गया के पिलग्रीम अस्पताल में आंकड़ों पर गौर करें तो 330 मिनट के कार्यकाल में डॉ. रश्मि ने 13 अक्तूबर को 89 मरीजों का इलाज किया है यानी प्रति मरीज 4 मिनट, डॉ. प्रांशु कुमार ने 14 अक्तूबर को 151 मरीजों की चिकित्सा की है यानी प्रति मरीज 2 मिनट और डॉ. मजहर ने 17 अक्तूबर को 301 मरीजों की चिकित्सा की है. यानी प्रति मिनट 1 मरीज.
इस तरह की स्थिति एक दिन की नहीं लगभग सभी दिनों की है. यहां कार्यरत चिकित्सकों द्वारा किए गए मरीजों की चिकित्सा के बाद उनके द्वारा अंकित मरीज रजिस्टर के आकड़ों का आकलन करने से मामला साफ-साफ झलक जाता है.
इस संबंध में डॉ. प्रांशु कुमार का कहना है, ''मरीजों की संख्या बढ़ गई है, लेकिन चिकित्सक नहीं बढ़ाए गए हैं. ऐसे में मरीजों को जल्दी-जल्दी निपटाना मजबूरी भी है.''
उनके मुताबिक पुराने मरीजों को देखने में समय नहीं लगता, नए मरीजों को देखने में समय देते हैं. पिलग्रीम अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. एच.जेड. अहमद बताते हैं कि पिलग्रीम अस्पताल के आउटडोर के लिए निर्धारित समय प्रातः 8:30 से दोपहर 2 बजे तक है. अगर कोई डॉक्टर 50 से अधिक मरीज देखते हैं तो उसे मजबूरी या खानापूर्ति ही कहा जाएगा.
सरकारी अस्पतालों में मरीज बढ़ने का एक दूसरा कारण मौसम का अचानक परिर्वतन होना भी है. पिलग्रीम अस्पताल में प्रतिदिन औसतन 700 से अधिक मरीजों का निबंधन किया जा रहा है.
चिकित्सकों की संख्या 11 बताई जाती है. जिनमें 7 चिकित्सक ही ओपीडी में नियमित रूप से सेवा दे पाते हैं.
सरकारी अस्पतालों में बढ़ी भीड़ को राज्य सरकार अपनी उपलब्धि बता रही है, पर इन अस्पतालों में मरीजों की चिकित्सा कैसे हो रही है उससे राज्य सरकार और जिला प्रशासन बेखबर है. ऐसे में मरीजों की बीमारियों का कितना निदान हो रहा है या मरीज नई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं यह भी जांच का विषय है.

