अनिलेश महाजन
हरियाणा के फतेहाबाद जिला मुख्यालय पर 25 मी को किसान नेता मंदीप नथवान ने ट्रैक्टर पर चढ़कर आए करीब 3,000 किसानों की रैली का नेतृत्व किया. किसान एम.एल. खट्टर के नेतृत्व वाली सरकार के खरीफ सत्र में धान का रकबा घटाने के फरमान का विरोध कर रहे थे. राज्य के किसान 15 जून से धान का पौधारोपण शुरू कर चुके हैं. विरोध रैली साल की सबसे बड़ी रैली थी और ये दर्शाती है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए धान की खेती छोड़ना कितना मुश्किल है. जबकि दोनों ही राज्यों में इस फसल से पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था को हाल के वर्षों में काफी नुक्सान हुआ है.
दरअसल धान पानी सोखने वाली फसल है. पंजाब और हरियाणा पर नरेंद्र तोमर के नेतृत्व वाले केंद्रीय कृषि मंत्रालय का भारी दबाव है कि धान का रकब घटाने के लिए दोनों राज्य योजना तैयार करें. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च का अनुमान है कि एक किलो धान पैदा करने में 2,500 से 5,500 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है. साथ ही किसान भारी सब्सिडी पर मिलने वाली बिजली का भी बेजा इस्तेमाल करते हैं (पंजाब में किसानों के लिए ये मुफ्त है). भूजल स्तर गिरने के कारण किसानों ने बिजली से चलने वाले पंप के जरिये जमीन से पानी निकालना शुरू कर दिया है. इतना ही नहीं फसल तैयार होने के बाद बचे धान के पुआल या पराली को किसान जलाने लगते हैं जिसके धुंए से पूरे उत्तर भारत में, खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के वातावरण खराब हो जाता है और लोगों को सांस लेने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले साल नवंबर के पहले सप्ताह में यहां की आबोहवा डब्लूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) मानकों से 23 गुना नीचे चली गई. इस साल लॉकडाउन के चलते श्रमिकों की समस्या बढ़ गई है (इस काम को मशीन से करना काफी जटिल है और इसे अलग तरीके की खेती में ही किया जा सकता है). न्यूनतम समर्थन मुल्य (एएमएसपी) तय करते वक्त इन बातों को शामिल नहीं किया जाता इसलिए आगे मार्जिन सिकुड़ने की भी आशंका है. इस सबके बावजूद किसान धान की खेती के जंजाल से निकल नहीं पा रहे हैं.
1 जून को केंद्र सरकार ने धान का खरीद मुल्य 53 रुपए बढ़ाकर 1,868 रुपए कर दिया था. इसका मतलब ये हुआ कि इस साल किसानों को मोटे तौर पर प्रति एकड़ 1590 रुपए की अतिरिक्त आय होगी. पंजाब के मुख्य मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस बढ़ोतरी की आलोचना की और पराली के निस्तारण का खर्चा जोड़ते हुए किसानों को ज्यादा पैसा देने की मांग की. पिछले साल दोनों राज्यों ने पराली न जलाने के प्रोत्साहन के रूप में किसानों को 100 रुपए प्रति क्विंटल की राशि दी थी.
हरियाणा में धान का रकबा करीब 32 लाख एकड़ है जिससे 68 लाख मीट्रिक टन की पैदावार होती है. पंजाब में पिछले साल सभी 22 जिलों में धान की 57.3 लाख एकड़ क्षेत्र में खेती हुई थी. इस बार राज्य सरकार किसानों से 7.5 लाख एकड़ में अन्य फसलें पैदा करने को कह रही है. पिछले साल भी किसानों ने धान की खेती छोड़कर कपास (3.1 लाख एकड़), बासमती (2.95 लाख एकड़) और मक्के (1.27 लाख एकड़) की खेती की थी.
मक्का, कपास, गन्ना, बाजरा, दलहन और तिलहन की ऐसी वैकल्पिक फसलें उपजाने के लिए तैयार किया जा रहा है जिनमें धान के मुकाबले काफी कम पानी लगता है (उदाहरण के लिए मक्के के लिए चार चक्र की सिंचाई की जरूरत होती है जबकि धान के लिए यह जरूरत 40 से 50 चक्र होती है).
हरियाणा में खट्टर सरकार 12 जिलों में किसानों से 2.5 लाख एकड़ क्षेत्र में वैकल्पिक फसलें अपनाने को कह रही है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार वैकल्पिक फसल अपनाने वाले किसान को 7,000 रुपए प्रति एकड़- 25 फीसद बुआई के बाद और 75 फीसद फसल तैयार होने के पहले- देने का एलान किया है. लेकिन किसानों को भरोसा नहीं है कि अगर उन्होंने फसल बदली तो उसके खरीदार मिलेंगे.
आखिर पंजाब के किसान और कुछ हद तक हरियाणा के भी, धान से इतना प्रेम क्यों करते हैं. जबकि चावल पंजाबी आहार का हिस्सा भी नहीं है. दरअसल यह साधारण अर्थशास्त्र है. एक एकड़ में पंजाब और हरियाणा के किसान 30 क्विंटल तक धान पैदा कर लेते हैं. कृषि लागत और मूल्य आयोग का गणित कहता है कि किसान एक एकड़ खेत से लागत के 20 हजार रुपए निकालने के बाद 30,000 रुपए कमाते हैं और ये रिटर्न पक्का है.
धान उपजाना बहुत आसान है और किसान 90 दिन में फसल पा लेते हैं ( जबकि मक्के की फसल को जंगली जानवरों से बचाना पड़ता है और कपास में कीड़े लगने की प्रवृत्ति होती है). पंजाब-हरियाणा में कपास की खरीद कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआइ) और हरियाणा में मक्के की खरीद नेशनल एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (नेफेड) करता है.
पंजाब ने 10 जून से धान की बुआई की अनुमति दी है. किसानों ने उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए बसें भेजी हैं ताकि बुआई के लिए प्रवासी मजदूरों को वापस लाया जा सके. उन्होंने मजदूरी बढ़ाने के अलावा उनके बेहतर तरीके से रहने, खाने और कुछ मामलों में तो शराब तक का इंतजाम करने का वादा किया है. इसके बावजूद लेबर लौटने को तैयार नहीं है. मजदूर और मांग रहे हैं. राज्य के विभिन्न क्षेत्रोंके किसानों ने इंडिया टुडे को बताया कि मजदूर अब प्रति एकड़ 4,000 से 4,200 रुपए मजदूरी मांग रहे हैं जबकि पिछले साल ये दर 2,700 रुपए प्रति एकड़ थी.
पंजाब को किसानों को कपास की ओर आकर्षित करने में सीमित सफलता मिलती रही है. धान की तरह कपास की खरीद भी एमएसपी पर होती है. इस साल एमएसपी 5,450 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 5,825 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है. किसानों ने 2.17 लाख एकड़ जमीन कपास की खेती के लिए छोड़ी है. सच तो ये है कि फतेहगढ़ साहिब, लुधियाना और पटियाला के किसानों ने दो दशकों में पहली बार कपास का चयन किया है. ज्यादातर ने इसलिए धान की खेती छोड़ी है क्योंकि उन्हें मजदूरों की उपलब्धता का भरोसा नहीं रहता है. अगर ये प्रयोग विफल रहा तो वे कपास का फिर त्याग कर देंगे.
(अनुवादः मनीष दीक्षित)

