोग ने बोर्ड को 245 करोड़ रु. के घाटे को अपने संसाधनों के बूते पूरा करने को कहा है.

वहीं, उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर की तहसील बिंदकी में बड़ी संख्या में दाल मिलें हैं जो बिजली बाधित आपूर्ति से प्रभावित हो रही हैं. बीते दस वर्षों से बिजली की समस्या काफी विकट हो गई है. निर्धारित शेडयूल के अनुसार बिजली नहीं आती है.

फिलहाल पूरा देश इस समय बिजली की कमी से त्राहिमाम कर रहा है और आने वाले समय में परिस्थितियों में सुधार की उम्मीद की जा सकती है. लेकिन देखा जाए तो इन गर्मियों में उपभोक्ताओं के पास बिजली कटौती झेलने और गर्मी का सामना करने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा.

-अमिताभ श्रीवास्तव, मिहिर श्रीवास्तव और साथ में पीयूष बबेले, आशीष मिश्र, विजय देव झा और अशोक कुमार प्रियदर्शी

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