बात 29 मई की है. यह एक ऐतिहासिक मौका था जब यंगून स्थित होटल सिडोना के एकदम सादे कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और म्यांमार की बड़ी नेता आंग सान सू की के बीच आधे घंटे की मुलाकात हुई. हॉल को जल्दबाजी में दो हिस्सों में बांटा गया था, एक हिस्सा दोनों नेताओं की बैठक के लिए निर्धारित था और दूसरा प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए. दोनों स्थानों को बांटने के लिए इस्तेमाल किया पार्टीशन इतना पतला था कि प्रेस वाले हिस्से में हो रही आवाजें लगातार छनकर आ रही थीं. इसी वजह से बार-बार शांति बनाए रखने की अपील भी की जा रही थी. आखिरकार जैसे ही दोनों नेता प्रेस को संबोधित करने के लिए बाहर आए, एकदम से खामोशी छा गई.
दोनों नेताओं ने करीब तीन-तीन मिनट के दो संक्षिप्त बयान जारी किए और सवालों का मौका नहीं दिया. स्थानीय पत्रकार हैरत में थे कि आखिर इतनी जल्दी सब कैसे खत्म हो सकता है. एक पत्रकार ने बताया, ''जब अह्ढैल में डेविड कैमरन आए थे तो डॉ (आंटी) सू की आधे घंटे तक बोली थीं.'' वैसे, दोनों यात्राओं में काफी फर्क है ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सू की से उस मकान में मुलाकात की थी जहां वे पिछले दो दशक का वक्त नजरबंदी में बिता चुकी थीं. इसी वजह से कैमरन की यात्रा प्रतीकात्मकता और वहां के माहौल से पूरी तरह सराबोर थी.
जहां तक भारत की बात है, छोटी-छोटी सिलसिलेवार चूकों ने गलतियों का एक पहाड़ खड़ा कर डाला, जिसके लिए हमारी अड़ियल अफसरशाही जितनी जिम्मेदार है उतने ही ज्यादा प्रधानमंत्री भी, जो असामान्य स्थितियों में व्यावहारिक स्तर पर अपेक्षित लोच नहीं ला पाते. प्रोटोकॉल ने सब कबाड़ा कर दिया और भारत ने एक बड़ा मौका हाथ से गंवा दिया. भारत की विदेश नीति के धुरंधरों ने राजनैतिक समझ्दारी को ताक पर रख कर प्रोटोकॉल लागू कर दिया क्योंकि सू की सिर्फ सांसद हैं, लिहाजा उन्हें होटल में प्रधानमंत्री से मिलने आना होगा.
कुछ अफसरों की मानें तो भारत सरकार, म्यांमार सरकार की 'धुर विरोधी' सू की के लिए प्रोटोकॉल तोड़ कर उसे नाराज नहीं करना चाहती थी. सू की मई, 2012 में सांसद बन चुकी हैं और इस लिहाज से वे सत्ताधारी पार्टी की घोषित दुश्मन नहीं रह गई हैं. मनमोहन के दिल्ली लौटते ही सू की ने अपने देश की सरकार में आस्था जताते हुए 22 साल बाद पहली बार थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के लिए फ्लाइट पकड़ ली. प्रधानमंत्री को अपने अफसरशाहों की अनदेखी कर देनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. जरा सोचिए कि कांग्रेस महात्मा गांधी की व्याख्या किस तरह करना चाहेगी-कांग्रेस के एक नेता के तौर पर, जो सांसद तक नहीं थे?
म्यांमार में लोकतांत्रिक बदलाव का अंदाजा वहां के मीडिया से बातचीत कर के लग जाता है. म्यांमार की पूर्व राजधानी और सबसे बड़े शहर यंगून में 58 वर्षीय यू. मिन जॉ जापानी अखबार द टोक्यो शिंबुन के स्थानीय संवाददाता हैं. 2007 में जन आंदोलन के दौरान जॉ को छह दिनों के लिए हिरासत में ले लिया था और उन्हें सबसे अलग रखा गया था.
जापानी मीडिया समूहों के साथ 16 बरस की सेवा के दौरान उन्हें इससे पहले पांच बार और हिरासत में लिया जा चुका है. क्यों? वे कहते हैं, ''उन्होंने कभी कोई वजह नहीं बताई.'' हालांकि उनका पिछला हफ्ता यंगून जैसे शहर में बिजली की भारी कटौती के विरोध प्रदर्शनों को कवर करते हुए गुजरा था. वे बताते हैं, ''मुझे तस्वीरें लेने या जो मैं लिखना चाहता था, उसे लिखने से किसी ने नहीं रोका. मुझसे सवाल तक नहीं किया गया.''
म्यांमार की पत्रकार बिरादरी इस बदलाव से खासी उत्साहित है. .जॉ कहते हैं, ''लोग अब सरकार के खिलाफ अपनी असहमति जताने के लिए सड़कों पर मोमबत्तियां लेकर उतरने से डरते नहीं हैं.'' स्थानीय साप्ताहिक म्यांमार वीकली के वरिष्ठ रिपोर्टर 30 वर्षीय जॉ विन थान कहते हैं कि पहली बार यहां पत्रकारिता जोखिमभरा पेशा नहीं रह गया है. वे बताते हैं, ''सरकार ने घोषणा की है कि प्रेस पर प्रतिबंध जून के अंत तक पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा.''
म्यांमार में अब भी निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं. शायद ऐसा 2015 तक चुनाव सफल होने लगेंगे. लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता 2012 में बहाल हो चुकी है, और वह भी 1962 के तख्तापलट में सैन्य तानाशाह द्वारा देश पर कब्जा किए जाने के ठीक 50 साल बाद. प्रेस और म्यांमार की जनता को अब सरकार से डर नहीं रह गया है, लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय के मन से दहशत अभी तक नहीं निकली है.
म्यांमार को तानाशाही राज से लोकतंत्र की छाया में लाने वाला शख्स 67 वर्षीय थेन सेन है, जिन्हें मार्च, 2011 में पिछले 49 साल के दौरान देश का पहला नागरिक राष्ट्रपति चुना गया. सेना में जनरल रह चुके थेन सेन 2007 से 2011 के बीच जनरल थान श्वे के बर्बर शासन में प्रधानमंत्री थे. उन्होंने 2010 में सेना छोड़ कर यूनियन सॉलिडरिटी ऐंड डेवलपमेंट पार्टी बनाई, जिसने 2011 के चुनाव में हिस्सा लिया. सू की की पार्टी नेशनल लीग ऑफ डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था.
सैन्य पृष्ठभूमि के बावजूद थेन सेन को उदार और सुधारों के प्रति कटिबद्ध माना जाता है. अप्रैल, 2012 में उन्होंने 46 संसदीय सीटों के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाए, जिसमें से एनएलडी को 44 सीटों पर जीत मिली थी. देश के लोकतंत्रीकरण के उनके प्रयासों को दुनिया भर में समर्थन मिला. इसी वजह से अमेरिका और यूरोपीय संघ ने अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाले प्रतिबंधों को हटा लिया है.
मनमोहन ने 28 मई को ने पी तॉ में थेन सेन से मुलाकात की थी. दोनों ही देशों ने कई समझैतों पर दस्तखत किए. जानकारों का मानना है कि चीन की ही तरह भारत की भी नजर म्यांमार के प्राकृतिक संसाधनों पर है. अगर मनमोहन एक कदम आगे बढ़ाकर सू की के साथ खड़े होते तो शायद वे इन आशंकाओं को काफी हद तक दूर करने का काम कर सकते थे. लेकिन उन्होंने तो अपने होटल में ही रहना पसंद किया.
जाहिर तौर पर 2005 में बनी म्यांमार की नई राजधानी ने पी तॉ में आए बदलावों को देखकर ही कई शंकाएं पैदा हो जाती हैं. एक समय यहां सागौन के घने जंगल हुआ करते थे.
इंटेलिजेंस प्रमुख और बाद में प्रधानमंत्री भी बने खिन न्युंत की दिमागी खुराफात थी कि यहां चीन से मिली बड़ी आर्थिक मदद के सहारे शहर बसा दिया गया. साठ लाख की आबादी वाला यंगून सू की का गढ़ रहा है. वहां की जनता कभी भी सड़कों पर उतरकर सरकार के लिए समस्या खड़ी कर सकती थी. क्रांति की लहर से बहुत पहले ही यह आशंका खिन न्युंत के दिमाग में दस्तक दे चुकी थी, लिहाजा उसने राजधानी को ने पी तॉ स्थानांतरित कर दिया, जहां अधिकांश आबादी या तो सेना में है या फिर सरकारी नौकरी करती है. सरकारी दफ्तर और सैन्य प्रतिष्ठान मुख्य सड़कों से दूर घने जंगलों में छुपे हुए हैं. इस लिहाज से ने पी तॉ सनकी तानाशाही शासन का आदर्श प्रतीक है. इसके बावजूद अप्रैल, 2012 के उप-चुनावों में यहां सू की की एनएलडी को चारों सीटों पर जीत हासिल हुई. एक गुप्त मतदान में यहां तक कि सरकार के वफ ादार सिपाहियों और नौकरशाहों ने भी सू की के पक्ष में वोट दिया.
और आखिर में, राजनीति से ज्यादा अर्थशास्त्र पुरानी सत्ता के अवशेषों को ध्वस्त कर सकता है. लंबे समय से यहां की अर्थव्यवस्था ठहराव का शिकार है और बिजली की भारी कमी एक बड़ी वजह है. मुद्रास्फीति दो अंकों को छूने के काफी करीब है. आर्थिक वृद्धि सालाना पांच फीसदी से भी कम है. स्थानीय लोगों को अपनी करेंसी क्यात (एक डॉलर=800 क्यात) पर कतई भरोसा नहीं है, जिसमें लगातार उतार-चढ़ाव बने रहते हैं. इसकी वजह से वे क्यात की बजाए डॉलर में लेन-देन करना पसंद करते हैं.
मोबाइल फोन का नेटवर्क बदहाल है क्योंकि यह सेवा यहां बेहद महंगी है. तीन महीने से ज्यादा चलने वाला एक मोबाइल सिम कार्ड यहां 250 डॉलर यानी 12,500 रु. का मिलता है. म्यांमार के तानाशाह शासकों ने समाजवादी सोच के चलते उद्यमियों को हतोत्साहित किया. यंगून की सड़कों पर जो कारें नजर आती हैं, वे जापान, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया से आयात की गई सस्ती, पुरानी कारें होती हैं. यहां तक कि माचिस की डिबिया और तीली भी उद्योग मंत्रालय बनाता है.
साप्ताहिक द वॉयस के डिप्टी चीफ एडिटर 35 वर्षीय जेया थू कहते हैं, ''नौजवान चाहते हैं कि राजनैतिक बदलाव के साथ-साथ आर्थिक बदलाव भी आए. 25 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में जोर मार रही उद्यमिता बाहर निकलने के लिए कसमसा रही है.''
विडंबना यह है कि सरकार इन तमाम अपेक्षाओं पर पानी फेरने को बेताब है. सरकारी अंग्रेजी अखबार द न्यू लाइट ऑफ म्यांमार के 28 मई के अंक में संपादकीय का शीर्षक बड़ा दिलचस्प था, ''जितना है उतने में संतोष करो और खुश रहो.'' उसमें लिखा था, ''हमेशा कुछ ज्यादा अमीर, ज्यादा कामयाब, बेहतर दिखने वाले लोग रहेंगे ही, जिनके पास अच्छी कार और शानदार मकान होगा. लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता.'' जेया थू और म्यांमार के नौजवान अब ऐसी नसीहतें सुनने वाले नहीं हैं.
म्यांमार के शासकों को जल्द ही इस बात का एहसास हो जाएगा कि आजादी का जिन्न अगर एक बार बोतल से बाहर निकल आए तो उसे दोबारा कैद नहीं किया जा सकता है.
दुख की बात यह है कि भारत सरकार म्यांमार की आम जनता का मन नहीं पढ़ सकी. इसकी बजाए सरकार ने म्यांमार के जनरलों के पुराने भूत को अपने ऊपर सवार होने दिया.

