गुरुवार 2 फरवरी का दिन सुप्रीम कोर्ट के रूम नंबर 6 में हिसाब-किताब का दिन था. सुबह 10.30 न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली ने दशक के सबसे बड़े घोटाले पर फैसला पढ़कर सुनाया. यह फैसला प्रशांत भूषण और सुब्रमण्यम स्वामी के लिए जीत लेकर आया, जिन्होंने दोषियों को सजा दिलवाने के लिए सरकार को बाध्य करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं.
8 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
वरिष्ठ अधिवक्ता और पीआइएल कार्यकर्ता भूषण कहते हैं कि ऐसा इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि मई, 2010 में जस्टिस एस.एच. कपाड़िया के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद से न्यायपालिका में सक्रियता आई और उसने जनता की राय पर काम करना शुरू किया. वे कहते हैं, ‘एक वक्त ऐसा आया था जब मैंने याचिका डालनी बंद कर दी थी. भ्रष्टाचार को लेकर कोई गंभीर ही नहीं था.’ भूषण नए मुख्य न्यायाधीश को ‘प्रतिष्ठित और निष्पक्ष’ मानते हैं. सन् 2007 से ही भूषण अपनी संस्था कैंपेन फॉर जुडीशियल एकाउंटबिलिटी ऐंड रिफॉर्म ऑर्गनाइजेशन के माध्यम से भ्रष्ट न्यायाधीशों को सजा दिलवाने के लिए अभियान चला रहे हैं. अब यह लड़ाई भ्रष्ट राजनेताओं, नौकरशाहों और कारोबारियों के खिलाफ है.
1 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
दूसरे याचिकाकर्ता स्वामी की तो दीवाली, क्रिसमस और ईद एक साथ मन गई है. जनता पार्टी के मुखिया स्वामी की जवाबदेही की संस्कृति के पक्ष में लड़ाई चार दशक पुरानी है और उन्होंने अकेले दम पर 2जी मामले में हल्ला बोला है. वे कहते हैं, ‘मैंने अकेले 40 से ज्यादा मुकदमे लड़े हैं. मुझे कोर्ट जाने में आनंद आता है. मैंने हर मुकदमा जीता है.’
25 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
स्वामी कहते हैं, ‘2जी मामले का अंत 2012 में हो जाएगा और सारे दोषियों पर अपराध साबित होगा.’ निजामुद्दीन ईस्ट के उनके घर के बेसमेंट में धुंधले प्रकाश के बीच किताबों की कतारों, हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों से पटी दीवारों और बेतरतीब रखे कागज के पुलिंदों से एक रहस्यमय और दिलचस्प तस्वीर उभरती है. यही वह जगह है जहां 11 जनवरी, 2008 को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की पहली खबर आई थी कि एक घंटे के भीतर कंपनियों से 1,650 करोड़ रु. मांगे गए थे और सम्मानित लोगों को बाउंसरों ने बाहर फेंक दिया था. जुलाई में खबर आई कि कैसे इस लूट की बंदरबाट हुई, पद के हिसाब से 4,000 करोड़ रु. से लेकर 36,000 करोड़ रु. के बीच. स्वामी के लिए चौका मारने का यही मौका था. स्वामी कहते हैं, ‘मेरे और अण्णा हजारे के बीच यही फर्क है कि वे नई व्यवस्था चाहते हैं और मैं इसी व्यवस्था के बीच काम करता हूं. और मैंने इसे साबित भी किया है.’;

