संसद की लोकलेखा समिति (पीएसी) ने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की अपनी रिपोर्ट के मसौदे में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और प्रधानमंत्री की तीखी आलोचना की है. भाजपा के मुरली मनोहर जोशी 21 सदस्यीय पीएसी के अध्यक्ष हैं.
इसमें कांग्रेस के सात, भाजपा के चार और द्रमुक और अन्नाद्रमुक के दो-दो तथा बीजद, जद (यू), बसपा, सपा, शिवसेना और माकपा के एक-एक सांसद हैं. कांग्रेस और द्रमुक सांसदों ने रिपोर्ट रोकने की धमकी दी. वे जरूरत पड़ने पर जोशी को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए तैयार भी थे.
और 28 अप्रैल को पीएसी की बैठक में अभूतपूर्व हंगामा हुआ. सुबह बैठक शुरू होते ही रणनीति बनाकर आए यूपीए के सदस्यों ने इस रिपोर्ट को 'आउटसोर्स्ड' करार दिया, उन्होंने जोशी पर रिपोर्ट लीक करने के आरोप जड़े, रिपोर्ट को एकतरफा करार दिया और उनके इस्तीफे की मांग की. कांग्रेस के नौ, द्रमुक के दो और सपाबसपा के एकएक सदस्य ने लिखित दरयाफ्त की कि वे रिपोर्ट खारिज करने के लिए वोट देते हैं.
मामला हाथ से बाहर जाता देख जोशी ने बैठक स्थगित कर दी. दोपहर जब बैठक फिर शुरू हुई तो कांग्रेस सदस्य सैफुद्दीन सोज ने रिपोर्ट को रद्द करने का प्रस्ताव रखा जिसे यूपीए के अलावा सपा-बसपा के सदस्यों ने समर्थन दिया.
दोनों पह्नों में तकरार बढ़ते ही बैठक खत्म हो गई. जोशी ने दावा किया कि उन्होंने बैठक स्थगित कर दी और उठकर चले गए. इसके बाद यूपीए सदस्यों ने सपाबसपा की मदद से सोज को अध्यक्ष ''निर्वाचित'' कर दिया और रिपोर्ट को ''खारिज'' कर दिया.
फिर सोज खुद जोशी के कार्यालय गए और पीएसी की स्थगित बैठक में उनकी सदारत में पारित हुआ प्रस्ताव उनके कार्यालय को दे आए. कांग्रेस सदस्यों ने कहा कि जोशी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे और बैठक से ''भाग गए.'' वैसे नियमों के मुताबिक किसी वित्तीय समिति के अध्यक्ष को लोकसभा अध्यक्ष नियुक्त करते हैं और वह सदस्य लोकसभा का होता है.
पीएसी रिपोर्ट ने चिदंबरम पर गंभीर आरोप लगाए हैं. इसमें 15 फरवरी, 2008 को उनकी ओर से मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र का हवाला दिया गया है. यह पत्र तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा के लाइसेंस की नीलामी करने के फौरन बाद लिखा गया था. इसमें चिदंबरम ने दलील दी थी कि स्पेक्ट्रम की कीमत उसके सीमित संसाधन होने और क्षमता के इस्तेमाल के आधार पर तय होनी चाहिए.
ऐसा केवल खुली नीलामी प्रक्रिया से ही हो सकता है. उन्होंने इसके बाद प्रधानमंत्री को सुझाया कि इस मामले को बंद मान लिया जाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त मंत्री के नोट से पीएसी ''दंग'' रह गई और ''निराश'' हुई.
पीएसी ने चिदंबरम पर लीपापोती करने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए पूर्व वित्त मंत्री की कार्रवाई की मुकम्मल जांच कराने की सिफारिश की है. रिपोर्ट में कहा गया है, ''जब तक इस मामले की पूरी जांच न हो जाए और (तत्कालीन) वित्त मंत्री की इस तरह की गैर मामूली हरकत की वजह देश को बताई नहीं जाए तब तक समिति संतुष्ट नहीं हो सकती.''
पीएसी अध्यक्ष का मूड भांपकर कांग्रेस और द्रमुक पिछले हफ्ते तक इस रिपोर्ट को जारी कराने में देरी करने की कोशिश कर रहे थे. सत्ताधारी गठबंधन के सांसद चाहते थे कि रिपोर्ट को अंतिम रूप से पहले राजा पीएसी के समाने बयान दें. लेकिन शायद जोशी भांप गए कि यह देरी कराने की चाल है. पीएसी का कार्यकाल एक साल का है और यह 30 अप्रैल को समाप्त होने वाला है.
हालांकि जोशी अगले साल तकइसके अध्यक्ष रहेंगे पर अगले महीने इसके सदस्य बदल जाएंगे. नए सदस्यों की भर्ती से इस रिपोर्ट को जारी करने में स्वाभाविक रूप से देरी होती.
कांग्रेस सांसद चिदंबरम पर दोषारोपण करने से ज्यादा प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय को लपेटे जाने से चिंतित हैं. इस बाबत मीडिया में खबर आने के साथ ही 27 अप्रैल की शाम को कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपना लिया. पीएसी में कांग्रेस के सदस्य के.एस. राव, सैफुद्दीन सोज और नवीन जिंदल एवं द्रमुक के टी. शिवा ने जोशी पर आरोप लगाया कि उन्होंने रिपोर्ट पर पूरी समिति की चर्चा से एक दिन पहले ही उसे प्रचारित कर दिया और इसी आधार पर उन्होंने जोशी के इस्तीफे की मांग की. उन्होंने जोशी पर ''राजनैतिक फायदा'' उठाने के लिए रिपोर्ट को ''आननफानन'' आगे बढ़ाने का आरोप लगाया.
राव ने कहा, ''हम सर्वसम्मति वाली रिपोर्ट चाहते हैं. लेकिन वे जल्दबाजी क्यों करना चाहते हैं? उनका इरादा क्या है? क्या हमें सब कुछ वही कहना पड़ेगा जो अध्यक्ष कह रहे हैं?'' राव के मुताबिक, जोशी ''पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर और दुर्भावना के तहत मंत्रिमंडल और सरकार को बदनाम और अस्थिर करना'' चाहते थे.
जिंदल ने इंडिया टुडे से कहा, ''इस रिपोर्ट में कई विसंगतियां हैं. इसमें कुछ ऐसे सदस्यों का जिक्र है जिन्होंने पीएसी के सामने बयान दिया जबकि वास्तव में वे आए ही नहीं. महाधिवक्ता जी.ई. वाहनवती और सीबीआइ निदेशक ए.पी. सिंह 15 अप्रैल को गवाही देने वाले थे लेकिन वे नहीं आए. रिपोर्ट कहती है उन्होंने गवाही दी. यह महज रिपोर्ट का मसौदा है.''
इस रिपोर्ट से कांग्रेस के चिंतित होने की वजहें हैं. रिपोर्ट के मसौदे में यह कहकर प्रधानमंत्री को कुछ राहत दी गई है कि राजा ने ''नीलामी'' के बारे में उनकी सलाह की ''अनदेखी'' की और उन्हें भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) की सिफारिशों के बारे में ''गुमराह'' किया, जिससे संदेह का लाभ खत्म हो जाता है.
रिपोर्ट में 26 दिसंबर, 2007 के राजा के पत्र के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. उस पत्र में उन्होंने नीलामी के बारे में प्रधानमंत्री की सलाह स्पष्ट रूप से खारिज कर दी थी. पीएसी के मुताबिक,प्रधानमंत्री को 7 जनवरी, 2008 को तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी की सलाह नोट (जिसमें नीलामी की सिफारिश की गई थी) के साथ 26 दिसंबर, 2007 का राजा का पत्र दिया गया, यानी राजा का पत्र मिलने के 12 दिनों बाद प्रधानमंत्री ने उसे देखा. ताज्जुब की बात है कि 11 जनवरी, 2008 को प्रधानमंत्री के निजी सचिव ने अपने बॉस की मंशा जाहिर की कि ''लाइसेंस से जुड़े मामले पर ध्यान दिया जाए.''
गौरतलब है कि एक रोज पहले ही यानी 10 जनवरी, 2008 को राजा ने यूनीफायड एक्सेस सर्विस (यूएएस) लाइसेंस जारी कर दिया था. यह फाइल 15 जनवरी को स्पष्टीकरण के साथ फिर प्रधानमंत्री के पास भेजी गई.
फिर वह फाइल निजी सचिव के पास पहुंच गई जिन्होंने उस पर लिखा कि ''प्रधानमंत्री चाहते हैं कि विभाग के साथ इसे अनौपचारिक रूप से साझ किया जाए और वे औपचारिक संवाद नहीं चाहते और पीएमओ को दूर रखना चाहते हैं.'' क्या प्रधानमंत्री जानबूझ्कर उस घोटाले से खुद को दूर रखना चाहते थे जिसकी परतें खुलने लगी थीं?
पीएसी रिपोर्ट में कहा गया है, ''पीएमओ को दूर रखने की प्रधानमंत्री की इच्छा से संचारमंत्री को अपनी अन्यायपूर्ण, मनमानी और संदिग्ध योजना को अमली जामा पहनाने में मदद मिली.'' पीएसी रिपोर्ट में 3 जनवरी, 2008 को राजा के 26 दिसंबर के पत्र की पावती का इस्तेमाल करके मनमोहन पर जिम्मेदारी डाली गई है. रिपोर्ट में कहा गया है, ''लगता है कि 3 जनवरी, 2008 को मंत्री का पत्र मिलने की स्वीकृति से प्रधानमंत्री ने उन्हें अपनी योजना पर आगे बढ़ने के लिए परोक्ष रूप से हरी झंडी दिखा दी.''
इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री के दावे पर रोष जताया गया है. महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (कैग) की चौंकाने वाली रिपोर्ट के बाद पहले दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कहा कि राजस्व जुटाने पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. रिपोर्ट में कहा गया है, ''इंडिया टेलीकॉम2007 में उनके अपने विचार के मद्देनजर (यह बयान) विरोधाभासी है.
उसमें कहा गया कि सरकार को राजस्व की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि दुनियाभर की सरकारों ने स्पेक्ट्रम आवंटन से काफी राजस्व जुटाया है.'' फिर रिपोर्ट में थोड़े व्यंग्य केसाथ कहा गया है, ''पीएमओ को प्रधानमंत्री के दो अलगअलग बयानों को मानने की जरूरत है.''
इस रिपोर्ट में दो और मिसालें दी गई हैं जिससे 2जी घोटाले में पीएमओ की भूमिका का संकेत मिलता है.
पहली मिसाल अक्तूबर 2007 की है. उस समय तक दूरसंचार विभाग (डॉट) को यूएएस लाइसेंस के लिए 1 अक्तूबर की समयसीमा से पहले 575 आवेदन मिल चुके थे. उस समय डॉट सदस्य (टेक्नोलॉजी) ने विधि मामलों के विभाग को पत्र लिखकर आवेदनों की बाढ़ से उचित और समान तरीके से निबटने की कानूनी राय मांगी थी. पीएसी रिपोर्ट के मुताबिक, विधि मंत्रालय के सचिव और विधि मंत्री ने इस मामले को अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह (ईजीओएम) के पास भेजने की जरूरत पर बल दिया.
राजा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर विधि मंत्रालय के सुझव को ''संदर्भ से परे'' बताया. ऐसे में पीएमओ को दोनों मंत्रालयों के बीच मतभेद के मुद्दे को मंत्रिमंडल में विचार के लिए भेजना चाहिए था. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. बाद में पीएमओ ने पीएसी को बताया कि उसे विधि मंत्रालय की ओर से ईजीओएम के लिए कोई सिफारिश नहीं मिली. पीएसीकी रिपोर्ट में पीएमओ की अज्ञानता के दावे को खारिज किया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है, ''समिति पीएमओ के इस जवाब से सहमत नहीं है कि ईजीओएम गठित करने के लिए विधि मंत्री से उसे कोई सुझव मिला था...खुद संचार मंत्री ने प्रधानमंत्री को अपने विचार के साथ विधि मंत्री के विचार के बारे में बताया.''
पीएसी के मुताबिक, ''पीएमओ निश्चित रूप से स्थिति नहीं भांप सका या फिर उसे मूकदर्शक बना दिया गया.''
दूसरी मिसाल 2006 की है जब यूपीए सरकार ने दूरसंचार पर मंत्रियों के समूह (जीओएम) के संदर्भ बिंदुओं को बदल दिया. यह जीओएम अक्तूबर 2003 में राजग के शासन में बना था. तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन के आग्रह पर जीओएम के संदर्भ बिंदुओं में से विशेषकर स्पेक्ट्रम की कीमत का मुद्दा हटा दिया गया. ये संदर्भ बिंदु 27 नवंबर, 2006 को पीएमओ के सीधे आदेश पर कैबिनेट सचिवालय ने बदले. वित्त मंत्रालय अब स्पेक्ट्रम कीमत के बारे में कुछ नहीं जानता और इस बाबत पूरी तरह डॉट को फैसला करना था.
अविश्वसनीय रूप से तमाम नियमों का उल्लंघन करके संदर्भ बिंदुओं मेंबदलाव को कैबिनेट की मंजूरी नहीं दिलाई गई, यहां तक कि बाद में भी यह मंजूरी नहीं दिलाई गई. रिपोर्ट में कहा गया है, ''कैबिनेट सचिव और पीएमओ को इनके बारे में मालूम था लेकिन उन्होंने इसे सुधारने की कार्रवाई नहीं की.''
विडंबना ही है कि सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनाने की विपक्ष की मांग का विरोध किया, जिससे संसद का एक सत्र बर्बाद हो गया. सरकार की दलील थी कि पीएसी 2जी घोटाले की जांच कर सकती है. पीएसी के पास सरकार के वार्षिक वित्तीय खातों, सरकारी खर्च और कैग रिपोर्टों की जांच करने का अधिकार है. शायद सरकार को उम्मीद थी कि पीएसी 2जी पर कैग रिपोर्ट की जांच तक ही सीमित रहेगी. लेकिन पीएसी ने उससे परे जांच की.
कांग्रेस के भाजपा पर ''पूर्वाग्रहग्रस्त'' पीएसी रिपोर्ट तैयार करने के आरोप के साथ ही राजनैतिक माहौल गर्माना तय है. सरकार के लगातार घोटालों में घिरे होने से विपक्ष के हौसले बुलंद हैं और ऐसे में वह यूपीए को घेरने का अवसर हाथ से नहीं जाने देगा. इस राजनैतिक कलह से शासन पर असर पड़ना तय है.

